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टैक्सास से एमबीए त्रिवेदी को फेल कर 12 वीं पास रॉय को पास किया ‘अकड़ू दीदी’ ने

By   /  March 20, 2012  /  4 Comments

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-शिवनाथ झा।।

एक जमाना था जब बंगाल को “बंगाल टाइगर” के नाम से जाना जाता था, क्रांतिकारियों के नाम से जाना जाता था, शहीदों के नाम से जाना जाता था, विद्वानों के नाम से जाना जाता था, कला, कलाकारों और संस्कृति के नाम से विख्यात था। आज ममता के नाम से ‘कुख्यात’ हो गया है, जिसने खुलेआम हुगली नदी के पार बैठ कर भारतीय संसद की गरिमा को नेस्तनाबूद कर दिया। ‘बंगाल की दीदी’ का दिल्ली में यह एक ‘राजनितिक जेहाद’ ही माना जायेगा इतिहास के पन्नों पर।

त्रिनमूल कांग्रेस वर्तमान सरकार में एक सहयोगी पार्टी है और उसकी अध्यक्ष ममता बनर्ज़ी ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा प्रस्तुत रेल-बजट से नाराज हैं। उन्होंने पैसेंजर किराया में बढ़ोत्तरी करने वाले जन-विरोधी रेल-बज़ट प्रस्तुत करने वाले त्रिवेदी को सज़ा के तौर पर अपना पद छोड़ देने का फरमान जारी कर दिया और रेलमंत्री को ऐसा करना भी पड़ा।
ममता बनर्जी ‘स्वाभिमानी’ नहीं ‘स्वार्थी’ हैं। उनकी सोच बंगाल तक ही सीमित है और अपने प्रदेश में जन-मानस के बीच अपनी ‘तथाकथित छवि’ को बरकरार रखने के लिए न केवल राज्य की जनता को बरगला रही हैं, बल्कि, पूरे देश के अवाम पर अपनी मर्ज़ी थोप रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि भारत का निष्क्रिय, संवेदनहीन, मृत-प्राय जन-मानस बहत्तर घंटे बीतने के बाद भी शांति पूर्वक समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर नेताओं की बात सुन रहा है और खामोश है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब देश के प्रधानमंत्री को देश के आवाम के सामने शर्मसार होना पड़ा है। डॉ। मनमोहन सिंह ऐसे पहले प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने एक ‘निरीह प्राणी’ की तरह अपने ही मंत्रिमंडल के एक अहम सदस्य को संसद से सड़क तक जाते देखा, लेकिन रोक नहीं पाए क्योंकि यह किसी और का फैसला था।

भारत के संसदीय कार्य प्रणाली के इतिहास में यह क्षण भी ‘काले अक्षरों’ में लिखा जाएगा जब एक रेलमंत्री रेल-बजट तो प्रस्तुत करता है लेकिन उस पर संसद में बहस नहीं का पाया। उसे मंत्री-पद से इस्तीफा देना पड़ा, क्योकि उसकी “मालकिन” उस पर नाराज हों गईं। धिक्कार है उस ममता बनर्जी पर जो भारतीय राजनीति, भारतीय संसद, भारत के प्रधान मंत्री, और भारत के 121 करोड़ से अधिक आवाम को अपने राजनितिक स्वार्थ-सिद्धि के लिए, और विशेष कर, पश्चिम बंगाल में अपनी छवि बरक़रार रखने के लिए, सबों को दांव पर लगा दिया, अपमानित किया।

जिन लोगों ने कल डॉ मनमोहन सिंह को लोक सभा में बोलते सुना वे सभी इस बात का गवाह होंगे कि कैसे एक प्रधान मंत्री अपनी ही सरकार के एक सहयोगी दल के नेता के निर्णय से ‘क्षुब्ध’ राष्ट्र के प्रति नतमस्तक हुए और अपने ‘शालीन शब्दों’ में भारत के आवाम से एक तरह से माफ़ी भी माँगी।

सर्वोच्च न्यायालय के एक वरिष्ट अधिवक्ता अशोक अरोड़ा कहते हैं: “देखा जाए, तो आज यह स्थिति इस लिए हुई कि भारत के लोगों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता उतरोत्तर समाप्त होती जा रही है। विभिन्न राजनितिक दलों के नेता स्वयं या अपने लोगों के माध्यम से उन्हें विभिन्न प्रलोभन देकर उनकी मानसिक दशा को बदलने में कामयाब होते जा रहे हैं जो आम चुनाव में, चाहे प्रदेश स्तर के हों या राष्ट्रीय स्तर के, विधान सभा के लिए हों या संसद के लिए, सम्बंधित पार्टियों के विजयी उम्मीदवारों के अंको के रूप पर सामने आते हैं। अगर लोग किसी भी दो या अधिक से अधिक तीन राजनैतिक पार्टियों को चयनित कर सरकार में भेजें तो ऐसी स्थिति नहीं आएगी। आज स्थिति ऐसी है कि कुकुरमुत्तों की तरह उभरती छोटी-छोटी पार्टियां संसद में आकर संसद का अपमान करती हैं और भारत की जनता ताली बजाती है।”

