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दीपक चौरसिया ने डीपी यादव से कहा: मैं जिंदगी भर नहीं बदलूंगा चैनल

By   /  March 9, 2012  /  2 Comments

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अक्सर टीवी पर चल रही बहस के दौरान नेताओं और ऐंकरों की थुक्कमफजीहत होते रहती है। न्यूज़ ऐंकर की कोशिश होती है कि नेताजी को घेरा जाए और नेताओं की कोशिश होती है कि बिना फंसे अपना एजेंडा रखते हुए स्क्रीन से खिसक लिया जाए। इस कोशिश में नेता और ऐंकर कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं। कभी ऐंकर आक्रामक रूख अख्तियार कर लेता है तो मेहमान समय की कमी का बहाना कर बीच कार्यक्रम से ही उठ कर चला जाता है, लेकिन कुछ नेता ऐसे हैं जो एंकर से ही कुछ सवाल कर उन्हें घेरने की कोशिश करते हैं।

ऐसा ही हुआ चुनाव के एक कार्यक्रम में 06 जनवरी, 2012 को जब स्टार न्यूज़ पर ‘बाहुबली’ डीपी यादव और ‘बड़बोले’ दीपक चौरसिया के बीच गर्मागर्म बहस छिड़ गई। सवाल-जवाब के दौरान दीपक चौरसिया एक-एक कर डीपी यादव का कच्चा-चिठ्ठा खोल रहे थे और बाहुबली नेता अपने बचाव में तर्क दर तर्क पेश कर रहे थे।

दरअसल, मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव के विरोध की वजह से डीपी यादव की समाजवादी पार्टी में एंट्री होते-होते रह गई थी। बाद में डीपी ये कहने लगे कि उन्होंने कभी समाजवादी पार्टी का रुख भी नहीं किया था। डीपी ने स्टार न्यूज़ पर कहा, ”मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव ने क्षेत्र के विकास के लिए मुझे पार्टी में शामिल होने का न्‍यौता दिया था। मैंने अखिलेश यादव के पास जाकर उनसे कभी टिकट नहीं मांगा।”

दीपक चौरसिया ने डी पी यादव को कहा कि वे हवा के रूख के साथ चलते हैं और अपने फायदे के हिसाब से पार्टियां बदलते हैं। नेताओं की आदत के मुताबिक़ डीपी यादव ने यहाँ भी अपने आप को सही ठहराने की कोशिश की। इसी बीच दीपक चौरसिया ने डीपी यादव से कहा, ”चलिए आपकी सारी बातें मान लेते हैं, लेकिन क्या अब आप यह कसम खाते हैं कि अब आप पार्टी नहीं बदलेंगे, दूसरी पार्टी का दरवाजा नहीं खटखटाएंगे और अपने दम पर लड़ेंगे? क्या आप कसम खाते हैं कि अब आप पार्टियों की अदला-बदली का खेल नहीं खेलेंगे?”

दीपक के इस सवाल का डीपी यादव ने कोई सीधा जवाब तो नहीं दिया, उलटे सवाल करने लगे, ”दीपक जी यह कसम तो आप भी नहीं उठा सकते कि आप स्टार में रहेंगे कि आजतक में चले जाएंगे या फिर आजतक में रहेंगे या ज़ी टीवी में चले जाएंगे।”

डीपी यादव ने दीपक को उलझाने की नीयत से ये सवाल किया, लेकिन दीपक तो दीपक हैं। बिना सोच-विचारे उन्होंने कह डाला कि मैं यह कसम उठाने के लिए तैयार हूँ, आप कसम लेंगे तो मैं भी कसम लेने के लिए तैयार हूँ।

डीपी तो उनके सवाल को हंस कर टाल गए लेकिन दीपक का ये आत्मविश्वास मीडिया की अस्थिर जिंदगी के लिए एक सवाल खड़ा कर गया। क्या दीपक चौरसिया अवीक सरकार के साथ जिंदगी भर रहने का दावा कर सकते हैं? अगर ऐसा ही था तो उन्हें इसके पहले इतने संस्थानों को क्यों छोडना पड़ा? क्यों वे आजतक में नक़वी की तानाशाही बर्दाश्त नहीं कर पाए और क्यों स्टार न्यूज़ में देबांग की ऐंट्री के समय (या दूसरे कई मौकों पर) उन्हें इस्तीफे की धमकी देनी पड़ी?

