Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

समाजवादियों में परिवारवाद?: कौन बनेगा मुख्यमंत्री पर तेज होने लगी माथापच्ची

By   /  March 4, 2012  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

– अमलेन्दु उपध्याय

एक्जिट पोल्स बता रहे हैं कि समाजवादी पार्टी थोक भाव में सीटें लाकर सरकार बनाने जा रही है. उधर ख़बरें आने लगी हैं कि मुलायम सिंह यादव के ज्येष्ठ पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. ताल खुदने से पहले ही मेंढकों ने टर्र-टर्र करना शुरू कर दिया है. सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने लगभग आदेश की मुद्रा में कह दिया है कि अखिलेश मुख्यमंत्री  बने तो उन्हें अच्छा लगेगा. गोया उत्तर प्रदेश मास्टर साहब की जागीर है सो उन्हें जो अच्छा लगे वही किया जाये.दरअसल ये पार्टी के चुनकर आने वाले विधायकों को आदेश है कि युवराज की ताजपोशी के लिए तैयार रहो.  लेकिन मास्टर रामगोपाल से पुरानी अदावत रखने वाले मुलायम सिंह यादव के सगे अनुज शिवपाल यादव ने बयान दे दिया है कि मुख्यमंत्री नेता जी बनेंगे, यानी इशारों इशारों में उन्होंने साफ़ कह दिया है कि अखिलेश इतनी आसानी से मुख्यमंत्री कैसे बन जायेंगे?

उधर पार्टी के फायर ब्रांड नेता मोहम्मद आज़म खान ने अपना कोई तीर नहीं खोला है. याद हो कि जब अखिलेश क्रान्ति रथ लेकर प्रदेश के दौरे पर निकले थे तब आज़म खान ने ही उन्हें हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था. पार्टी के अंदरूनी सत्ता संग्राम में अब सबकी निगाहें उनकी तरफ लग गई हैं क्या अब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनने को वह लाल झंडी दिखाएँगे? चुनाव के दौरान जिस तरीके से अखिलेश की तरफ से आज़म खान के खिलाफ दांव चले गए उससे खान साहब तिलमिलाए हुए हैं. जो लोग आज़म खान को जानते हैं उन्हें मालूम है कि उनके शब्दकोष में “माफी” नाम की जगह नहीं है. वह किसी को माफ़ नहीं करते हैं. ऐसे में अखिलेश की राह में कांटे ही कांटें हैं.

सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि अगर सरकार सपा की बन रही है तो इसमें अखिलेश का क्या योगदान है? सही मायनों में इसमें योगदान तो सबसे ज्यादा बहन जी का है. अगर मायावती पिछले पांच साल के शासनकाल को राग द्वेष से ऊपर उठकर सही प्रशासन दे पातीं और उनकी सरकार में जबरदस्त लूटपाट न मची होती तो क्या सपा को यह अवसर मिल सकता था? मुलायम सिंह जी को चाहिए कि अगर उनकी सरकार बनने की किसी तरह नौबत आ जाये तो मिठाई का डिब्बा लेकर सबसे पहले बहन जी के पास जाएँ.

वैसे सवाल यह है कि अखिलेश का पार्टी के लिए योगदान क्या है? अगर अखिलेश ही मुख्यमंत्री बनते हैं तो तो सपा का और राजनीति का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं होगा. अगर अखिलेश का सिर्फ यही योगदान है कि वे मुलायम सिंह जी के पुत्र हैं तो उनसे ज्यादा अच्छे तो प्रतीक यादव रहेंगे, वे भी नेता जी के पुत्र हैं और अखिलेश के मुकाबले ज्यादा युवा हैं.

