/पुलिस की कार्रवाई तो मनमानी थी ही, रामदेव ने भी नहीं किया सहयोग : सुप्रीम कोर्ट

पुलिस की कार्रवाई तो मनमानी थी ही, रामदेव ने भी नहीं किया सहयोग : सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल 4-5 जून की मध्य रात्रि को रामलीला मैदान में की गई पुलिस की कार्रवाई को मनमाना करार देते हुए गुरुवार को कहा कि वहां से बाबा रामदेव तथा उनके समर्थकों को उठाने के लिए पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। न्यायालय ने योग गुरु बाबा रामदेव को भी पुलिस के साथ सहयोग नहीं करने के लिए आड़े हाथों लिया। न्यायालय ने कहा कि 4-5 जून की मध्य रात्रि को की गई पुलिस कार्रवाई, जिसमें एक महिला की मौत हो गई, सरकार की ‘ताकत’ का प्रदर्शन था।

न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान तथा स्वतंत्र कुमार ने बाबा रामदेव को भी पुलिस के साथ सहयोग नहीं करने तथा पुलिस द्वारा निषेधाज्ञा लागू करने के बाद भी अपने समर्थकों से उठने के लिए नहीं कहने पर आड़े हाथों लिया।

न्यायालय ने इस कार्रवाई में बुरी तरह घायल हुई और बाद में अस्पताल में दम तोड़ने वाली हरियाणा की महिला राजबाला के परिजनों को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।

साथ ही गम्भीर रूप से घायल होने वालों को 50,000 और अन्य घायलों को 25,000 रुपये की मुआवजा राशि देने के भी निर्देश दिए।

न्यायालय ने बाबा रामदेव के ट्रस्ट को मुआवजे की 25 प्रतिशत राशि का भुगतान करने के लिए कहा।

अपने फैसले में न्यायमूर्ति चौहान ने पुलिस की कार्रवाई को मौलिक तथा मानव अधिकारों का उल्लंघन भी करार दिया।

उन्होंने कहा कि धारा 144 शांति भंग होने से रोकने के लिए लगाई जाती है, न कि शांति भंग करने के लिए। रामलीला मैदान में रात में मौजूद लोग सो रहे थे। वह हिंसक भीड़ नहीं थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.