/“आग लगाने के लिए एक चिंगारी ही काफी है, बशर्ते हवा मिलती रहे”

“आग लगाने के लिए एक चिंगारी ही काफी है, बशर्ते हवा मिलती रहे”

कौन कहता है सपने सच नहीं होते, सपने सच होते वैसे सपने सच नहीं होते जो सोते हुए देखे जाये और कुछ पलो के बाद हम भूल जाये. बल्कि वैसे सपने सच होते हैं जो हमारी नींद उड़ा दें. ऐसा ही एक सपना आज से लगभग 3 साल पहले मैंने देखा था. वो सुबह मुझे आज भी याद है, जब मैंनेएक सपना देखा था कि मै अपने कुछ दोस्तों के साथ मिल कर गाँव के आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों पढ़ा रहा हूँ. उन बच्चों को पढते और हँसते मुस्कुराते हुए देख हमे बहुत सुकून मिल रहा है. तभी घडी का अलार्म बजने से मेरी नींद खुल गयी और कुछ पल पहले जिस सपने से आनंदित हो रहा था वही सपना इस समय मेरी दुःख का कारन बन रहा था.
इस सपने ने मुझे बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया. क्योंकि इस सपना को सच कर पाना हमारे लिए संभव नहीं था. क्योंकि हम खुद आर्थिक रूप से इतने समर्थ नहीं थे. मुझे अपनी 12वीं तक तक की पढाई में 3 बार पढाई छोडनी पड़ी जिससे मेरे जीवन की 5 महतवपूर्ण साल बर्बाद हो गए. मुझे याद है की मैंने अपनी 10वीं की टियुशन की फ़ीस 10वीं पास करने के लगभग एक साल के बाद दिया था. और इसी बात ने मुझे प्रेरित किया ऐसे बहुत से बच्चे है जो सिर्फ पैसों की वजह से पढाई छोड़ देते है. हर किसी को हमारे टियुशन के सर जैसा इंसान नहीं मिल सकता उन्होंने कभी हमसे पैसे की मांग भी नहीं की. क्योंकि उन्हें हमरी आर्थिक स्थिति पता था और दूसरा कारण था कि मेरी माँ उनके स्कूल में पढती थी.
इन सभी बातों को सोच कर मै दुखी हो रहा था और मेरी नींद तो जैसे कंही खो गयी थी. 2 दिन तक मुझे जरा भी नींद नहीं आई. मै बस यही सोचता रहता था की आखिर इस सपने को हकीकत में कैसे बदला जाये, फिर मैंने अपने इस सपने के बारे में अपने सबसे अच्छे दोस्त आनंद को बताया. उसने भी यही की भाई हमे इस सपने को पूरा करना है और मै हर तरह से तुम्हारी मदद करूँगा लेकिन अभी हमे इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं की हम इस तरह का काम कर सके. कुछ समय बाद मै दिल्ली वापस आ गया क्योकि मै एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूँ. लेकिन मै इस बात को भूल नहीं पाया और इस बारे सोचता रहता था कि आखिर इस सपने को कैसे पूरा किया जाये. इस बारे में समय समय पर आनंद से मेरी बात होती रहती थी. इस तरह से समय बीतता रहा.
एक दिन इन्टरनेट के सोशल नेटवर्किंग साईट ऑरकुट से मुझे ‘द राइजिंग बिहार’ ग्रुप के बारे में पता चला. ‘द राइजिंग बिहार’ ग्रुप एक ऐसा ग्रुप जहाँ बिहार या बिहार से बहर रह रहे लोग आपस में जुड कर बिहार की स्थिति और समस्यायों पर चर्चा करते थे. मै भी इस ग्रुप से जुड गया. इस ग्रुप से जुड कर मुझे बहुत अच्छा लगा. साथ ही एक उम्मीद जगी कि शायद अब मेरा सपना पूरा हो जाए. ऑरकुट पर मुझे प्रभाकर पांडे भाई, शिरीष मिश्रा भाई, रवि भाई, जैसी साथी मिले तो अनिल सिंह जैसे बड़े भाई भी मिले. ऑरकुट से शुरू हुआ ये सफर फेसबुक पर पहुँच गया. फेसबुक पर हमे साकेत विनायक, अजित झा, प्रियंका चंद्रा,रूपेश झा, आदि जैसे साथी मिले. समय बीतता गया लोग जुड़ते गए.
इस तरह ऑरकुट का ये द राइजिंग बिहार ग्रुप एक रजिस्टर्ड ट्रस्ट ‘द राइजिंग – टी आर बी’ बन गया. लेकिन मेरा सपना अभी तक एक सपना ही था. क्योंकि बच्चों को पढाने के लिए गांव में कोचिंग खोलना था और कोचिंग खोलने के लिए गांव में सक्रिय लोगो की जरुरत थी. मै, आनंद और मेरा छोटे भाई आकाश इस बारे में बात करता रहता था. धीरे – धीरे हमारे कुछ दोस्त  मुकेश कुमार, मुकेश साह, और कृष्ण कुमार हमारे साथ जुड़े. इस तरह हमारा एक छोटी सी टीम बन गई. फिर हम लोगो ने कोशिश करना’ शुरू कर दिया. और फिर हमारे भाई, दोस्त और द राजिंग – टी आर बी’ की मदद से 11 नवम्बर 2011 को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के दिन द राइजिंग बिहार कोचिंग सेण्टर की की गई और मेरा सपना हकीकत में बदल गया.
हमने कोचिंग की शुरुआत 10वीं के विद्यार्थियों को निशुल्क परीक्षा की तैयारी करवाने से किया लेकिन मेरा सपना अभी अधूरा था. हमारे दोस्त पूरी मेहनत और लगन से मेरे सपने को साकार करने में जुट गए. 2 जनवरी 2012 को ‘द राइजिंग – टी आर बी’ के पटना टीम की सदस्या प्रियंका चंद्रा की उपस्थिति में एक किराये के माकन में वर्ग 6 से 10  तक के विद्यार्थियों के लिए न्यूनतम शुल्क तथा आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों को निःशुल्क कोचिंग की औपचारिक उद्घाटन किया गया. इस तरह से हमारे दोस्तों, भाई और ‘द राजिंग बिहार’ ग्रुप की मदद से मेरा सपना हकीकत में बदल गया, लेकिन कहते है न कि इंसान की इच्छा खत्म होने के बजाय बढती ही जाती है.वैसे ही अब हमारी इच्छा है कि इस कोचिंग के साथ ही एक पुस्तकालय जाये जिससे बच्चों को अधिक से अधिक सहायता मिल सके.
जब हम लोग कोचिंग खोलने के लिए संघर्ष कर रहे थे और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था तो मैंने आनंद और खुद हौसला दिलाने के लिए एक बात कही थी– “आग लगाने के लिए एक चिंगारी ही काफी है, बशर्ते हवा मिलती रहे”. आज मुझे ये पंक्ति सही होती दिख रही है. मेरे सपने की वजह जो चिंगारी सुलगी थी उसे हमारे दोस्त, भाई और ‘द राजिंग बिहार’ ने हवा दिया और अब हमारा प्रयास है कि इस चिंगारी को इतनी हवा मिले कि इसके प्रकाश से पूरा बिहार और एक दिन पूरा भारत जगमगाए.
 विकास कुमार
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