/दीपक चौरसिया ने डीपी यादव से कहा: मैं जिंदगी भर नहीं बदलूंगा चैनल

दीपक चौरसिया ने डीपी यादव से कहा: मैं जिंदगी भर नहीं बदलूंगा चैनल

अक्सर टीवी पर चल रही बहस के दौरान नेताओं और ऐंकरों की थुक्कमफजीहत होते रहती है। न्यूज़ ऐंकर की कोशिश होती है कि नेताजी को घेरा जाए और नेताओं की कोशिश होती है कि बिना फंसे अपना एजेंडा रखते हुए स्क्रीन से खिसक लिया जाए। इस कोशिश में नेता और ऐंकर कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं। कभी ऐंकर आक्रामक रूख अख्तियार कर लेता है तो मेहमान समय की कमी का बहाना कर बीच कार्यक्रम से ही उठ कर चला जाता है, लेकिन कुछ नेता ऐसे हैं जो एंकर से ही कुछ सवाल कर उन्हें घेरने की कोशिश करते हैं।

ऐसा ही हुआ चुनाव के एक कार्यक्रम में 06 जनवरी, 2012 को जब स्टार न्यूज़ पर ‘बाहुबली’ डीपी यादव और ‘बड़बोले’ दीपक चौरसिया के बीच गर्मागर्म बहस छिड़ गई। सवाल-जवाब के दौरान दीपक चौरसिया एक-एक कर डीपी यादव का कच्चा-चिठ्ठा खोल रहे थे और बाहुबली नेता अपने बचाव में तर्क दर तर्क पेश कर रहे थे।

दरअसल, मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव के विरोध की वजह से डीपी यादव की समाजवादी पार्टी में एंट्री होते-होते रह गई थी। बाद में डीपी ये कहने लगे कि उन्होंने कभी समाजवादी पार्टी का रुख भी नहीं किया था। डीपी ने स्टार न्यूज़ पर कहा, ”मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव ने क्षेत्र के विकास के लिए मुझे पार्टी में शामिल होने का न्‍यौता दिया था। मैंने अखिलेश यादव के पास जाकर उनसे कभी टिकट नहीं मांगा।”

दीपक चौरसिया ने डी पी यादव को कहा कि वे हवा के रूख के साथ चलते हैं और अपने फायदे के हिसाब से पार्टियां बदलते हैं। नेताओं की आदत के मुताबिक़ डीपी यादव ने यहाँ भी अपने आप को सही ठहराने की कोशिश की। इसी बीच दीपक चौरसिया ने डीपी यादव से कहा, ”चलिए आपकी सारी बातें मान लेते हैं, लेकिन क्या अब आप यह कसम खाते हैं कि अब आप पार्टी नहीं बदलेंगे, दूसरी पार्टी का दरवाजा नहीं खटखटाएंगे और अपने दम पर लड़ेंगे? क्या आप कसम खाते हैं कि अब आप पार्टियों की अदला-बदली का खेल नहीं खेलेंगे?”

दीपक के इस सवाल का डीपी यादव ने कोई सीधा जवाब तो नहीं दिया, उलटे सवाल करने लगे, ”दीपक जी यह कसम तो आप भी नहीं उठा सकते कि आप स्टार में रहेंगे कि आजतक में चले जाएंगे या फिर आजतक में रहेंगे या ज़ी टीवी में चले जाएंगे।”

डीपी यादव ने दीपक को उलझाने की नीयत से ये सवाल किया, लेकिन दीपक तो दीपक हैं। बिना सोच-विचारे उन्होंने कह डाला कि मैं यह कसम उठाने के लिए तैयार हूँ, आप कसम लेंगे तो मैं भी कसम लेने के लिए तैयार हूँ।

डीपी तो उनके सवाल को हंस कर टाल गए लेकिन दीपक का ये आत्मविश्वास मीडिया की अस्थिर जिंदगी के लिए एक सवाल खड़ा कर गया। क्या दीपक चौरसिया अवीक सरकार के साथ जिंदगी भर रहने का दावा कर सकते हैं? अगर ऐसा ही था तो उन्हें इसके पहले इतने संस्थानों को क्यों छोडना पड़ा? क्यों वे आजतक में नक़वी की तानाशाही बर्दाश्त नहीं कर पाए और क्यों स्टार न्यूज़ में देबांग की ऐंट्री के समय (या दूसरे कई मौकों पर) उन्हें इस्तीफे की धमकी देनी पड़ी?

मीडिया और राजनीति दोनों की कड़वी सच्चाई यही है कि यहा किसी भी पार्टी या संस्थान में कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं रहता। बहरहाल, आप भी इस बतकही को देख सकते हैं जो करीब 25 मिनट के आस-पास हुई है।

http://www.youtube.com/watch?v=5DIWwm56fPs&feature=player_embedded

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.