/मुलायम ने कहा: “जनहित में तो सरकार चली जाती है, मोंटेक सिंह किस खेत की मूली हैं?”

मुलायम ने कहा: “जनहित में तो सरकार चली जाती है, मोंटेक सिंह किस खेत की मूली हैं?”

एक तरफ महंगाई सिरसा के मुहं की तरह बढती जा रही है, जिसके चलते आम आदमी का जीना दुश्वार हो चूका है वहीँ पिछले सोमबार को योजना आयोग के जो आकडे जारी किये गए उसके आधार पर यह माना जा रहा है कि देश में 2004-05 और 2009-10 के बीच गरीबी और गरीबों की संख्या में कमी आई है, साथ ही, पूर्व के 32 रूपये प्रतिदिन के प्रति परिवार भोजन पर पर खर्च राशि को घटा कर 29 रुपये कर दिया गया है. यानि की जो व्यक्ति अपने परिवार के भोजन पर 29 रुपये खर्च करता है वह गरीब आदमी की श्रेणी से बाहर है…
वो क्या जाने गरीबी क्या होती है? खाली पेट पानी पीने से पेट में कैसे ममोड़ आता है? नमक के बिना रोटी कैसे गले में कैसे फंसती है? भूख से होठों पर कैसे पपड़ी जमती है? हमसे पूछे कोई. शहरी बाबू तो पिज्जा खाते हैं और जूस पीते हैं वह भी सरकारी खर्च पर, और खींच दिए देश में गरीबी रेखा” – मुलायम सिंह यादव 
 -शिवनाथ झा।।
गाँव में एक कहावत है – ग्वाला कभी भी अपने उस बर्तन को नहीं फेंकता जिसमे वह दूध दुहता है, गाय या भैंस के बच्चे नहीं होने या दूध नहीं देने पर भी वह उसे संजो कर रखता है, इस उम्मीद में कि कभी तो वह दूध देगी और जब देगी तब उस बर्तन में सोंधी-सोंधी खुशबू आएगी, उसी सुगंध को महसूस करने के लिए. आज मुद्दतों बाद मुलायम सिंह यादव को भी यह मौका मिला – देश को दुहने वाले, आवाम को दुहने वाले अधिकारी के खिलाफ खड़े होने का. जंग की शुरुआत हों गई है.
यह अलग बात है कि आज देश में पंचायत स्तर से संसद तक निर्वाचित नेताओं का कार्यालय और आवास वातानुकूलित ना हो और आधुनिक साज-सज्जाओं से सुसज्जित ना हो, तो डिजाइनर और सम्बद्ध अधिकारियों को खुलेआम नंगा करने में राजनेतागण कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन एक अरसे के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के ‘डि फैक्टो’ मुख्यमंत्री  मुलायम सिंह यादव ने भारत के पैसठ से ज्यादा फीसदी ‘गरीब’ लोगों की दुखती रग पर हाथ रखकर उनकी “दुआओं” से माला-माल हो गए.
इस बयान के पीछे मुलायम सिंह यादव को कितना ‘राजनितिक लाभ’ मिलेगा यह तो समय ही निर्धारित करेगा, लेकिन एक बात तो तय है कि सरकारी महकमे में, विशेषकर, सरकारी बाबुओं, जो अपनी ‘कूट-नीति’, ‘चालाकी’, ‘चाटुकारिता’ , ‘चमचागिरी’ के बाल पर अपने राज नेताओं और मंत्रियों को खुश रखकर  जनता के पैसे पर ‘राजकीय दामाद’ बने बैठे हैं, के बीच खलबली मच गयी है.
योजना आयोग के एक वरिष्ट अधिकारी ने मीडिया दरबार को बताया कि “योजना आयोग ही नहीं, भारत वर्ष के सभी मंत्रालयों, विभागों, पुलिस, अन्वेषणों, या यूँ कहें, कि जितने भी सांख्यिकी आंकड़े एकत्रित होते हैं, या निर्गत किये जाते हैं वे ‘बाहरी’ होते हैं. गैर सरकारी संगठनों द्वारा एकत्रित सभी सांख्यिकी आंकड़ों का समग्र रूप ही सरकारी सांख्यिकी आंकड़ा होता है. इसके लिए इस कार्य में लगे सभी गैर-सरकारी संस्थाओं को पैसे दिए जाते हैं. अब देखना यह है कि हम उस आंकड़े का अध्यन किस तरह करते हैं और किस तरह प्रस्तुत करते हैं. व्यावहारिक रूप में यह कार्य भी अन्य सरकारी कार्यों की तरह ही होता है.”
इसी तरह, गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाले नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के एक डिप्टी सेक्रेट्री का कहना है: “हमारे पास जो आंकड़े आते हैं वह लगभग दो साल पुराने होते हैं. इसमें भी बहुत सारी कमियां होती है क्योंकि 40 से 50 प्रतिशत राज्य सरकार के पुलिस और व्यवस्था से सहयोग नहीं मिलता. इतना ही नहीं, कई-एक मामलों में, जिस अन्वेषण के लिए स्थानीय पुलिस अपना दावा ठोकती है, उस अन्वेषण से सम्बंधित कार्य को भी ‘ठेके’ पर कराये जाते हैं और इस कार्य को करने के लिए दिल्ली सहित लगभग सभी राज्यों में पूर्व पुलिस अधिकारी और उनके चेहेते लोग अपनी-अपनी दुकाने खोल रखे हैं. आंकड़े तो ऐसे ही इकठ्ठे होते हैं. इस हालत में योजना आयोग भी अछूता नहीं रह सकता?”
