/राजनीति की भेंट चढ़ा उत्तर भारत का ‘मैनचेस्टर’

राजनीति की भेंट चढ़ा उत्तर भारत का ‘मैनचेस्टर’

विद्याशंकर राय-||

सूती कपड़ों के उत्पादन और गुणवत्ता में देश-विदेश में कभी धमक रखने वाली यहां की कपड़ा मिलें आज गुजरे जमाने की चीज हो गई हैं। जिन कपड़ा मिलों के लिए कानपुर को उत्तर भारत के ‘मैनचेस्टर’ का दर्जा प्राप्त था और यहां की एल्गिन मिल से तैयार तौलिये की तारीफ अमेरिका के होटलों में हुआ करती थी। उन मिलों ने अब धुआं उगलना बंद कर दिया है। मिलों के बेरोजगार मजदूरों को चुनावी मौसम में लॉलीपॉप हालांकि, जरूर थमाई जा रही है। 

वर्ष 1862 में शुरू हुई एल्गिन मिल कानपुर में सूती कपड़े की पहली मिल थी। कानपुर में सार्वजनिक क्षेत्र की ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) के अलावा निजी क्षेत्र की तमाम कपड़ा मिलें जब चलती थीं, तो यहां प्रतिदिन न केवल लाखों मीटर कपड़ा तैयार होता था बल्कि इनकी धड़धड़ाती आवाज के साथ मजदूरों की धड़कनें भी चलती थीं। इन मिलों में काम करना गौरव की बात होती थी।

कानुपर की स्वदेशी कॉटन मिल में काम कर चुके राघवेंद्र प्रजापति ने बताया कि गंगा के किनारे होने की वजह से यहां कपास का अच्छा उत्पादन होता था। इससे लाखों लोगों की रोजी-रोटी चलती थी।

राघवेंद्र ने बताया, “बीते दो दशक में यहां एक के बाद एक मिलें बंद कर दी गईं। आज लाल इमली और जेके कॉटन को छोड़ कोई भी मिल चालू नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।”

केंद्र सरकार के आधा दर्जन मंत्री उत्तर प्रदेश के हैं, फिर भी बंद पड़ी मिलों को चलाने की पहल केवल कागजों तक ही सीमित रही। हाल यह है कि दक्षिण भारतीय मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों में एनटीसी की मिलें शुरू कराईं, लेकिन कानपुर में केवल घोषणाओं से काम चलता रहा।

नेताओं की पैंतरेबाजी से अब लोग पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं। एनटीसी में काम कर चुके राजेंद्र द्विवेदी ने कहा, “केंद्र और राज्य के नेता एवं मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों का विकास कराने में लगे हैं। मिलों की परवाह किसी को नहीं है।”

 

एल्गिन मिल में काम कर चुके वीरेंद्र सिंह ने बताया कि जिनके ऊपर इन मिलों को चलाने की जिम्मेदारी है, अब वही इनकी जमीनें बिकवाकर कमाई के चक्कर में पड़े हैं।

सुनहरे दिनों को याद करते हुए वीरेंद्र ने बताया कि कपड़ा मिलों में हर दिन 11 लाख मीटर कपड़ा बनता था और करीब डेढ़ लाख मजदूर इन मिलों में काम करते थे।

कानपुर के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जिलाध्यक्ष विजय सेंगर ने बताया, “अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तब शहर की बंद पड़ी मिलों को चलवाने की पूरी कोशिश हुई थी। मामला जब हल होने के समीप पहुंचा, तब तक सरकार चली गई। यदि जनता ने साथ दिया तो मिलें दोबारा चलाई जाएंगी।”

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी वर्ष 2004 तथा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में वादा किया था कि सरकार बनी तो मिलें शुरू की जाएंगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने फिर यह वादा किया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.