/GN Gold को बचाने में क्यों जुटे हैं दूसरे चिटफंडियों पर कार्रवाई करने वाले?

GN Gold को बचाने में क्यों जुटे हैं दूसरे चिटफंडियों पर कार्रवाई करने वाले?

राजस्थान समेत देश के कई राज्यों में अपना जाल फैला चुकी जीएन गोल्ड के खिलाफ शिकायतों के बाद भी आखिर पुलिस इनके खिलाफ जांच या कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। राजस्थान में पुलिस ने शिकायतों के बाद गोल्ड सुख और अन्य दूसरी कई चिटफंड कंपनियों पर कार्रवाई की परन्तु चित्तौडगढ़ में मामला दर्ज कराए जाने के बाद भी पुलिस ने इस कंपनी पर हाथ डालने की जहमत नहीं उठाई। इसको लेकर कांग्रेसी सरकारों और पुलिस पर भी उंगलियां उठ रही हैं।

बताया जा रहा है कि जीएन गोल्ड कंपनी के गोरखधंधे का पूरा पता राजस्थान पुलिस को है, पर कुछ कांग्रेसी नेताओं की शह पर इस चिटफंड कंपनी पर हाथ नहीं डाल रही है। सूत्र बताते हैं कि जीएन गोल्ड के मालिकों के नजदीकी संबंध राजस्थान और कई प्रदेश के बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ हैं, जिसका फायदा इनको मिल रहा है। जीएन ग्रुप का चिटफंड के अलावा भी कई धंधे हैं, जिनमें डेयरी, फाइनेंस, एजुकेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और मीडिया शामिल हैं। कंपनी ने अपने दूसरे धंधों से जुड़ी सूचनाएं तो एक वेबसाइट पर दी है, पर जीएन गोल्ड को इस मुख्य वेबसाइट से बिल्कुल अलग रखा है। इससे जीएन गोल्ड की स्थिति और भी संदिग्ध हो जाती है।

बताया जा रहा है कि जयपुर में रजिस्टर्ड इस कंपनी के खिलाफ पिछले साल चित्तौड़गढ़ में मामला दर्ज कराया गया था। पुलिस ने प्रारम्भ में तो सक्रियता दिखाते हुए इस कंपनी के कर्मचारी को गिरफ्तार भी किया था, फिर इसके बाद पुलिस ने आसाधरण चुप्पी तान ली। बताया गया कि पुलिस की ये चुप्पी कुछ कांग्रेसी नेताओं के इशारे पर धारण की गई थी। इस दौरान आरसीएम, गोल्ड सुख जैसी कंपनियों पर तो कार्रवाई हुई पर जीएन गोल्ड को बख्श दिया गया। जिससे इस कंपनी का मनोबल और बढ़ गया। लोगों की शिकायतों के बाद भी इस कंपनी का बाल बांका भी नहीं हो सका, जबकि इसके जैसा ही धंधा करने वाली गोल्ड सुख को पुलिस ने नेस्तनाबूद कर दिया।

बताया जाता है कि अपने चिटफंड कंपनी को भी प्रश्रय और छत्रछाया उपलब्ध कराने के लिए जीएन गोल्ड मीडिया के क्षेत्र में कदम रखा। जीएनएन न्यूज एवं भक्ति चैनल लांच किया। भक्ति चैनल के बारे में तो कहा जाता है कि कंपनी ब्लैकमनी को सफेद करने के लिए ही इसे लांच किया गया। जीएनएन न्यूज को लांच करने के समय से ही लोचा चल रहा है। इसमें ऐसे हेड को लाने की कोशिशें हुई जो सारे गोरखधंधें को प्रश्रय दे सके। जो हेड इस काम के मुफीद नहीं रहा उसे महीने चार महीने में बाहर कर दिया गया। अमिताभ भट्टाचार्य, शिव कुमार राय, राघवेश अस्थाना जैसे कई नाम हैं, जो कंपनी के गोरखधंधों को कार्यरूप देने के लिए उतरे तो सही, लेकिन नाकाम रहने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इस समय महरूफ रज़ा चैनल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस का भोंपू कहा जाता है। बताया जा रहा है कि चैनल की हालत खस्ता है। कर्मचारियों को समय से वेतन नहीं मिल रहा है, इसके बावजूद इसे चलाया जा रहा है ताकि जीएन गोल्ड जैसी चिटफंड कंपनी को शेल्टर दिया जा सके। पिछले दिनों चैनल के कर्मचारियों ने सैलरी न मिलने पर बुलेटिन भी नहीं चलने दिया था, किसी तरह समझा बुझाकर काम शुरू करवाया गया। इस मामले में जीएन गोल्ड का कोई कर्मचारी कुछ ज्यादा बोलने को तैयार नहीं है। सारी बातें कार्यालय में आकर करने को कहा जाता है। मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में तमाम चिटफंड कंपनियों तथा मीडिया में कदम रखने वाले चिटफंडियों को खिलाफ कार्रवाई तो होती है, पर जीएन गोल्ड पर चार सौ बीसी का मामला दर्ज होने के बाद भी जांच को आगे नहीं बढ़ाया जाता है, आखिर क्यों?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.