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उत्तरप्रदेश : जनता अभी मौन है

By   /  January 10, 2012  /  1 Comment

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– राजीव गुप्ता|| समूचे उत्तर भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है जिसकी चपेट में कई लोग “काल के शिकार” भी हो गएँ हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के चुनावी वातावरण में कुदरत के कहर का भी कोई जोर नहीं चल पा रहा है ! हर तरफ विभिन्न पार्टियों के राजनेता ताबड़तोड़ रैलियां कर समूचे उत्तरप्रदेश के वातावरण को गर्म किये हुए है ! हर रैली में “बेचारा आम जन” यह आस लेकर आता है कि कोई उसके हित की बात करे , उसके विकास की बात करे परन्तु “तथाकथित राजनेताओं” के बीच एक दूसरे की पार्टी पर कीचड उछालते हुए यह दिखाने की होड़ लगी हुई है कि “मेरी चादर उसकी चादर से ज्यादा उजली है” !  पर वास्तविकता यह है राजनीति के हमाम में सब नंगे है ! दल-बदल के कारण राजनेताओं के बीच ऐसा उछल-कूद का खेल चल रहा है कि “किस पार्टी का नेता कब उछल कर आएगा और कब कूद कर चला जायेगा” यह कहना बहुत मुश्किल है ! दल-बदल का ऐसा “नंगा नाच” अगर कोई “विश्व रिकॉर्ड” भी बना दे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए !   
मसलन “कुशवाहा” की सदस्यता भले ही स्थगित कर दी गयी हो परन्तु अवधेश वर्मा ने तो पंचायत चुनाव में अपने परिवार के लोगों को जिताने के लिए विरोधियों का अपहरण तक करवाया था, जिसे उस समय बीजेपी ने खूब भुनाया था और  उनके खिलाफ आंदोलन करते हुए यह कहा था कि यूपी में “कानून-राज” खत्म हो गया है, अब उन्ही अवधेश वर्मा के सहारे “राम-राज” लाने की कसमें खा रही है ! बादशाह सिंह और दद्दन मिश्र की “कार – गुजारियों” पर भी पानी डाल कर इन्हें  अब भाजपा पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया हैं ! ऐसा कर भाजपा सिर्फ राजनीतिक शतरंज के “प्यादे” मात्र से संतोष कर रही है असली खेल तो दूसरी पार्टियाँ खेल रही हैं ! फैजाबाद के “शशि -कांड “को कैसा भूला जा सकता है जिस समाजवादी पार्टी ने संसद से लेकर सड़क तक हंगामा मचाकर तत्कालीन गृह राज्यमंत्री “आनंद सेन” से इस्तीफ़ा लेकर उन्हें जेल भिजवाया जहां उन्हें उम्रकैद की सजा मिली उन्ही “आनंद सेन” के पिता “मित्रसेन यादव” जिन पर “कबूतरबाजी” के भी आरोप लगते रहें है सपा पार्टी के उम्मीदवार हैं ! एक छात्रा को किडनैप और रेप के आरोप में डिबाई से बीएसपी विधायक “भगवान शंकर शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित” जेल तक की सैर कर चुके हैं परन्तु  गुड्डू पंडित अब समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं ! पैगंबर का कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर इनाम की घोषणा करने वाले “हाजी याकूब कुरैशी” को सिखों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने के बाद बीएसपी ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था परन्तु आरएलडी ने उनके साथ – साथ मुजफ्फरनगर में दिल्ली की लड़कियों की किडनैपिंग और छेड़छाड़ के आरोपी बीएसपी विधायक “शाहनवाज राणा” को भी अपनी पार्टी बाहें फैला कर स्वागत किया ! वही आरएलडी की महासचिव और पूर्व मंत्री “अनुराधा चौधरी” समाजवादी पार्टी में शामिल हुई जिससे समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हो गए !
इस दल-बदल की “सड़ांध राजनीति” में असली मुद्दा “प्रदेश और जनता का विकास” कही खो गया है ! आम – जनता के हित और उनके विकास की वकालत कर वर्तमान मुख्यमंत्री के ऊपर कोई “शाम की दवाई महंगी” का आरोप लगा कर मतदाता को लुभाने की कोशिश में  जुटा है तो किसी विशेष समुदाय को “नौ प्रतिशत आरक्षण” ( अभी हाल ही में सोनिया नेतृत्व  यूपीए- २ ने यह निर्णय लिया है कि मुसलमानों को उनके मजहब के आधार पर नौकरियों में साढ़े चार प्रतिशत का आरक्षण पिछड़ों के हक मार कर दिया जायेगा )  की बात कर उनका दिल जीतने को बेताब है ! कोई “भगवान् राम” को बेचने का आरोप लगाकर “विवादित ढांचा” को हवा देने की फ़िराक में है तो कोई ” संवैधानिक संस्था – निर्वाचन आयोग” के फैसले को कोर्ट में चुनौती देकर आम जनता से भावनात्मक रूप से जुड़ने की कवायद में जुटा है ! कोई भ्रष्ट नेता को अपनी पार्टी में “नहीं” लेकर अपने को पाक-साफ़ दिखाने की कोशिश में जुटा है तो कोई “जादुई हाथी पर पैसे खाने” का आरोप लगाकर जनता को गुमराह करने की कवायद में लगा है !

