/ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है।

ये अखिलेश की जीत नहीं माया की हार है।

-अमलेन्दु उपाध्याय||

अगर अखिलेश का करिश्मा है तो माया की हार कैसे है?


ऐन होली से पहले उत्तर प्रदेश में छप्परफाड़ मिली सफलता से समाजवादी पार्टी में खुशी का माहौल है। हो भी क्यो न? आखिर लगातार पांच साल सत्ता से बाहर रहकर पहली बार पार्टी प्रदेश की सरकार में आ रही है। लेकिन जितना खुशी का माहौल सपा में है उससे कई लाख गुना खुशी का माहौल हमारे मीडिया में व्याप्त है। बड़े-बड़े दिग्गज सपा की इस जीत पर युवराज अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं और अखबारों के मुखपृष्ठ पर विशेष संपादकीय लिखकर ये बताने का कार्य किया जा रहा है गोया प्रदेश में कोई बहुत बड़ी क्रांति हो गई है और बस उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है।
दरअसल हमारा मीडिया कुछ ज्यादा अतिउत्साही है। अखिलेशमय मीडिया की मौजूदा तस्वीर देखकर मुझे वर्ष 2007 का मई का महीना याद आ रहा है। हमारे यही मीडिया के सुधीजन प्रदेश में मायावती की ताजपोशी पर भी इसी तरह मायामय नज़र आ रहे थे और कई बड़े पत्रकार तो इस हद तक पहुंच गए थे कि  मायावती की जीत को दूसरी आजादी बता रहे थे ठीक उसी तरह जैसे कुछ दिन पहले अन्ना आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। लेकिन ज्यादा समय नहीं गुजरा कि यही मीडिया मायावती के पीछे हाथ धोकर पड़ गया जैसे 2003 और 2004 में मुलायम सिंह के पीछे पड़ गया था। सवाल यह है कि क्या हमारे बड़े पत्रकार वास्तव में कभी बड़े बन भी पाएंगे या ऐसी ही बचकानी हरकतें करते रहेंगे?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा को जो जीत मिली है उसमें उसके संघर्ष का भी योगदान है। लेकिन क्या केवल उसके संघर्ष से ही उसे ये जीत मिल गई है? क्या इस जीत में प्रदेश के मुस्लिम मतदाता और मायावती के कुशासन का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत में जातीय जुगलबंदी का कोई रोल नहीं है? क्या इस जीत का श्रेय

अकेले अखिलेश को दिया जाना उचित है, इसमें आज़म खां और शिवपाल और स्वयं मुलायम सिंह का कोई रोल नहीं है? अगर मीडिया में आ रहे विश्लेषणों पर नज़र डालें तो ऐसा ही लगता है गोया बस प्रदेश में अखिलेश ही अखिलेश हैं बाकी सब कूड़ा करकट हैं।
अहम प्रश्न यह है कि अगर ये केवल अखिलेश का कमाल है तो यह कमाल 2009 के लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? 2007 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं चला? उस समय भी अखिलेश मैदान में थे फिर कमाल क्यो नहीं हुआ? आखिर अखिलेश ने पिछले दिनों वे कौन से महत्वपूर्ण कार्य किए जिनके कारण उनका जादू चल गया? बसपा नेत्री मायावती जब बोलती हैं तो बहुत कर्कश और कटु बोलती हैं लेकिन बात सीधे कहती हैं फिर चाहे किसी को बुरी लगे या भली। चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा वह उनकी हताशा और बदजुबानी कहा जा सकता है लेकिन सत्य यही है कि बसपा को मुसलमानों और भाजपा व कांग्रेस ने मिलकर हराया है न कि सपा ने!

कांग्रेस ने जिस तरह ऐन चुनाव के वक्त ओबीसी आरक्षण में मुस्लिम कोटा का दांव चला उससे साफ संकेत गया कि यह मुसलमानों की बेहतरी के लिए नहीं बल्कि चुनावी फायदे के लिए किया गया है। इस मुद्दे को लेकर जिस तरह भाजपा आक्रामक हुई और बसपा से टूटे हुए नेता बाबू सिंह कुशवाहा पिछड़ों के नेता के रूप में उसके साथ जुटे उससे लगने लगा कि प्रदेश में भाजपा मजबूत हो रही है और इस डर ने मुस्लिम मतदाताओं के सामने यह स्थिति पैदा कर दी कि वे मायावती के कुशासन के खिलाफ और भाजपा को रोकने के लिए सपा के साथ हो जाएं। और यही स्थिति बन गई। अब इसमें अखिलेश का कितना योगदान है? और अगर इसे अखिलेश का करिश्मा बताया जा रहा है तो मायावती को कोसना बंद कीजिए। क्योंकि ये अखिलेश का करिश्मा है तो मायावती सरकार की नाकामी कहां से है?
इसी तरह बसपा ने ऐन चुनाव से पहले अपने लगभग आधे विधायकों के टिकट काटे। इनमें से अधिकांश चुनाव लड़े और उन सभी ने बसपा को ही नुकसान पहुंचाया।
प्रचारित किया जा रहा है कि धर्म और जाति से ऊपर उठकर यह जनादेश आया है। तो अखिलेश और मुलायम ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर तो वोट मांगा नहीं था और न सपा ने। फिर यह जाति और धर्म से ऊपर जनादेश कैसे हो गया? और अगर ये जाति धर्म से ऊपर उठकर जनादेश है तो क्या सपा भी इससे ऊपर उठकर पांच साल तक बिना राग द्वेष के सरकार चलाएगी?

अमलेन्दु उपाध्याय

सपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के खतरों के संकेत मिलना शुरू हो गए हैं। आशंकाएं निरी निर्मूल नहीं हैं और न पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। सरकार बनने की सूचना मिलते ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर जिस तरह से उत्पात मचाया है और पत्रकारों के साथ भी मारपीट की है उससे भविष्य के पांच साल का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस यज्ञ में पहली आहुति जिन लोगों ने दी है वे कोई मामूली लोग नहीं हैं। संभल में जिन विधायक जी के विजय जुलूस में गोली चली है वे सपा के एक बड़े थिंक टैंक महासचिव के बहुत खास हैं और इतने प्रभावशाली हैं कि उनके कारण ही बड़े मुस्लिम नेता शफीकुर्रहमान वर्क को पार्टी छोड़नी पड़ी थी। इसी तरह झांसी में मिनी मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले एक नेता जी शिवपाल सिंह के पार्टी की कमान संभालने से पहले प्रदेश में पार्टी की कमान संभालते थे, वहां भी जो घटनाएं हुई हैं वे भविष्य की कहानी कह रही हैं। इन घटनाओं से पार्टी अगर सबक लेती है तो ठीक है, वरना जो मीडिया आज अखिलेशमय नज़र आ रहा है वही चार महीने में उनके खिलाफ उसी तरह खड़ा नज़र आएगा जैसे पिछले पांच सालों में मायावती के खिलाफ खड़ा था और पिछली सरकार में मुलायम सिंह के खिलाफ खड़ा था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप  के संपादक)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.