/माफ़ी नहीं मांगने वाले राजोआना को नहीं होगी फांसी, सभी ‘राजनितिक चूल्हे’ हुए ‘सांझा’

माफ़ी नहीं मांगने वाले राजोआना को नहीं होगी फांसी, सभी ‘राजनितिक चूल्हे’ हुए ‘सांझा’

-शिवनाथ झा।।

सरकारी दफ्तरों में “चपरासी बाबू और किरानी बाबू, कचहरी में “रीडर बाबू”, पुलिस में “डयूटी बाबू”, जेल में “जेलर बाबू” ही सही अर्थों में भारतीय प्रशाशनिक, वैधानिक और न्यायिक व्यवस्था को चलाते हैं. आज के इस युग में ये सभी “बाबू” वस्तुतः “आधुनिक चन्द्रगुप्त” है.

मात्र दस शब्दों में ही चरमराकर रख दिया भारतीय व्यवस्था को और मजबूर कर दिया सभी राजनेताओं, राजनैतिक पार्टियों को “सांझा चूल्हा” के लिए और राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभादेव पाटिल को पुनः विचार करने के लिए मजबूर कर दिया.

अब तक की प्राप्त जानकारी के अनुसार पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलबंत सिंह राजोआना को तत्काल फांसी नहीं होगी. राजोआना को अदालत के आदेशानुसार, अभी (आज, दिनांक 26 मार्च, समय सायं पांच बजे) से 120 घंटे बाद (मार्च 31 को सायं पांच बजे से पूर्व) फांसी पर लटकाना था.

पिछले 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ के उच्च सुरक्षा वाले सचिवालय परिसर में ही बेअंत सिंह की हत्या की गयी थी.

जानकर सूत्रों के अनुसार पंजाब के मुख्य मंत्री प्रकाश सिंह बादल सहित सिख धर्म की शिखर संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रवन्धक समिति के अतिरिक्त बिभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं, विशेषकर, कांग्रेस के नेताओं ने भी महामहिम राष्ट्रपति से गुजारिश किया है की वे “फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दें.”

ज्ञातब्य है कि पटियाला जेल के अधीक्षक लखविंदर सिंह जाखड ने चंडीगढ़ के अतिरिक्त सेशन जज शालिनी नागपाल को एक पत्र के माध्यम से यह कहा की वे अदालत के आदेश – फांसी की सजा – को अमल करने में असमर्थ है क्योकि यह मामला पंजाब राज्य के सीमा क्षेत्र में नहीं है, साथ ही, यह भी दर्शाया गया की “इन मुद्दों पर गहन जांच की जरुरत है.”

दस शब्दों का यह आलेख मामलों को उलझाने के लिए काफी था. इस पत्र के साथ ही सभी लोग हरकत में आ गए और अपने-अपने गले से घंटी को निकाल कर “राष्ट्रपति भवन” में फेंक दिया.

संविधान के अनुसार, “राष्ट्रपति सर्वश्रेष्ट हैं, भारतीय व्यवस्था के पूरक हैं, उनका निर्णय अंतिम और अक्षुण होगा.” एक सूत्र ने बताया कि “महामहिम राष्ट्रपति अब चार माह और अपने कार्यालय में हैं और कोई भी कैसे उम्मीद कर सकता है की अपने जीवन के इस मुकाम पर आकर वे ऐसी कोई भी कार्य करेंगी, जो जीवन पर्त्यंत उनके दिल में शूल की तरह चुभता रहेगा. इसलिए, तत्काल तो फांसी नहीं ही होगी, आगे समय निर्धारित करेगा बलबंत सिंह राजोआना के जीवन को!”

महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने भारत की प्रथम महिला के रूप में राष्ट्रपति का कार्यभार पिछले 25 जुलाई, 2007 को संभाली थी और अगले चार माह में अपने पांच वर्षों का कार्य-काल समाप्त करने वाली हैं.

पत्र में लखविंदर सिंह जाखड़ ने कहा है कि बेअंत सिंह की हत्या के मामले में राजोआना और जगतार सिंह हवारा को मौत की सजा सुनाई गई थी, हवारा के मृत्यू दंड को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास में बदल दिया है; लेकिन राजोआना ने मृत्यू दंड के खिलाफ अपील करने से इंकार कर दिया है. इसी मामले में एक और अभियुक्त लख्जविंदर सिंह ऊर्फ लखा की अपील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है.

कहा गया है कि कानून के अनुसार राजोआना की फांसी की सजा पर तबतक अमल नहीं किया जाए जबतक लखा और हवारा की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता.

जेल अधीक्षक लखविंदर सिंह जाखड़ ने तर्क दिया है कि इस मामले में पाटियाला केंद्रीय जेल को भेजा गया आदेश सही नहीं है क्योंकि उक्त कैदी को पहले बुरैल जेल (चंडीगढ़) भेजा गया था इसलिए उनके मामले में आदेश वहीं भेजा जाना चाहिए था क्योंकि हाई कोर्ट से सज़ा पर स्वीकृति के बाद इसपर अमल के लिए आदेश उसी जेल को दिए जाते हैं जहां बंदी को सबसे पहले भेजा गया था.

ग़ौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने हालांकि आतंकवादी बलवंत सिंह की मौत की सजा को बरकरार रखा है, जिसने अपनी सजा के खिलाफ अपील नहीं की थी. इसके अलावा तीन अन्य आतंकवादियों को बेअंत सिंह की हत्या का षड्यंत्र रचने के लिए दोषी करार दिया गया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उच्च न्यायालय ने इनकी सजा को भी बरकार रखा है.

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में बीकेआई के दो आतंकवादियों जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह को बेअंत सिंह हत्याकांड के मामले में मौत की सजा सुनाई थी. हवारा बेअंत सिंहहत्याकांड का मुख्य षड्यंत्रकारी है और अदालत में सुनवाई के दौरान उसने स्वीकार किया कि वह बेअंत सिंह की हत्या के लिए अकेला ही जिम्मेदार है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.