बहरहाल, मुलायम सिंह यादव कहते हैं: “मुझे सरकारी बाबुओं से कोई शिकायत नहीं है, मोंटेक सिंह आहुलवालिया से भी नहीं है. शिकायत है भारत के गरीब, निर्धन, असहाय, बेबस लोगों के प्रति इन सरकारी महकमों में सरकारी पैसों पर पलने वाले अधिकारियों की भावनाओं से, उनके इरादों से, जो ‘पाक’ नहीं है. वो क्या जाने गरीबी क्या होती है? खाली पेट पानी पीने से पेट में कैसे ममोड़ आता है? नमक के बिना रोटी गले में कैसे फंसती है? भूख से होठों पर कैसे पपड़ी जमती है? हमसे पूछे कोई. शहरी बाबू तो पिज्जा खाते हैं और जूस पीते हैं वह भी सरकारी खर्च पर, और खींच दिए देश में गरीबी रेखा.”
लगभग दो दशक में पहली बार ऐसा हुआ जब हमने मुलायम सिंह यादव की आवाज बोलते-बोलते अवरुद्ध होते महसूस किया, अवाम के लिए. ऐसा लगा वे पांच दशक पूर्व की अपनी स्थिति को आंकते हुए, मोंटेक सिंह आहलुवालिया द्वारा खींचे गए गरीबी की रेखा पर खड़े हों और भूख से होने वाले दर्द को महसूस कर रहे हों. हमने भी ज्यादा खोद-खाद नहीं किया सिवाय यह पूछने के कि क्या मोंटेक जायेंगे? मुलायम ने कहा: “सरकार चली जाती है किसी बात पर जो जनता के लिए हों, मोंटेक सिंह किस खेत की मूली हैं?”
वैसे मुलायम सिंह यादव की बातों में दम तो है. पिछले लगभग पांच दशकों के राजनितिक पहलवानी में इन्होने जितने पापड़ बेले हैं, या देश के दूर-दरास्त इलाकों की मिटटी फांके हैं, तपती धुप में लोगों से प्रदेश और देश में राजनितिक स्थिरता लाने के लिए अपने और अपने दल के लिए वोट मांगे हैं, प्यासी आत्मा को शांति के लिए गाँव की बुजर्ग महिला के हाथों मिटटी के बर्तन में पानी पीये होंगे, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलवालिया को नसीब नहीं हुआ होगा.
मुलायम सिंह यादव के अनुसार: “आहुलवालिया तो “गरीब” का अर्थ दिल्ली के मथुरा रोड स्थित डी.पी.एस. स्कूल या फिर कनाट प्लेस क्षेत्र के मिडिल सर्किल में छोले-कुल्चे बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करने वालो को समझते होंगे. शहर के लोग क्या जाने गाँव का हाल?. “
यदि देखा जाय तो मुलायम सिंह यादव ने खुले आम प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कहा कि ऐसे सभी अधिकारियों और मोंटेक सिंह आहलुवालिया को हटाएं योजना आयोग से जो राष्ट्र और सरकार को गुमराह कर रहे हैं, गलत लेखा-जोखा दे रहे हैं. मोंटेक सिंह आहलुवालिया योजना आयोग के उपाध्यक्ष हैं जबकि प्रधान मंत्री योजना आयोग के अध्यक्ष. अगर देखा जाए, तो मुलायम सिंह यादव प्रधान मंत्री पर भी सीधा निशाना साधा है कि योजना आयोग के अध्यक्ष होने के नाते कैसे उस “अंक” पर अपनी सहमति दे  दी जो भारत के पैंसठ फीसदी आवाम को जीते-जी नरक में धकेल रहा है.
पिछले सोमबार को योजना आयोग के जो आकडे जारी किये उसके आधार पर यह माना जा रहा है कि देश में 2004-05 और 2009-10 के बीच गरीबी और गरीबों की संख्या में कमी आई है, साथ ही, पूर्व के 32 रूपये प्रतिदिन के खर्च को 29 रुपये कर दिया.
उत्तर प्रदेश चुनाब परिणाम ने मुलायम सिंह यादव के कद को इतना ऊँचा कर दिया है कि अन्य राजनितिक पार्टी और नेता भी, जिनकी जुबान अभी तक कटी थी, भी बोलने लगे और भी “मुलायम के ताल में”. भारतीय जनता पार्टी नेता सुषमा स्वराज का कहना है कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया को ही क्यों ‘बलि का बकरा’ बनाया जाए, योजना आयोग के अध्यक्ष हैं प्रधान मंत्री, उन्हें भी दोषी करार किया जाए. आखिर, प्रधान मंत्री की जानकारी के बिना ऐसे “अंक” का निर्धारण कैसे हों सकता है? एक ओर जहाँ बाज़ार में वस्तुओं की कीमत आसमान छूती नजर आ रही है वहीँ दूसरी ओर गरीबी और निमित्त अंको में कोई ताल-मेल दिखता नहीं है.
इस युद्ध का परिणाम चाहे जो भी हों, मोंटेक सिंह आहलुवालिया रहे या जाएँ, एक बात तो तय है कि मुलायम सिंह यादव ने खुलेआम चुनौती दी है सरकार को, सरकारी आंकड़े को, विशेषकर जो गरीब और गरीबी का “नंगा नाच” देख कर देखकर आनंद भी लेते और उसका मजाक भी उड़ाते हैं
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.