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NGO गैंग की शर्मनाक सौदेबाज़ी, ठगा गया देश

By   /  December 30, 2011  /  7 Comments

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-सतीश चंद्र मिश्र ।।

अगर अन्ना हजारे को बुखार आ गया था तो अन्ना टीम के स्टील बॉडी वाले केजरीवाल, तगड़ी-तंदरुस्त किरण बेदी और मजबूत डीलडौल वाले हट्टे-कट्टे मनीष और “मंचीय मसखरे” कुमार विश्वास क्यों नहीं बैठे अनशन पर…?
यदि स्वास्थ्य कारणों से अन्ना का जेल जाना संभव नहीं था तो ये लोग ही अनशन जारी रखते और जेल चले जाते…? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
दरअसल बाबा रामदेव और उनकी कालाधन विरोधी मुहिम के सफाए के लिए प्रारम्भ में स्वयम सरकार द्वारा प्रायोजित “जनलोकपाली सर्कस” में जब अन्ना टीम की लाख विरोधी कोशिशों के बावजूद संघ भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने अपनी जबर्दस्त भागीदारी जबरदस्ती कर ली तब इस सर्कस के तरकश से जो तीर निकलना शुरू हुए वो तीर भ्रष्टाचार के कैंसर से साष्टांग संक्रमित सरकार और कांग्रेस के लिए जानलेवा सिद्ध होने लगे.

इसके चलते कांग्रेसी किराये और संरंक्षण में लगाये-सजाये गए इस “जनलोकपाली सर्कस” के नटों और कलाबाजों(अन्ना टीम) को भी अपना रंग बदलना पडा. अतः अपनी बिल्ली को अपने ही खिलाफ म्याऊं करते देख कांग्रेसी सरकार के तेवर तीखे हुए. उसने जो लोकपाल बनाया उसमें इन बिल्लियों(NGO’s) को तो शामिल किया ही साथ ही साथ इन बिल्लियों को अपने दान का दूध पिलाने वाले इनके कार्पोरेटी आकाओं को भी सरकारी लोकपाल के दायरे में शामिल कर लिया और उनके कार्पोरेटी टुकड़ों पर पलने वाले मीडिया पर भी लोकपाली शिकंजा कस दिया था, इस से पहले इन कार्पोरेटी भोंपुओं को जस्टिस काटजू के बहाने बहुत मोटा डंडा दिखा कर सरकार उनके होश पहले भी उड़ा ही चुकी थी.

इसीलिए पिछली बार जब रामलीला मैदान में भी 20,000 से अधिक भीड़ कभी इकठ्ठा नहीं हुई थी तब उसे लाखों का जनसैलाब उमड़ा बताने वाले और देश के कुछ महानगरों में 100, 50 या फिर 500 तक की भीड़ को सड़कों पर देश उमड़ा बताने वाले मीडिया ने इस बार मुंबई के जनलोकपाली मजमें के दोनों दिन कैमरों की कलाबाजी से हजारों को लाखों में बदलने के बजाय वहाँ लोटते रहे कुत्तों और भिनभिनाती रही मक्खियों का सच ही दिखाया. जनलोकपाली सर्कस के बेलगाम नटों और मदारियों के कान उनके कार्पोरेटी आकाओं ने भी ऐन्ठें. इसीलिए पिछली बार रामलीला मैदान में कार्पोरेटी कृपा से किराये पर बुलाये बैठाये गए वे दर्जनों जोकर इस बार कहीं नहीं दिखे जो पिछली बार रामलीला मैदान में राम, रावण, हनुमान, महात्मा गांधी, शिवाजी, भगत सिंह आदि का भेष बना के तेरह दिनों तक घुमते रहे थे. सरकार द्वारा खुद पर कसे गए लोकपाली शिकंजे से कुपित कार्पोरेट जगत की कोपदृष्टि के ताप से मुरझाये आर्थिक स्त्रोतों की मार का कहर टीम अन्ना के उन इवेंट मैनेजरों पर भी पडा जिन्होंने पिछली बार रामलीला मैदान में ढोल ताशों वाले पढ़े-कढ़े जनलोकपाली भक्तों की भरमार कर दी थी.

इसके अलावा सरकार ने भी लोकपाली शिंकजा कस के NGO के गोरखधंधे पर पूरी तरह आश्रित टीम अन्ना के विदेशी दाने-पानी पर प्रतिबन्ध का पुख्ता प्रबंध कर दिया था.अतः इस सर्कस के NGO धारी सारे नट और नटनी, मदारी तत्काल अपना चोला बदलने पर मजबूर हो गए और सरकार से जैसे तैसे समझौता किया. परिणामस्वरूप सरकार के जिस लोकपाल बिल के दायरे में पहले कार्पोरेट, मीडिया और विदेशी चंदा पाने वाले NGO’s को शामिल किया गया था वहीं किसी भी राजनीतिक दल द्वारा बिना किसी जोरदार मांग के संशोधनों की आड़ में सरकार ने इन तीनों को बाहर कर दिया और देश बचाओ का नारा लगाने वाली टीम अन्ना ने “जान बची लाखों पाये” का जाप करते हुए आनन् फानन में अनशन, धरने, जेल भरो आन्दोलन, सरीखे अपने वायदों दावों को ठेंगा दिखाते हुए MMRDA मैदान से अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और भाग खड़े हुए. इनके ठेंगे पर गया देश और समाज के लिए संघर्ष.
अब अपने आकाओं से नया निर्देश मिलने के बाद नटों और नटनियों की ये टोली कब और कैसे सक्रिय होगी और अपने कौन से नए सर्कस का रंगबिरंगा तम्बू कब कहाँ और कैसे गाड़ेगी…? यह देखना रोचक होगा.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

