/ये कैसा और किसके लिए विकास ?

ये कैसा और किसके लिए विकास ?

-अनुराग ||

एक ओर जहाँ विश्व 21 मार्च को विश्व वनिक दिवस दिवस मनाया रहा था वही दूसरी ओर लखनऊ शहर में धड़ल्ले से पेड़ काटे जा रहे थे, रही कसर अभी बाकी है जो आगे बचे हुये पेड़ों को काट कर पूरी की जाएगी .
(विदित हो कुछ समय से अलीगंज में सेक्टर क्यू से इंजीनियरिंग कॉलेज तक के डिवाइडर को तोड़ने का और मिट्टी हटाने का काम चल रहा है !)
“सेक्टर”-“क्यू” इलाके में विकास के नाम पर सैंकड़ों की संख्या में हरे-भरे पेड़ काट दिये गए जो कि कुछ वन विभाग द्वारा लगाए गए थे जब कि कुछ सालों से वहाँ पर लगे हुए थे. एक तरफ जहाँ पर्यावरण को ले कर इतनी चिंता बनी हुई है,  वहीं विकास के नाम  पर बने हुए  डिवायडर को  तोड़ के उसमे से मिट्टी निकाली जा रही है और कंक्रीट  बिछाने की तैयारी चल रही है ! इसे देखते हुए यही प्रतीत होता है कि सरकारी विभाग को शहर के पर्यावरण से ज़्यादा अपने जेब की चिंता है इसी लिए वो ठेकेदारों से मिल के अपनी  विकास की अलग ही गंगा बहा रहा है जिससे साधारण जन का कोई भला  नहीं होना है, इस तथा कथित विकास में स्वार्थी लोगों की जेबें गरम होंगी और बची हुई हरियाली नष्ट होगी ! जहाँ एक ओर पेड़ लगाने की जरूरत है और जोर दिया जा रहा है वहीं हरे पेड़ों को गर्मी शुरू होने से पहले ही काटना कहाँ तक सही है ?
इस ओर ध्यान देने कि जरूरत है कि बची हुई हरियाली को नष्ट होने से बचाया जाए और नए वृक्ष लगाए जाएँ !
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.