राजीव गुप्ता , लेखक

वर्तमान के चुनावी दंगल को देख कर ऐसा लगता ही नहीं कि इस राज्य ने देश को नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी , राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरु के रूप में दिया है !  वैसे उत्तरप्रदेश की राजनीति राजनेताओं के लिए हमेशा एक प्रयोगशाला के रूप में रही है ! मसलन कांग्रेस को टक्कर देने के लिए कभी “भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी” हुआ करती थीं, परन्तु कांग्रेस को पंद्रह साल डिगा नहीं पाई ! पासा १९६७ में पलटा जब चौधरी चरण सिंह ने गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई ! और ठीक दस वर्ष पश्चात एक राजनेता को जनता ने जबाब देने के लिए  १९७७ में आपातकालीन के बाद देश व प्रदेश में “जनता पार्टी” की सरकार बनवा दी ! परन्तु उत्तरप्रदेश की राजनीति में असली मोड़ १९८९ में आया जब “राममंदिर – आन्दोलन ” का मुद्दा पूरे भारत में जोर पकड़ा ( जिसे बाद में १९९१ में “रामलहर” के रूप में भी जाना गया ! ), जिसे दबाने के लिए वीपी सिंह ने “मंडल कमीशन” का कार्ड चला तो उससे निपटने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने “राम – रथयात्रा” निकली ! इन सबके बीच एक ऐसा तबका था जो खामोश होकर अपने उत्थान का सपना देख रहा था ! वह तबका था “दलित उत्थान” का, जिसे बसपा पार्टी के संस्थापक “कांशीराम” नेतृत्व प्रदान कर रहे थे ! १९८९ के विधान सभा में इस पार्टी के १३ विधायक जीत कर आये !

१९९२ में विवादित ढांचा गिरने के बाद जब भाजपा की आंधी को रोक पाना संभव नहीं था तो आज की दो प्रमुख विरोधी पार्टियाँ “सपा और बसपा” ने आपस में गठबंधन कर सरकार बनाई ! पहली बार “दलितों” ने सत्ता का स्वाद लिया ! १९९५ में बसपा ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और “मायावती” मुख्यमंत्री बनी इस प्रकार दलितों ने पहली बार अपना “दलित” मुख्यमंत्री पाया ! जिससे “मायावती” को और ताकत मिली परिणामतः २००२ के भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के पश्चात  २००७ में बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग “दलित-सवर्ण” के आधार पर २०६  का जादुई आंकड़ा पार कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई !
यह उत्तरप्रदेश का दुर्भाग्य है कि इस बार के विधानसभा चुनाव का किसी भी पार्टी के पास “प्रदेश के विकास” का कोई “एजेंडा” नहीं है ! अच्छा होता कि राजनेता बिहार और गुजरात जैसे अनेक राज्यों के विकास – मॉडल का अनुसरण कर “आम जनता और प्रदेश ” के “विकास की बात कर एक “स्वस्थ संवाद” स्थापित करते और “मुद्दों के आधार” पर जनता से वोट मांग कर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की बात करते , जिससे भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होता ! परन्तु यहाँ भ्रष्टाचार को दूर करने की बात करना भी बेईमानी है क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा संज्ञान लेने पर “काले धन की गंगोत्री” पकड कर राजनेताओं को चुनाव में शामिल किये जाने वाले “काले-धन के उपयोग” का ऐसा आइना दिखाया जा रहा है जिसे कभी “बाबा रामदेव” ने रामलीला के मैदान में उठाया था !  जनता सभी राजनैतिक पार्टियों के चाल – चरित्र और चेहरे को बखूबी देख व समझ रही हैं ! अब कुछ लोगों का मानना है कि  २०१२  की उत्तरप्रदेश जीत , २०१४  की लोकसभा की स्तिथि तय करेगी , जिसने उत्तरप्रदेश में सरकार बनायीं , २०१४  की लोकसभा की चाबी उसी दल के हाथ में होगी |  दल-बदल से लेकर एक-दूसरे पर कीचड उछालने के बाद अब २०१२ में ऊँट किस करवट बैठेगा यह देखना बहुत ही दिलचस्प होगा क्योंकि “जनता अभी मौन” है  !
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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Amarendra Kumar Singh says:

    मै कहना चाहूँगा कि जनता से पैसा टैक्स के रूप में वसूल कर मूर्तियों, पार्को और नए नए प्रोजेक्ट बनाकर उन पैसो को बर्बाद करने का हक किसी को नहीं है. ये पैसा जनता का है और वही लगना चाहिए जिसमे जनता का हित हो.

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