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काटजू के बयान पर गरमाई बिहारी राजनीति, विपक्ष ने कहा हक़ीकत तो JDU-BJP ने कहा बकवास

By   /  February 26, 2012  /  No Comments

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प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष मार्केडेय काट्जू के उस बयान पर बिहार की राजनीति गरमा गयी है जिसमें यह कहा गया था कि बिहार में प्रेस पर पाबंदी है। काटजू के इस वक्तव्य पर उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि उन्हें इस तरह के विवादास्पद वक्तव्य देने की आदत है। वहीं विपक्ष के लोग श्री काटजू के वक्तव्य के साथ खड़े हो गये हैं। राजद सुप्रीमो ने कहा है कि काटजू ने जो कहा है, वही सच है।

उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू को राजनीति में उतरने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि काटजू साहब को ऐसे विवादास्पद बयान देने की आदत सी है। वैसे महत्वपूर्ण पद पर रहने वाले व्यक्ति को राजनीति से प्रेरित बातें करना उचित नहीं। बेहतर है कि वे खुलकर इस क्षेत्र में आ जायें। बिहार में प्रेस स्वतंत्र है या नहीं यह तो पत्रकार ही बेहतर बता सकते हैं। मगर लालू राज से वर्तमान शासन की तुलना करना कहीं से उचित नहीं है।

उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। शनिवार को पटना मेडिकल कालेज अस्पताल, पीएमसीएच के 87वें स्थापना दिवस समारोह में भाषण देने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने काटजू के बयान पर मीडियाकर्मियों द्वारा पूछे गये सवाल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। नीतीश ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि अर्धन्यायिक संस्था पीसीआई के अध्यक्ष काटजू ने शुक्रवार को पटना में एक कार्यक्रम में कहा था कि बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश है और भारतीय प्रेस परिषद इस संबंध में जांच के लिए राज्य में अपनी एक टीम भेजेगी।

काटजू के बयान पर पूछे गये सवाल के जवाब में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा, ‘राज्य में प्रेस बिल्कुल स्वतंत्र है। काटजू साहब को बिहार में विकास और अच्छी चीजों के बजाय यही प्रेस की स्वतंत्रता का मामला दिखाई देता है तो उन्हें बधाई है।’ बिहार विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर सरकार की ओर से नीतीश कुमार ने जवाब देते हुए गुरुवार को कहा था कि बिहार में मीडिया स्वतंत्र है। प्रेस पर कोई बंधन नहीं है।

उधर जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘प्रेस परिषद के अध्यक्ष का बयान अखबारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए दिया गया बयान है। सरकार द्वारा बिहार में मीडिया पर अंकुश लगाने की बात गलत है। अपने बयानों से मीडिया में कैसे छपा जाए, काटजू का इस कला में किसी से मुकाबला नहीं है। जब वह जज थे तो भ्रष्टाचारियों को लैंपपोस्ट पर लटका देने की बात कही थी, जो अखबारों में खूब प्रकाशित हुई थी।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अखबारों में किस प्रकार छपा जाए, इसका हुनर नेताओं को भी उनसे काटजू से सीखना चाहिए।’’ तिवारी ने मीडियाकर्मियों से पलटकर सवाल किया, ‘‘क्या आपको लगता है कि बिहार में मीडिया पर सरकार का कोई दबाव है? काटजू का बयान अखबारों में प्रमुखता से छपा है, यदि नीतीश सरकार का दबदबा रहता तो यह खबर नहीं छपती।’’

हालांकि विधानमंडल के निचले सदन में अपने बयान के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था , ‘मीडिया अपनी बात कहने को स्वतंत्र है लेकिन कुछ एकपक्षीय बात दिखा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो न जाने क्या क्या लिखा जा रहा है। खिलाफ दिखाने से थोड़े ही फर्क पड़ता है। असत्य दिखाने से कुछ नहीं होता राज्य की जनता जमीन देखती है। हम लगातार जनता के बीच घूमते रहते हैं।’ नीतीश ने कहा था कि जनता के बीच रहना राजधर्म है और वह जनता के खजाने के ट्रस्टी हैं।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने काटजू के बयान को और आगे बढ़ाते हुए कहा ‘‘मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दबाव में बिहार में प्रेस की आजादी खत्म हो गयी है। बिहार में प्रेस पर इतना दबाव है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ जो भी बयान प्रेस के दफ्तरों में जाता है उसे डस्टबीन में डाल दिया जाता है।’’

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने भी कहा कि श्री काटजू के वक्तव्य से सारी स्थिति सामने आ गयी हैं। मीडिया पर बिहार में जो दबाव है वह काटजू के बयान से सामने आ गयी है।(एजेंसी)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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