/अब नहीं दिखता फ़ेकबुक पर कोई फ़ेस, हर जगह ‘फ़ेकबुकियों’ की भरमार

अब नहीं दिखता फ़ेकबुक पर कोई फ़ेस, हर जगह ‘फ़ेकबुकियों’ की भरमार

-दयानंद पांडेय-

मित्रों पता नहीं क्यों अब कई बार लगता है कि फ़ेसबुक अब फ़ेकबुक में तब्दील है। बल्कि फ़ेकबुक का किला बन गया है यह फ़ेसबुक। छ्द्म क्रांतिकारिता के मारे मुखौटे पहने लोगों की फ़ौज, हर घंटे चार-छ लाइन की कविता और उस के साथ नत्थी एक फ़ोटो लगाई औरतें, जिन्हें न किसी शब्द की समझ, न वर्तनी की समझ, वाक्य विन्यास की, न कविता की। पर उन्माद कविता लिखने का यह कि जैसे कविता न रच रही हों, कविता की फ़ैक्ट्री लगा बैठी हों। तिस पर करेला और नीम चढा, तमाम कुत्तों की लार टपकाती लाइक और कमेंट करती फ़ौज! गोया ये आचार्य रामचंद्र शुक्ल हों और लाइक या कमेंट कर कविता को अमर कर जाएंगे।

क्रांतिकारियों की भी कई-कई दल यहां सक्रिय हैं। जो अन्ना के तो जैसे पीछे ही पड गए हैं। ठीक है ज़रुर पड़िए। मतभेद होना बुरी बात नहीं। खूब ऐसी तैसी कीजिए अन्ना की। बहुत कमियां है उन में। पर अन्ना और टीम ने जिन भ्रष्टचारियों के खिलाफ़ बिगुल बजा रखा है, उन के खिलाफ़ एक शब्द की भी सांस नहीं लेते ये क्रांतिकारी साथी। तो क्या उन भ्रष्ट लोगों के समर्थन में हैं यह भैया लोग? बहुत कुछ सांसदों का सा रवैया है इन क्रांतिकारियों का। अभी नीरा राडिया से लगायत टू जी, कामन वेल्थ गेम, आदर्श सोसाइटी या अभी-अभी दस लाख करोड रुपए के कोयला स्कैम पर भी यह क्रांतिकारी साथी या तो मौन हैं या फिर सांसदों की तरह बस रस्म अदायगी वाली चिंताएं जता कर सो गए हैं। बताइए कि एक सेनाध्यक्ष को चौदह करोड़ की रिश्वत देने की हिम्मत करने की हद तक बात पहुंच गई है और हमारे वैचारिक और क्रांतिकारी साथी इस सब का विरोध करने वाले के खिलाफ़ ही लामबंद हैं, इन भ्रष्ट लोगों के खिलाफ़ बात करने में इन लोगों को जैसे नींद आ जाती है।

कुछ और लोग भी हैं जो बाकायदा गिरोह बना कर बात कर रहे हैं। कुछ वैचारिकता की खोल ओढ़े हुए हिप्पोक्रेट हैं इन गिरोहों में, तो कुछ बाकायदा ब्राह्मण, पिछड़े, दलित आदि के खुल्लमखुल्ला गिरोह हैं। अपनी-अपनी जातियों का बिगुल बजाते, विष-वमन करते।

फ़्रस्ट्रेटेड लोगों की भी कई-कई जमाते हैं। आत्म-मुग्ध, आत्म-प्रचार के मारे लोग तो पग-पग पर हैं ही। वह अभी सो कर उठे हैं, अभी खाने जा रहे हैं, अभी घूमने जा रहे, अभी इतने लोगों को अनफ़्रेंड किया है, और लोगों को भी अनफ़्रेंड करने वाले हैं। अभी खांसी है, कल जुकाम था, अभी गुझिया बनाई, अभी रंग लगाया आदि जैसे पल-प्रतिपल का हिसाब देने वाले भी बहुतायत में हैं। एक संभोग छोड सारी नित्य क्रिया की कवायद की पोस्ट बेहाल किए है। क्या पुरुष, क्या स्त्री! सभी इस रोग के मारे हैं। यह सोशल साइट है और सामाजिक सरोकार ही यहां से लगभग लापता हैं।

तो यह फ़ेकबुक नहीं है तो और क्या है? मैं ने अभी कोई नौ महीने पहले इन्हीं और ऐसे ही तमाम अंतर्विरोधों को ले कर एक कहानी लिखी थी फ़ेसबुक में फंसे चेहरे। इसी नाम से एक कहानी संग्रह भी छप कर अब आ गया है। पर फ़ेसबुक इन नौ महीनों में ही एक क्या लगता है कई-कई जन्म ले चुका है। अब एक नया ही फ़ेसबुक हमारे सामने उपस्थित क्या नित नया और खोखला रुप ले कर उपस्थित है। अभी जाने क्या-क्या रुप लेगा यह फ़ेसबुक, यह तो समय ही जाने। लेकिन अभी और बिलकुल अभी तो यह फ़ेसबुक फ़ेकबुक में तब्दील होता जा रहा है, इस में तो कोई दो राय नहीं है।

हां, यह भी ज़रुर है कि इस फ़ेसबुक पर फ़र्जी लोगों का भी ज़बरदस्त जमावड़ा है। कुछ मित्र तो यह भी बताते हैं कि कुछ लोग दस-दस, बीस-बीस या और भी कई-कई नामों से उपस्थित हैं। आखिर एक प्रश्न तो यह भी है ही कि एक कोई अधपकी, कच्ची कविता जो किसी स्थापित कवि की भी नहीं है, दो सौ, तीन सौ कमेंट या हज़ार, दो हज़ार से भी ज़्यादा लाइक भला कैसे हो जाता जा रहा है और हर बार की कविता पर? अभी किसी महादेवी, प्रसाद, निराला, दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, बच्चन, नीरज, कुंवर नारायन आदि की कविता पर भी क्या इतने कमेंट या लाइक आ सकते या हो सकते हैं? हरगिज नहीं।