मीडिया और राजनीति दोनों की कड़वी सच्चाई यही है कि यहा किसी भी पार्टी या संस्थान में कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं रहता। बहरहाल, आप भी इस बतकही को देख सकते हैं जो करीब 25 मिनट के आस-पास हुई है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. deepak ji bhi channal badaalte rahenge or D P yadav bhi partiya badalte rahenge.

  2. डी.पी.यादव
    ——————-
    चौरसिया जी ने निश्चित रूप से डी.पी.यादव को इतना कुछ कहने का आपने मौका दिया, डी.पी.यादव की जिस सायकिल की बात आपने किया है, दरअसल सायकिल की सवारी की बात जिस समय की आप कर रहे हैं उस समय कोई भी गरीब आदमी जब कोई धन्द्धा करने जाता है तो पारम्परिक पेशा सबसे पहले नज़र आता है. यदि डी.पी.यादव ने ऐसा किया तो क्या बुरा किया ?
    डी.पी.यादव भी एक इंसान हैं ‘आज की तारीख (०९-०३-२०१२) को जिस मुलायम की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में बहुमत से चुनी गयी है’ को आपके मीडियाकर्मी “भाई” चौरसिया जी “गुंडा राज” से संबोधित कर रहे हैं क्यों ?
    डी.पी.यादव ने भी यदि वही सब करके धनार्जन किया जैसे ‘आपने’ किया है, पर फरक ये है की आप फंस गए और पता भी नहीं चला की आप कैसे हैं और आपकी ‘बेबाकी’ जो जानते हैं आपको उनसे नहीं चलती, वह आपके मुहँ पर सब कर सकते हैं. अतः डी.पी.यादव को जिस तरह आप ललकार रहे थे,आप जैसे पत्रकारों को वैसे ही लपलपाते हुए देखा है “डी.पी.यादव भी उसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं जहाँ से सारे ‘यादव’ आते हैं इन्होने प्रतिकार करके सबको मुहं तोड़ जवाब दिया तो ये “माफिया,गुंडे,अपहरंकर्ता बना दिए गए,” इस देश का कौन नेता है जिसका दामन साफ हो और आसमान पर पहुँच गया हो, कितने लाल बहादुर शास्त्री हैं, लोहिया के कौन से खानदानी ‘समाजवादी’ हैं. या विश्वनाथ प्रताप सिंह हैं. हाँ डी.पी.यादव ने अपने बाहुबल से या धनबल से राजनीती में अपनी जगह बनायी उसका प्रभाव किस तरह से पडा यह अलग बात है.
    दीपक जी मेरे बहुत सारे मित्र ‘पत्रकारिता में हैं अगड़ी और पछड़ी जातियों’ के पर आप जैसा उत्थान तो किसी का नहीं हुआ , क्या आप दिल पर हाथ रखकर कहेंगे सब कुछ आपकी कविलियत पर हुआ, आप कहीं से भी सुरेन्द्र प्रताप सिंह की परम्परा में नहीं आते हैं ‘तिकड़म की पत्रिकारिता.’ कोई आपसे सीखे.
    डी.पी.यादव का मैं प्रशंशक हूँ इसलिए नहीं की मैंने उनसे कोई लाभ लिया है या दूर से सूना है मैंने देखा है उस व्यक्ती की जीवन्तता, टकराने की हिम्मत, साथ देने की इक्षा, लड़ने की दिशा, यदि यही द्विज होते तो इन्हें सिरपर बैठाकर ‘अभिनन्दन किया जा रहा होता’.पारिवारिक तौर पर उनके पिता जी जितने महान हैं, बहुत कम लोगों के पिता जी इस तरह के होते हैं विशुद्ध ‘आर्यसमाजी’ सात्विक और विचारवान. मैंने दीपक को देखा है ‘वैशाली वाले घर और बदलते हुए जीवन दर्शन से’.
    दीपक जी आप से अच्छी तरह कौन जानता है आगे बढ़ते जाने का राज “अडवानी जी के जमाने और उससे विरक्ति तक का…….

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