और सवाल यह भी है कि  मुलायम सिंह जी के बाद अखिलेश का ही नंबर क्यों? नौ प्रतिशत यादव मतदाता के बल पर  तीन बार मुख्यमंत्री और अब बेटे की बारी. सामाजिक न्याय के योद्धा और डॉ. लोहिया के वारिस नेता जी का दल  1993 से जिन 18 प्रतिशत मुसलमानों के बल पर सत्ता में आता रहा और राजनीति में मलाई काटते रहे उन मुसलामानों में से किसी को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बना सकता? या जिन्होंने पार्टी को खडा किया और तमाम दुश्वारियों के बावजूद पार्टी का दामन नहीं छोड़ा वो कार्यकर्ता मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता?

अगर “सपा” प्रोप्राइटर फर्म नहीं है तो आज़म खान को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, अगर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो शिवपाल सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए क्योंकि पूरे पांच साल मायावती सरकार के थप्पड़ और सिपाहियों के घूंसे तो शिवपाल ने ही खाए हैं.. और प्रोप्राइटर फर्म है तो फिलहाल अखिलेश बेहतर रहेंगे, लेकिन समाचार चैनल्स के एक्सिट पोल्स सुनकर दिल बहुत जोर जोर से काँप कर रहा है. खुदा करे ये झूठे साबित हों. अगर ये सच हो गए तो पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है. नेता जी के कर्णधारों ने गुंडागर्दी मचाने की तैयारियां पूरी कर ली बताई जाती हैं.

हालांकि तर्क दिया जा रहा है कि डीपी यादव के मामले पर अखिलेश ने समझदारी दिखाई है। पार्टी के लिए यह एक मौका है। लेकिन प्रति प्रश्न है कि डी पी यादव के मसले पर जैसी समझदारी दिखाई वैसी समझदारी श्री भगवान् शर्मा उर्फ़ गुड्डू पंडित के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? वीर सिंह के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? अमरमणि के पुत्र अमनमणि के मसले पर क्यों नहीं दिखाई? क्या डी पी यादव, इन महानुभावों से भी गए गुजरे हैं? राजनीति में आने के बाद न तो डीपी यादव के ऊपर अपराध के कोई आरोप लगे हैं और न उससे पूर्व भी उनके अपराध उस श्रेणी के थे जिस श्रेणी के अपराध अमरमणि और गुड्डू पंडित के थे. फिर इस भोथरे तर्क का असल मकसद क्या है?

दरअसल ये चुनाव के दौरान ही मुलायम सिंह की तरफ से अखिलेश की राह आसान बनाने के लिए और आज़म खान को किनारे करने के लिए चला गया दांव था. इसलिए अखिलेश से ही डीपी का प्रवेश रोकने का बयान दिलवाया गया और प्रचारित किया गया कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है. अगर डीपी यादव भी पार्टी में आ जाते तो जाहिर है अंदरूनी सता संग्राम में वे आज़म खान के साथ होते. चूंकि वे आज़म खान के घर पर ही पार्टी में शामिल होने पहुंचे थे और शिवपाल भी इस समूह में शामिल हो जाते तो अखिलेश के राह और ज्यादा काँटों भरी हो जाती. इसीलिये डीपी का प्रवेश रोका गया न कि इसलिए कि पार्टी दागियों से किनारा कर रही है.

अगर पार्टी वास्तव में गुंडा तत्वों से किनारा कर रही है तो बदायूं, एटा, कांशीराम नगर, फिरोजाबाद, जैसे इलाकों समेत पूरे प्रदेश में हर जिले में पार्टी की कमान उन्हीं लोगों के हाथों में क्यों है जिनके ऊपर पिछली सरकार में गुंडागर्दी करने और जनता पर ज़ुल्म करने के आरोप हैं. क्या किसी एक भी जिले में इन क्षत्रपों में से किसी एक का भी टिकट काटा गया?
अगर वाकई में सपा सरकार में आने वाली है तो तैयार रहिये पूरा प्रदेश एक अजब किस्म की आग में झुलसने वाला है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

 

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Rajesh Rathod says:

    आजकल राजनीती में परिवारवाद का ही बोलबाला है और इसके लिए हम मतदाता भी पूर्ण रूपं जिम्मेदार है.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

हारी हुई कांग्रेस को लेना चाहिए नेहरू की बातों से सबक..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: