/मुकद्दमों से घिरे प्रेस क्लब की अध्यक्ष नहीं बनना चाहती नानकी, बाकी निर्विरोध चुने जाएंगे

मुकद्दमों से घिरे प्रेस क्लब की अध्यक्ष नहीं बनना चाहती नानकी, बाकी निर्विरोध चुने जाएंगे

नानकी हंस चंडीगढ़ प्रेस क्लब के अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर हो गईं हैं. पुरानी मैनेजमेंट उनकी शर्तें मानने को तैयार नहीं हुई. वे ऐसे क्लब की अध्यक्ष नहीं होना चाहती थीं जिसपे अदालतों में मुक़दमे चल रहे हों और जिसकी प्रधान तो वे हों मगर बाकी सारे पदाधिकारी पुरानी मैनेजमेंट के.

नतीजा ये है कि कुल नौ में से छ: पदाधिकारी तो पुरानी मैनेजमेंट के निर्विरोध ही चुने जाएंगे. अध्यक्ष और संयुक्त सचिव के सिर्फ दो पदों के मतदान होना है. हालांकि इसमें विनय मलिक पुरानी मैनेजमेंट के उम्मीदवार सुखबीर बाजवा के सामने एक बड़ी चुनौती हैं. इस लिए भी कि वे उस ट्रिब्यून से हैं जिसके किसी उम्मीदवार ने वो उम्मीदवार ट्रिब्यून से ही न हो तो आम तौर पर मार खाई नहीं है.

यों मुकदमों का मारा चंडीगढ़ प्रेस क्लब एक तरह से फिर पुरानी मैनेजमेंट के पल्ले पड़ गया है. उसके लिए और भी विचित्र स्थिति तब होगी अगर विनय मलिक जीत गए. उनके नज़दीकी सूत्रों के अनुसार वे पुरानी मैनेजमेंट के किन्हीं ‘काले कारनामों’ का किसी अदालत में बचाव नहीं करेंगे. ट्रिब्यून के बाहर भी पुरानी मैनेजमेंट के विरोधी उनकी ताकत हैं.

गौरतलब है कि मतदान 25 मार्च को है और उसके ठीक एक हफ्ते बाद, दो अप्रैल के दिन प्रेस क्लब ने हाई कोर्ट को बताना है कि किसी लीज़ या किरायेदारी के बिना वो करीब सौ करोड़ रूपये मूल्य की सरकारी ज़मीन पे काबिज़ कैसे है? प्रशासन पहले ही कह चुका है कि प्रेस क्लब के साथ उसकी कोई कोई लीज़ या किरायेनामा नहीं है. जो ज़मीन क्लब के कब्ज़े में है उसमे रेज़ीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन से हथियाई वो ज़मीन भी शामिल है जहां पे फिलहाल पार्किंग, लान, टेनिस कोर्ट और क्लब का प्रवेश द्वार है. इसकी भी कोई अलाटमेंट या एसोसियेशन के साथ कोई ट्रांसफर करार नहीं है.

जो उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा रहे हैं वे हैं, वे हैं मनवीर सिंह सैनी (सीनियर वाइस प्रेज़िडेंट), निशा शर्मा (वाइस प्रेज़िडेंट), जसवंत सिंह राणा (वाइस प्रेज़िडेंट-II), नलिन आचार्य (महासचिव), अवतार सिंह (सचिव), रमेश हांडा (ज्वाइंट सेक्रेटरी), विक्रांत परमार (कोषाध्यक्ष). रमेश हांडा को छोड़ कर बाकी सब पुराने मैनेजमेंट के लोग हैं. बताया गया है कि उनका नामांकन एक तकनीकी पच्चू पे रद्द किया जा रहा था. लेकिन वे कोर्ट जाने को तैयार हो गए. कोर्टों से क्लब पहले ही परेशान है. सो उन्हें निर्विरोध चुन लेना पड़ा. (जर्नलिस्ट कम्यमनिटी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.