/कितना काम आएगा युवाओ को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों का लॉलीपाप?

कितना काम आएगा युवाओ को रिझाने के लिए राजनीतिक दलों का लॉलीपाप?

-धीरेंद्र अस्थाना||
देश की संसद में बड़ी-बड़ी बातें करने वाली राजनीतिक पार्टियां प्रायोगिक तौर पर अपनी ही बातों से मुकर जाती है। जिस की बानगी दिख रही है यूपी चुनावों में। हम बात कर रहै हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह की। उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए समाजवादी पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है। कभी अंग्रेजी और कम्प्यूटर शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी का नया चेहरा शुक्रवार को जारी घोषणा पत्र में देखने को मिला है। पार्टी ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों को मदरसों में तकनीकी शिक्षा के लिए सरकार विशेष बजट उपलब्ध करवाएगी। नेता जी के लिए तो बस हम यही कहना चाहेंगे ये जनता है जा सब जानती है। इसकी नजरों से बचना संभव नहीं है।
चुनाव का मौसम है और राजनीतिक दलों के नेता वायदे में जुटे हुए हैं। इसी की श्रृखंला में सपा मुखिया भी पिछले शुक्रवार को अपने चुनावी घोषणा पत्र में बोल पड़े कि इस बार प्रदेश में यदि उनकी सरकार बनती है तो प्रदेशवासियों को को क्या क्या तोहफे देेंगे। अब उन्होंने पिछली बार मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए प्रदेश के सभी वर्गों की छात्राओं को साइकिल बांटने की योजनाएं चलाई थी, जिस पर अमल तो किया गया, लेकिन उन्हें भी शायद ये नहीं पता होगा कि क्या पूरे प्रदेश की कन्याओं को साईकिल वितरण हो पाई थी। इसका जवाब तो शायद मुलायम के पास नहीं होगा, लेकिन अब बात है टेबलैट और लैपटाप की तो क्या मुलायम अपने वादे पर खरे साबित हो सकेंगे। बात तो ये भी है कि अब यदि मुलायम सिंह ने जनता से वादा तो कर दिया और अब इसे पूरा करने में क्या क्या जदोजहद करनी पड़ सकती हैं। वहीं प्रदेश के किसानों को सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगें। 65 आयु वर्ष से ऊपर के किसानों को पेंशन मिलेगी, एक हजार रूपये बेरोजगारी भत्ता आदि कई ऐसे वादें किये है जिन पर अमल कर पाने के लिए क्या प्रदेश के पास इतना बजट होगा? क्या ये सारे वादे सिर्फ वादे ही रह जाएंगे? क्या बेरोजगारों को बिना किसी घोटालें के भत्ता मिल सकेंगा। तो सपा के मुखिया मुलायम ने आम जनमानस को ये लालीपाप तो दे दिया है अब देखना ये है कि यदि समाजवादी पार्टी की सत्ता बनती है तो इस पर कितना अमल हो सकेंगा।
वहीं उधर विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सभी दलों ने वादों की झड़ी लगा दी है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने बीते दिनों अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए यह घोषणा की थी कि उत्तर प्रदेश में यदि उसकी सरकार बनी तो वह छात्रों के बीच लैपटाप व टैबलेट बांटेगी। इससे पहले समाजवादी पार्टी ने भी जनता से कुछ इसी तरह का वादा किया था। पार्टी ने अपने इस घोषण पत्र में छात्रों से लेकर महिलाओं और किसानों सहित समाज के हर वर्ग को लुभाने की कोशिश की है। पार्टी ने सरकार बनने की स्थिति में मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में लाडली लक्ष्मी योजना चलाने और बिहार की तर्ज पर स्कूली बालिकाओं को साइकिल बांटने की बात कही है। तो क्या ये वादे जनता से वोट लेने के लिए काफी होगे। या फिर किसानों को लुभाने के प्रयास के तहत पार्टी ने 1000 करोड़ रुपये का राहत कोष और उनके लिए कृषक कल्याण आयोग गठित करने का वादा किया है। साथ ही उन्हें 24 घंटे बिजली देने की बात भी कह दी है। पार्टी ने शिक्षकों के लिए भी आयोग गठित करने की बात कही है। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को रिझाने के प्रयास के तहत सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण देने की बात भी कही है। साथ ही स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित करने का वादा तक किया है। लेकिन क्या ये वादे उस जनता के लिए मुकमल होगें जो ये सोचकर नेता चुनती है, और ऐसे में यदि आम जनमानस से जुड़े लोगों के वादांे पर पानी फिर जाता है तो शायद इसका कष्ट जनता को सबसे ज्यादा होता है। अपने जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण देने की केंद्र सरकार की घोषणा का विरोध किया है और कहा है कि इस सम्बंध में वह सरकार को संसद से सड़क तक विरोध करेगी। इस बयान पर भाजपा ने शायद ये नही सोचा कि अल्पसंख्यकों के लिए हम सड़को पर उतरकर विरोध तो करेंगे। लेकिन जारी घोषणा पत्र से जब जनता नाखुश होगी तो क्या अन्य विपक्षी दल शांत रहेंगे।
इन दोनो पार्टियो की स्थिति को देखते हुए ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने जनता से वोट लेने के लिए नये नये तरीके अपना रखे है उसी का नतीजा है कि दोनों ही पार्टियो ने अपने अपने वोटो को बचाने के लिए युवा मतदाताओं को अपनी ओर खिचा हैं। जिससे एक बात तो साफ है कि युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए दोनो पार्टियों ने 12वीं पास सभी छात्रों को लैपटाप उपलब्ध कराने का वादा किया है और दसवीं पास छात्रों को टेबलैट दिया जाएगा। मतदाताओं को रिझाने के बाद अब इस बात की क्या गारंटी है कि ये दोनों बड़ी पार्टियां जनता के साथ किये गये वादो को पूरा कर सकेंगी।

धीरेंद्र अस्थाना
धीरेंद्र अस्थाना संवाददाता लोकमत लखनऊ 9415001924

इन दोनों भाजपा के प्रमुख नेता सुषमा स्वराज, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज हुसैन, सूर्य प्रताप शाही, नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेई आदि है और सपा में भी मुखिया मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह, आजम खान, मोहन सिह, बृज भूषण तिवारी आदि कई लोग है जो इन दिनों पांचो प्रदेशों की विधानसभा सीटों में जाकर चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं और जनता को सपने दिखा रहे हैं। इन चुनावी घोषणा पत्रों में सपा ने तो दसवीं पास छात्रांे को लैपटाप का लालीपाप दिया तो वहीं भाजपा ने बेहद रियायती दर पर छात्रों को लैपटाप देने के साथ-साथ युवाओं के सर्वांगीण विकास के युवा आयोग गठित करने की बात कहीं और हद तो तब हो गई जब क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर बेरोजगार युवाओं को बात कह डाली। अभी आम जनमानस का इन दोनों बड़ी पार्टी के लालीपाप से मन भरा भी नही था और ऐसे में कांग्रेस ने युवाओं को कोई उपहार देने के बजाय पांच सालों में बीस लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा कर डाला। युवा छात्र मतदाताओं को रिझाने के लिए कांग्रेस ने छात्र संघों के चुनाव करवाने का वायदा भी किया है। तो कुल मिलाकर यदि इस बार के चुनाव पर नजर डाली जाए तो ये साफ है कि इस बार का बड़ा वोट बैंक युवा है और इन्हें रिझाने के लिए दल किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं।


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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.