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फिल्म, पैसा और राजनीति: तुझसे नाराज नहीं, हैरान हूँ मैं

By   /  March 5, 2012  /  2 Comments

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-प्रशांत शर्मा ।।
फिल्मों का राजनीति में काफी असर होता है यह पता था लेकिन राजनीति से फिल्में भी प्रभावित होती हैं ये अब पता चला। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘जोड़ी ब्रेकरर्स’ मुझे काफी पसंद आई लेकिन उम्मीद के अनुसार ये मुनाफा नहीं कमा सकी। इसके पीछे का राज जानने के लिए मैंने काफी सोच विचार किया। लेकिन ‘बॉडीगार्ड’ फिल्म के इस डायलॉग ने ‘मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना’ सारी पहेली सुलझा दी।

जब चुनाव से पहले कोई भी राजनीतिक दल किसी से भी जोड़ी नाने को तैयार नहीं थे और सभी दो टूक कह रहे थे कि ‘मुझ पर एक एहसान करना कि मुझसे कोई गठबंधन न करना’। फिर यूपी के ‘अग्निपथ’ में ‘जोड़ी ब्रेकरर्स’ का रिलीज होना कैसे गले उतरेगा।

पिछले चुनाव में दोधारी तलवार बनकर उभरी माया की धार इस बार कमजोर होती दिख रबही है। इससे गदगद मुलायम जी बीएसपी पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि ‘हम तुम्हें इतनी सीटों से हराएंगे कि कन्फ्यूज हो जाओगे कि दोष किसको दे और मुंह कहां छुपाएं’। इस बार के यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी अपनी पार्टी के लिए स्टार प्रचारक बनके घूमती रहीं। कई लोग इसे भाई को यूपी की सत्ता दिलाने के लिए बहना का प्रेम बता रहे थे। लेकिन मुझे लग रहा है कि भाइया को यूपी के गरीबों के घर का खाना इतना पसंद आ गया है कि बहना अब ‘अपने ब्रदर की दुल्हन‘ तलाशने लग गई हैं।

सल्लू मियां की ‘दबंग’ का एक गाना काफी चर्चा में रहा ‘मुन्नी बदनाम हुई’। यह गाना राजनेताओं को बहुत पसंद आ जाएगा यह नहीं सोचा था। इस गाने के बदनाम शब्द को राजनीति में इतना तवज्जो दी गई कि नेताओं में बदनाम होने की होड़ लग गई। कई सफेदपोशों ने विद्या बालन के उस डायलॉग को अपना लिया-‘कुछ लोगों का नाम उनके काम से होता है मेरा बदनाम होकर हुआ है’।

22 वर्षों पहले जनता दल ने यूपी की सत्ता से कांग्रेसियों के हाथ ‘ये सत्ता हमको दे दो कांग्रेसियों’ कहकर काट दिए थे। इस बार न सिर्फ कांग्रेस ने बल्कि बीजेपी ने भी सत्ता पाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। मगर न ही कांग्रेस के हाथ जुड़ते दिख रहे हैं न कमल दलदल से उभरता। अभी हाल ही में डर्टी पिक्चर ने खूब धमाल मचाया। उस फिल्म में एक डायलॉग बोला गया ‘फिल्म सिर्फ तीन चीजों से चलती है इंटरटेन्मेंट, इंटरटेन्मेंट, इंटरटेन्मेंट’। मगर राजनीति सिर्फ एक चीज से चलती है ‘तिकड़म’।

अभी सुनने में आया है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने बोलना शुरू कर दिया है। मैंने जब इसकी वजह पता की तो वह सलमान खान की एक फिल्म निकली। ‘वॉन्टेड’ में सलमान ने कहा ‘एक बार जो मैंने कमिटमेंट कर दिया उसके बाद तो मैं खुद की भी नहीं सुनता’। इससे हमारे प्रधानमंत्री जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ठान लिया कि एक बार जो वो फैसला कर देंगे उसके बाद वे सोनिया जी की भी नहीं सुनेंगे!

राजनीति को समझने के लिए फिल्मों ने मुझे बहुत सहारा दिया। एक फिल्म के डायलॉग सुनकर अब मैं समझ चुका हूँ कि सत्ता न ही राजनेताओं की चाहत है न जरूरत वो सिर्फ उनकी ‘आदत’ है।

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. धन्यावाद जशपाल जी …..

  2. jashpal singh yadav says:

    प्रशांत जी आपका लेख पढ़ाकर बहुत अच्छा लगा…… आपने आपने जिस तरह राजनीती को फिल्मों के डायलोगस से जोड़ के शब्दों को पिरोया है काबिले तारीफ है….
    और हाँ फिल्मों से सीख तो आज कल नेता ही लेते है…!!

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