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आकाश झा की फिल्म ‘एक खोजः भारत की’ बयां करेगी शहीदों के भूले-बिसरे परिजनों का हाल

By   /  January 25, 2012  /  1 Comment

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1857 से लेकर 1947 तक के स्वतंत्रता सैनानियों में से कई भुला दिए गए तो कुछ का नाम आज भी देश भर में बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, लेकिन आजादी के लिए अपने तन-मन-धन का बलिदान कर देने वाले इन शहीदों के वंशज़ आज किस बदहाली में अपना जीवन गुजार रहे हैं, यह किसी ने सोचा तक नहीं है। करीब एक सदी तक चले स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे अनेकों क्रान्तिकारी थे जिनके परिवारवालों और वंशजों को किसी ने याद नहीं रखा। इन भूले-बिसरे परिजनों और वंशजों की बदहाली को दर्शाया है मशहूर पत्रकार शिवनाथ झा के 14 वर्षीय पुत्र आकाश झा ने, एक फीचर फिल्म के माध्यम से।

 

झा के मुताबिक इस फिल्म के माध्यम से भारत को आजादी दिलाने वाले ऐसे शहीदों, महापुरुषों और क्रान्तिकारियों के वंशजों से बातचीत के आधार पर उन परिवारों की मौजूदा दुर्दशा को झलकाने का प्रयास किया गया है जिनके पुरखों ने 1857 से 1947 तक चले स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया था। आकाश झा ने मीडिया दरबार को बताया कि उन्होंने इस फिल्म की योजना 2009 में ही बना ली थी, लेकिन इसे अंजाम तक लाने में दो साल लग गए। इस से पहले शिवनाथ झा व उनकी पत्नी नीना झा “आन्दोलन: एक पुस्तक से” नामक अभियान भी शुरू कर चुके हैं। झा के मुताबिक यह फिल्म भी उसी अभियान का एक हिस्सा है।

 

फिल्म ‘एक खोजः भारत की’ को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में लांच किया गया। शहीदों व उनके गुमनाम वंशजों की दास्तां बयान करती इस एक घंटे की फिल्म की लांचिंग वरिष्ठ पत्रकार व सांसद एचके दुआ ने की। इस अवसर पर लोकसभा टीवी के सीईओ अजय नाथ झा भी मौजूद रहे। शहनाई वादक बिस्मिला खां को समर्पित इस फिल्म के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई है कि किस प्रकार 1857 की क्रांति से लेकर 1947 तक के सभी क्रांतिकारी वीरों के वंशजों को मुश्किल में गुजारा करना पड़ रहा है। तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, उधम सिंह जैसे वीरों ने देश के लिए अपने प्राण की बलि दी, लेकिन उनके परिवार वालों को वो इज्जत नहीं बख्शी जा रही है, जिसके वे हकदार हैं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Shivnath Jha says:

    मेरे पिताजी कहते थे: “हर बाप को अपने बेटे के नाम से जाना जाना चाहिए, मृत्यु के समय यमराज भी आशीष देते हैं”. हमने कोशिश की और यह बात अपने पुत्र को भी बताया हूँ. आप क्या कहते हैं?

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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