7 Comments

  1. Rajendra Trivedi says:

    kuchh kunthit aatmayo ki soch per aadharit hai ye lekh. varna BHRASHTACHAR ka MUDDA jis tarah se Anna ji ne apne AANDOLAN ke madhyam se uthaya usase Desh ke navjavano me BHRASHTACHAR KE VIRUDDH LARNE KI UMANG PAIDA HUYI THI, KINTU YE BHI satya HAI,ki aap jaisi soch rakhane walo avam bhrasht rajnitigyo ne apni Kutil chalo se anna ji ke Desh Hit me shuru ki gayi muhim ko kuchh had tak dabane me safal avasya ho gaye hai, apni kutilta per vo aise lekh likh kar gauranvit ho rahe hai.

  2. daj says:

    इन्होने तो किया-ना किया वो तो टीवी पर देखा. आप ने कौन सा तीर मार लिया अब तक देश के लिए ये कहीं नहीं दिखा. हा हा हा

  3. दशरथ अ झारिया says:

    इससे पहले भी सैकड़ों बार कहा जा चुका है की इस देश के सवा अरब भारतीय समेत चौथे स्तंभ “मीडिया” ने तक भ्रष्टाचार के खिलाफ आज तक कौन सा तीर मार लिया, बल्कि कहा तो ये तक जा रहा है की अधिकांस मीडिया के लोग न्यूज़ की आड़ में करोड़ो बना रहे हैं जैसा की नोट फॉर वोट कांड में असली विडियो छुपाकर आईबीएन7 के राजदीप सरदेसाई ने करोड़ो बनाए हैं. इस प्रकार के घाल-मेल में यदि अन्ना ने कोई अलख जगा दी तो सबके पेट में क्यों तकलीफ हो रही है? अन्ना और उसकी टीम कौन से करोड़ों बनाने के चक्कर में ये नोटंकी कर रहे थे बताया क्यों नहीं जा रहा है, इसके अलावा मीडिया का लोकपाल के एक्ट ना बन पाने की स्थिती में किसको लगता है की अगले सत्र में इसके दबाव से ये एक्ट बन जावेगा, मीडिया के किस आचरण और दबाव से लगता है की लोकपाल बल्कि जन-लोकपाल पर संसद में कुछ हो पायेगा,जब ये पैसे बनाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते तो अन्ना या बाबा या सुब्रम्हनियम या श्री श्री के किसी काम से मीडिया को क्यों तकलीफ होती है. और हाँ इन सभी ने ठेका नहीं ले रखा है इस पर इच्छा-अनिच्छा से अनशन करने-न करने का जब इनका मन होगा तब अनशन करेंगे और देश के लिए करेंगे, मीडिया के लिए नहीं.

  4. Kautilya Ji says:

    भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का उपयोग भारतमाता की अस्मिता और स्वाभिमान के साथ वैचारिक व्यभिचार-बलात्कार करने वाले प्रशांत भूषन, मेधा पाटकर संदीप पाण्डेय और उनके “सरगना-संरक्षक-समर्थक” किशन बाबू राव के समर्थन के लिए, इस देशघाती गिरोह के गुणगान करने के लिए, इस गिरोह की महानता की माला जपने के लिए कर रहे अंधे अन्ना भक्तों से सिर्फ यही कहना चाहूँगा कि चूहे यदि आँख बंद कर लें तो बिल्ली गायब नहीं हो जाती. शुतुर मुर्ग जब रेत के ढूह में अपना सर घुसेड लेता है तो रात नहीं हो जाती “गैंग अन्ना” की “जन लोकपाली” पूँछ पकड़ कर लटक चुके कुछ पढ़े लिखे मूर्खों का समूह अवश्य ये मानता है की इन भूषन,किरण, केजरीवाल, सरीखे बेईमानों देशद्रोहियों जालसाजों की पूँछ पकड कर लटकने के बाद हम भ्रष्टाचार की नदी पार कर सदाचार के तट पर पहुँच जायेंगे……!!!!!!!! अंधे अन्ना भक्त यह भी समझ लें कि विद्वता प्रकट करने के लिए उपदेशात्मक शैली में अपनी बात कहने से सच को झूठ और गधे को गाय सिद्ध नहीं किया जा सकता. अतः अंधे अन्ना भक्त तथ्यों तर्कों का उत्तर तथ्यों तर्कों से दें. ऐसा नहीं कर पाने की अपनी बौद्धिक नपुंसकता, वैचारिक दरिद्रता का नंगा नाच अंधे अन्ना भक्त अपनी तिलमिलाई बौखलायी टिप्पणियों के द्वारा करके स्वयम को हँसी का पात्र नहीं बनायें…….

  5. somdutt jangra says:

    सबी हमाम में न्गन ह

  6. Chit awasthi says:

    लगे रहो बेटा ! खबर पढ़ा करो .मंच पर Jin teen का नाम logo undone Anna के Saath ही Anshan तोडा था पर तुम तो ले chime हो सर्कार से टॉफी तो चूसन उसे ही . नपुंशक बुद्धिजीवी सेल बस बक्चूदी करेंगे और अपना ज़मीर एक बोतल dare में be ute रहेंगे

  7. Shivnath Jha says:

    ऐसा ही होता है हुजुर. सभी भ्रष्ट लो भ्रष्टाचार के किलाफ़ लड़ रहे हैं.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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