बहरहाल, यह अलग बात है कि नव-निर्वाचित रेल मंत्री मुकुल रॉय, मुख्य मंत्री और पार्टी के नेता ममता बनर्जी के बहुत करीब हैं, और पिछले 30 वर्षों से पार्टी के लिए उनके योगदान को ‘पुरष्कृत’ करना ममता का धर्म है, लेकिन क्या यह धर्म संसद की मर्यादा से ऊपर है? ममता बनर्जी को आज नहीं कल, अपने “गुनाहों” पर पश्चाताप करना होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो गई होगी और भारत का आवाम उन्हें माफ़ नहीं करेगा।

त्रिनामुल कांग्रेस के कुछ वरिष्ट नेताओं से बात करने से एक बात तो सामने आई और वह यह कि “कोई अपनी जुबान हिलाना नहीं चाहता है, चाहे इन सांसदों का अपना कोई राजनीतिक वजूद हो या नहीं। जो शिक्षित हैं, समझदार है, अपना वजूद भी रखते हैं, वे भी राजनीति में रहकर (ममता का साथ देकर) ‘बंगाल के नवाब’ की तरह जीना चाहते हैं, जिनके पास ममता के आगे-पीछे करने के अलावे और कोई कला नहीं है, उनके पास कोई विकल्प भी नहीं।”

मीडिया दरबार से बातचीत करते हुए एक त्रिनमूल सांसद कहते हैं: “आमी की बोलबो। ममोता सामने के की बोलते पारे? जदि केयो किछु बोलते चाहे, तो मोने भय थाके जे थप्पड़ खेते पारेन” (मैं क्या बोलूं? ममता के सामने क्या कोई कुछ बोल पाता है? यदि कोई कुछ बोलना भी चाहता है तो मन में एक डर बना रहता है कि कहीं थप्पड़ ना खा जाए।) वैसे, ममता बनर्जी को जो लोग करीब से जानते हैं वे ऐसे ‘हादसों’ के गवाह भी हैं जिनका नाम लेना उचित नहीं होगा।

ममता के करीबियों का मानना है कि वह किसी भी हालत में अपने से ऊपर किसी को नहीं देखना चाहती हैं। सबों के मन में एक भय का वातावरण बना कर रखती हैं जिससे कोई सीधे-मुंह ना उस से बात कर सके और ना ही उत्तर दे। चाहे कोई भी हों।

यह भी कहा जा रहा है कि दिनेश त्रिवेदी को पार्टी से निष्कासित किया जा रहा है। अगर ऐसा हुआ तो, जानकर सूत्रों के अनुसार, त्रिवेदी अपने साथ काम से काम चार अन्य ममता से ‘त्रस्त’ सांसदों को लेकर निकलेंगे।

जब दिनेश त्रिवेदी से उनके बयान, ”भारत में बहुत राजनीति है और भारत सरकार के सभी मंत्रालय इस राजनीति का शिकार हैं” के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था। ”यह राजनीति तो आपकी पार्टी में ज्यादा है जो सामने आपके ‘निष्कासन’ के रूप में आया है?” के जवाब में त्रिवेदी कहते हैं: “मेरा मतलब अपनी पार्टी से ही है जिसके सांसद विभिन्न मंत्रालयों में पदस्थापित हैं। मैं किसी और राजनितिक पार्टी के बारे में या उनके मंत्रियों के बारे में नहीं कह रहा हूँ। हम सभी पढ़े-लिखे लोग हैं, अपनी जिम्मेदारी भली भांति पूरा करने की कबिलियत रखते हैं, और यह रेल-बजट इसका ज्वलंत उदहारण है। लेकिन पार्टी या पार्टी के लोग तो राष्ट्र और राष्ट्र के लोगों से उपर नहीं है? व्यवस्था से ऊपर नहीं हैं? आज संसद में हमारी संख्या 19 है तो हम व्यवस्था के खिलाफ खड़े हों रहे हैं, संसद की कार्यप्रणाली को बाधित कर रहे हैं। कल बंगाल के लोग आप के खिलाफ खड़े हों जाएंगे और आप को पूछने वाला कोई नहीं होगा। एक रेल-मंत्री के नाते मैंने अपनी जिम्मेवारी भली-भांति पूरी की है। अब किसी को पसंद आए या नहीं।”

यदि देखा जाए तो भारतीय राजनीति की कुछ महिला राजनीतिज्ञों, मंत्रियों या पूर्व-मुख्य मंत्रियोम में इस प्रकार की मानसिक दशा में बहुत समानता भी है। त्रिवेदी को रेल मंत्रालय से इस कदर निकालना शायद इसी मनोदशा का एक परिणाम है। वैसे यह मनोदशा कांग्रेस के महिला नेताओं (कांग्रेस अध्यक्ष सहित) में भी है, लेकिन पारिवारिक, सामाजिक, राजनितिक पृष्टभूमि सबल होने के कारण इसमें ‘उफान’ मारने की प्रथा बहुत कम है। इस ‘मनोदशा’ को त्रिनमूल कांग्रेस के एक दुसरे नेता कुछ इस प्रकार स्पष्ट करते हैं: “यह बात सिर्फ ममता में ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री मायावती, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता, राजस्थान की पूर्व मुख्य मंत्री वसुंधरा, सबों में है। सभी में एक बात समान है। सबों में ‘अक्खड़पन’ बहुत अधिक है और सभी पुरुषों को, चाहे वो कितना भी बुजुर्ग, अनुभवी राजनेता क्यों ना हों, अपने जूते के नोक पर रखना चाहती हैं।”

