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महज़ दिखावा है लोकपाल बिल पर सरकारी क़वायद

By   /  June 26, 2011  /  5 Comments

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-कविता सहाय

(मीडिया दरबार की साप्ताहिक आलेख प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित)

देश में भ्रष्टाचार आज इतनी गहरी जडें जमा चुका है कि इसे रोकने के सारे उपाय फेल हो चुके हैं। यह एक ऐसा भ्रष्ट तंत्र बन गया है जहां सीवीसी तक की नियुक्ति विवादों के घेरे में आ जाती है। ऐसे मे लोगों को एकमात्र उम्मीद की किरण दिख रही है लोकपाल से।

दरअसल लोकपाल बिल एक दशकों पुराना लॉलीपॉप है और कई बार यह संसद के गलियारों में चर्चा का केंद्र बना है, लेकिन अब तक वहां से बाहर निकल कर कानून नहीं बन पाया। प्रशासनिक सुधार आयोग ने सन् 1967 में लोकपाल की स्थापना का सुझाव रखा था। सन् 1969 में इससे संबंधित विधेयक को लोकसभा ने पारित भी कर दिया, लेकिन राज्यसभा में मामला अटक गया। अब तक इसे आठ बार सरकारी विधेयक के तौर पर और छह बार गैर सरकारी विधेयक के तौर पर पारित करने की कोशिशें हुईं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। किसी न किसी बहाने यह जमीनी हकीकत नहीं बन पाया।

अब अन्ना हजारे की मुहिम के बाद सरकार इसे विधेयक के तौर पर पेश करने को तो तैयार हो गई है, लेकिन इसके मसौदे को लेकर खींचतान जारी है। सरकार और अन्ना हजारे की टीम यानि सिविल सोसाइटी ने अलग अलग मसौदे तैयार किए हैं। सिविल सोसाइटी के जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल जनता के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार किया है. उघर सरकार ने जो बिल तैयार किया है उसे देखा जाए तो इसकी जरूरत ही खत्म हो जाती है. सरकार ने एक कमजोर और नाकारा लोकपाल की कल्पना करते हुए अपना बिल तैयार किया है.

सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर ख़ुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरु करने का अधिकार नहीं होगा. सांसदों से संबंधित मामलों में आम लोगों को अपनी शिकायतें राज्यसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को भेजनी पड़ेंगी. वहीं सिविल सोसाइटी के प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल ख़ुद किसी भी मामले की जांच शुरु करने का अधिकार रखता है. इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है. सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समीति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनों सदनों के विपक्ष के नेता क़ानून और गृह मंत्री होंगे वहीं सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगसेसे पुरस्कार विजेता लोकपाल का चयन करेंगे.

कविता सहाय

सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्श दे सकता है. वह जांच के बाद अधिकार प्राप्त संस्था के पास इस सिफ़ारिश को भेजेगा. जहां तक मंत्रिमंडल के सदस्यों का सवाल है इस पर प्रधानमंत्री फ़ैसला करेंगे. वहीं जनलोकपाल बिल में एक सशक्त संस्था का प्रस्ताव रखा गया है. उसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी. सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी.

प्रस्तावित जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस भी होगी. सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्श दे सकता है. वह जांच के बाद अधिकार प्राप्त संस्था के पास इस सिफ़ारिश को भेजेगा. जहां तक मंत्रिमंडल के सदस्यों का सवाल है इस पर प्रधानमंत्री फ़ैसला करेंगे. वहीं जनलोकपाल एक सशक्त संस्था होगी. उसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी. सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस बल भी नहीं होगा. जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज़ करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस फ़ोर्स भी होगी.

आज सरकार भ्रष्टाचार से बुरी तरह घिरी हुई है. हर रोज नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं. अदालतों से जुड़े़ भ्रष्टाचार के प्रकरणों के उजागर होने के बाद जनता का धैर्य टूटने लगा है. ऐसे में लोकपाल विधेयक पर होने वाली बहस कई मामलों में अलग है. अब वह बहस सिर्फ कानून बनाने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि अब तो उस कानून के स्वरूप और उसे अमल मे लाए जाने पर जंग छिड़ी है। लोग सरकारी विधेयक को नाकाफी मानकर विरोध कर रहे हैं. भारतीय नागरिक अब किसी भी तरीके से राजनीतिज्ञों, सांसदों, न्यायपालिका, कार्यपालिका और सत्ताधीशों को लोकपाल से बहार रखने को तैयार नहीं है. सरकार को एक सशक्त लोकपाल बिल लाना ही होगा. यदि सरकार ने ऐसा करने में आना-कानी की तो भारत की जनता धैर्य छोड़ सड़कों पर उतरने में जरा भी कोताही नहीं बरतेगी.. और यदि ऐसा हुआ तो सरकार को लेने के देने पड़ सकतें हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. mahendra kumar shrivastava says:

    समाज की जड़ में यह दोष व्याप्त है. फिर भी निराश होने के बजे प्रयास करना shreyashkar है. श्री अन्ना हजारे जी का प्रयास इस की ही एक कड़ी है.अगर उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार दूर हो जायेगा तो निचले स्तर के भ्रस्ताचार को सरंक्षण नहीं मिल सकेगा इससे निचले स्तर के भ्रस्टाचार पर स्वतः कमी आने लगेगी.

  2. मैं आपके विचारों से सहमत हूँ और अन्ना हजारे जी के आन्दोलन को पूरी तरह समर्थन देता हूँ.

  3. dyuti says:

    मैं आपके इस मत से सहमत नहीं हु …..मेरा भरोसा है की लोकपाल बिल सर्कार से अच्छा परिवर्तन ला सकती है
    ………………..

  4. pankaj says:

    हार्दिक बधाइयाँ! इस ज्वलंत विषय पर आप के विचार सराहनीय है.

  5. अजीत, मुंबई says:

    बहुत सही बात कही आपने कविता जी.. आपके इस शानदार लेखन को सलाम।

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