तो फ़ेसबुक की इन कवियत्रियों को कैसे भला मिल जाते हैं? अच्छा आप अभी घूम कर आए हैं या आप ने अपने बच्चे को खाना खिला दिया, इस पर भी ढेरों कमेंट या लाइक? यह क्या फ़ेसबुक है या फ़ेकबुक? अच्छा कुछ लोग ब्लू फ़िल्मों की क्लिपिंग भी लगा दे रहे हैं। तो कुछ लोग नंगी या अधनंगी स्त्रियों की फ़ोटो भी टांग दे रहे हैं, इस का क्या करेंगे? हां, आप एक परिचय के बाद किसी स्त्री से फ़्लर्ट भी करने लगें तो? यह सारे सवाल भी इस फ़ेसबुक-फ़ेकबुक पर गूंजने लगे हैं और बार-बार। खैर फ़्लर्ट आदि से मुझे कुछ बहुत ऐतराज है भी नहीं। यह सब का अपना ‘व्यक्तिगत’ है। लेकिन इधर देखने में आया है कि कुछ लोगों ने आपसी बातचीत का पूरा, अधूरा कनवर्सेसन भी पोस्ट किया है। और कि एक दूसरे को नंगा भी किया है, कहानी आदि भी लिखी है। खैर यह भी व्यक्तिगत के खाने में डाल देते हैं। तो भी यह तो मानना ही होगा कि यह सब व्यक्तिगत सार्वजनिक करने से बचा भी जा सकता है।

एक बात ज़रुर इस फ़ेसबुक बनाम फ़ेकबुक पर अप्रत्याशित रुप से और निरंतर देखने को मिलने लगी है कि स्त्रियां अब दिखावे ही के तौर पर सही पुरुषों के खिलाफ़ कोड़े ले कर खडी हैं। बंदूक ले कर खडी हैं। लेकिन बहुत अमूर्त ढंग से। जैसे कि अभी एक किताब की चर्चा हुई है जिस में एक मौलवी ने बीवियों को काबू करने के लिए कोड़े मारने की तजवीज की है, जाने क्यों फ़ेसबुक पर बैठी स्त्रियां, जो जब तब पुरुषों के खिलाफ कविता आदि में ही सही भड़ास निकालती रहती हैं, इस पर कुछ बहुत उद्वेलित नहीं दिखीं। यह और ऐसे तमाम विषयों पर स्त्रियां कभी बहुत उद्वेलित नहीं होतीं।

अब कि जैसे लगभग हर विज्ञापन के मूल में पहले औरत की अधनंगी फ़ोटो रहती रही है पर अब लडकी को पटाना भी ज़रुरी हो गया है। चाहे् मोबाइल का विज्ञापन हो, कोल्ड ड्रिंक का हो, पाउडर या सेंट का हो, मोटरसाइकिल का हो या किसी और चीज़ का। सारे विज्ञापन लडकी पटाने में व्यस्त है। क्या इतनी सस्ती हैं लडकियां? पर कोई स्त्री इस पर भी कहीं नहीं बोलती। न फ़ेसबुक-फ़ेकबुक पर, न इस से बाहर। तो यह क्या है? कोई चिंतक भी इस पर राय देना या विरोध करना ठीक नहीं समझता। जब कि इस पर तो आंदोलन खडा करने की ज़रुरत दिखती है। ऐसे और भी तमाम मसले हैं। जो फ़ेसबुक पर नहीं हैं। इसी लिए खोखली और दिखावटी बातों पर झूम-झूम जाने वाला फ़ेसबुक, अब फ़ेकबुक में तब्दील हो चुका है।

है कोई क्रांतिकारी, कोई जो मशाल ले कर खडा हो, जो इस पर चिंता बघारे मशाल जलाए? अभी और बिलकुल अभी तो सिर्फ़ एक कार्टून याद आ रहा है जो दो तीन दिन पहले इसी फ़ेसबुक पर किसी ने पोस्ट किया था। जिस में एक व्यक्ति किसी व्यक्ति से कह रहा है कि मेरे पास ऑर्कुट है, ट्विट है, फ़ेसबुक है, तुम्हारे पास क्या है? और अगला आदमी उसे जवाब देता है कि मेरे पास काम-धंधा है ! तो क्या हम या हमारे जैसे लोग सचमुच निठल्ले हैं? जो जब देखिए तब फ़ेसबुक पर जा कर आलू छीलने लगते हैं? आलू-चना करने लगते हैं। और कि लोगों के अहं-ब्रह्मास्मि की आंच में झुलसने चले जाते हैं? अहंकार की बहती नदी में बहने, आत्म मुग्धता के सागर मे बहकने, आत्म-प्रचार में लीन लोगों का दर्शन करने फ़ेसबुक क्षमा कीजिए फ़ेकबुक के बदबू मारते नाले के मुहाने पर जा कर बैठ जाते हैं?

फ़ेकबुक का यह किला इतना मज़बूत हो गया है? कि हम उस से बाहर भी निकलने में मुश्किल पा रहे हैं?

 

शिक्षा पूरी करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में प्रवेश लेने वाले दयानंद 1978 से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। उनके उपन्यास और कहानियों आदि की एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं। वे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ उपन्यास पर प्रेमचंद सम्मान तथा ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ कहानी संग्रह पर यशपाल सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं-  लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), बर्फ़ में फँसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियाँ), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचनादृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाडी’ नाम से प्रकाशित।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.