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  • Published: 6 years ago on March 20, 2012
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  • Last Modified: March 20, 2012 @ 2:46 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. फनिन्द्रनाथ चौधरी says:

    धन्यवाद मीडिया दरबार को और साधुवाद झा साहेब को । अपने ४० वर्ष के सैनिक सेवा में मैंने कभी नहीं पढ़ा या सुना था की एक केन्द्रीय रेल मंत्री रेल बजट प्रस्तुत करता है और बिना बजट पर बहस किये उसे कार्यमुक्त होना पड़ता है । वह दिन भारत के राजनितिक इतिहास और संसद के कार्यप्रणाली के लिए एक कला दिवस के रूप में मन जायेगा, सही कहा झा साहेब । सिर्फ बंगाल में अपना वोट बैंक कमजोर न हो इसलिए ममता बनर्जी ने भारतीय संसद को दाव पर लगा दिया । क्या भारतीय संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है की ऐसे मामलों में भारत का संसद और भारत के राष्ट्रपति ऐसे राजनेता को दण्डित कर सकें । सैन्य सेवा में अपने से वरिष्ट किसी भी अधिकारी के बारे में बोलना मात्र ही दंड का हक़दार बना देता है, देश और संसद के बारे में कोई भी ऐसा सोच नहीं सकता । समय निकलता जा रहा है ऐसे राजनेताओं को सबक सिखाने का जो भारतीय संविधान या भारतीय संसद का अपमान करता है । आपके लेख के लिए एक बार फिर से नमन आपको झा सबह और इस वेबसाईट को धन्यवाद जिसने निडर होकर इसे प्रकाशित किया । आपका फनिन्द्रनाथ चौधरी

  2. madhushri pandey says:

    सुन्दर, सटीक, सत्य । एक घिनौना कार्य की है ममता बनर्जी, अपने स्वार्थ के लिए – सही कहा झा साहेब, यह एक राजनितिक जेहाद ही माना जायेगा. मिडिया दरबार धन्यवाद के पत्र हैं ऐसे लेख और लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए ।

  3. Vandana Thakur says:

    गठबंधन की राजनीति की मर्यादा में प्रधानमंत्री भी भूल गए कि देश हित में क्या ठीक है. यु० पी० ये० के पास ३१४ सदाशय हैं.. १९ का समर्थन वापस भी हो जाता तो भी सरकार नहीं गिरती और नौबत आ भी जाती तो चुनाव के लिए तैयार रहना था. देश के सामने अच्छा उदहारण देते तो शायद जनता पूर्ण बहुमत से जीतती क्यूँ कि अब जनता भी जान गयी है केंद्र में क्षेत्रीय दल सिर्फ बल्च्क्मैलिंग का काम करते हैं. याद हो कि एन० डी० ये० भी दीदी से परेशां होकर गटबंधन से निकाला था.
    दीदी भी इतनी बेशरम कि बंगाल के विकास पर ध्यान न देकर केंद्र हस्तक्षेप कर रही है. लगता है सोनिया जी केवल मुखौटा हैं और दीदी ही सरकार चला रही हैं.
    मुकुल रॉय जिसने रेल राज्य मंत्री होने के बावजूद असाम हादसे के बाद जान उचित नहीं समझा वो आज रेल मंत्री है… जय हो भारतीय लोकतंत्र कि…

  4. Dushyanto says:

    श्री झा साहेब महाभारत में भी ध्रितराष्ट्र को भी पुत्रमोह घेर लिया था जबकि वे भगवन कृष्ण को देखे भी थे, मिले भी थे. ममता बनर्जी तो मात्र एक इन्शान हैं, मोह होना स्वाभाविक है अपनों के लिए, राष्ट्र के बारे में कौन सोचता है. आपके लेख की तारीफ करता हूँ, बेबाक. लेकिन आज के “पिली पत्रकारिता” के युग में ऐसे खुलकर लिखना भी एक हिम्मत वाला पत्रकार ही कर सकता है. “राजनीती जेहाद” शब्द सबसे ‘घटक है’, परन्तु सत्य है. मैं तामलुक में रहता हूँ जहाँ कुछ दिन पूर्व ममता भाषण दी थी. लोग अशिक्षित है, इसलिए उनके पास सोचने की काबिलियत नहीं है, जो सोच सकते हैं, वे उनके चापलूस हैं, जो चापलूसी नहीं कर सकते वे बागी कहलाते हैं और माननीय त्रिवेदी इसके अच्छे उदाहरन हैं. आप को धन्यवाद.

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