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करेन्सी-कनेक्टिविटी-कम्युनिटी की तर्ज़ पर हो रहे हैं राज्यसभा चुनाव?

By   /  April 1, 2012  /  1 Comment

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भारत का मतदाता सकारात्मक है इसलिये चाहता है कि राजनैतिक दल गलतियों को दोहराये नहीं मगर दल अपने फैसले से मतदाता को हमेशा ठेस पहुंचाने का काम जरूर करते हैं। इसकी बानगी राज्यसभा के चुनावों में मिली है । हाल में देश के 15 राज्यों की 58 राज्यसभा की सीटों के लिये नामांकन भर दिए गये। इस में उत्तरप्रदेश से 10, महाराष्ट्र-आंध्रप्रदेश-बिहार से 6-6, मध्यप्रदेश-पश्चिम बंगाल से 5-5, गुजरात-कर्नाटक से 4-4, उड़ीसा-राजस्थान से 3-3, झारखंड से 2 तथा हिमाचल प्रदेश-उत्तराखंड-हरियाणा तथा छत्तीसगढ़ से 1-1 सांसद को राज्यसभा में जाना है। इन 58 सीटो में से 49 पर निर्विरोध चुनाव हो गये। शेष 9 सीटों पर चुनाव की स्थिति है।

संविधान निर्माताओं की मंशा राज्यसभा के माध्यम से देश के विशिष्ठ जनों को लोकतंत्र की मुख्यधारा में लाने का था। विशेष रूप से ऐसे विख्यात व्यक्तियों को जो देश को दिशा तो दे सकते हो मगर निर्वाचन की राजनीति से अपने को दूर रखना चाहते हो। संविधान र्निमाताओं की इस मंशा को पलीता लगाने का काम राजनैतिक दलों ने किया है । हम यदि राज्यसभा के इतिहास में झांकें तो अपने गठन के प्रथम चरण में राज्यसभा में विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ठ लोगों का बहुमत था क्योंकि राजनैतिक दल अपनी छवि के प्रति संवेदनशील थे इसलिये वह राज्यसभा के लिये विशिष्ट जनों को भेजने का हर संभव प्रयास करते थे। राज्यसभा का दूसरा चरण जो प्रथम चरण के लगभग 25 वर्ष बाद शुरू हुआ, में राज्यसभा को पराजित और नकारे हुये लोगों की शरण स्थली कहा जाने लगा । तीसरा दौर अब से लगभग 15 वर्ष पहले प्रारंभ हुआ जिसमें राज्यसभा का टिकट करेन्सी-कनेक्टिविटी का प्रतीक बन गया जब नेताओं से संबंध और पैसे को पार्टियों ने राज्यसभा में भेजने का मापदण्ड बना लिया।

राज्यसभा के चौथे दौर के चुनाव-2012, में करेन्सी-कनेक्टिविटी के साथ ही कम्युनिटी भी जुड़ गई है। करेन्सी का प्रत्यक्ष उदाहरण भाजपा के झारखण्ड के प्रत्याशी अंशुमन मिश्रा के नामांकन पर सामने आया। ब्रिटेन के अप्रवासी अरबपति मिश्रा लंदन में अपने राजनैतिक संबंधो और चंदे के लिये विख्यात हैं जिसके चलते उन्हें पार्टी प्रत्याशी घोषित किया। भाजपा की इस घोषणा से पार्टी में भूचाल आ गया और अंशुमन मिश्रा को अपनी नामजदगी वापिस लेनी पड़ी। करेन्सी की दम पर नितिन गडकारी नागपुर के अरबपति अजय संचेती को महाराष्ट्र से राज्यसभा में लाने में सफल हो गये। भाजपा के इन दोनों प्रत्याशियों के चयन ने पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता सहित सारे देश को हिला दिया है। इस टिकट वितरण से भाजपा का दोहरा चरित्र सामने आया क्योंकि खरीद-फरोख्त के लिये कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने वाली भाजपा ने जब खुद करेन्सी के समुद्र में गोता लगया तो उसे इस में भ्रष्टाचार नहीं दिखा।

उत्तरप्रदेश की हार भी भाजपा के लिये सबक नहीं बनी क्योंकि यहॉ राज्यसभा के टिकट वितरण में कम्युनिटी का बोलबाला रहा फलस्वरुप विनय कटियार को प्रत्याशी बनाया जो अपनी कट्टर हिन्दू छवि के लिये जाने जाते हैं। भाजपा की राजनैतिक रणनीति का यह खोखलापन है कि अपने हिन्दू वोट बैंक को बचाने के लिये उत्तरप्रदेश में चुनाव हारने के बाद भी हिन्दू नेता को राज्यसभा में भेजते हैं। इसी फैक्टर के चलते मध्यप्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिये नज़मा हेपतुल्ला को प्रत्याशी बनाते है। भाजपा का यह राजनैतिक भटकाव बड़ा अजीब है, जिस में वह हिन्दू वोट के लिये एक प्रदेश में विनय कटियार को, तो दूसरे प्रदेश में मुस्लिम वोटो के लिये नज़मा हेपतुल्ला को टिकट देती है। शायद भाजपा के नेतत्व को लगता है कि मध्यप्रदेश का मुस्लिम मतदाता भाजपा के झांसे में आ जायेगा और यह भूल जायेगा कि उत्तर प्रदेश में विनय कटियार भाजपा का चेहरा है, जिस पर बाबरी मस्जिद विध्वंस के छीटे हैं।

भाजपा की रणनीति से ही मिलती-जुलती तस्वीर कांग्रेस की भी है। दिग्विजय सिंह प्रदेश से किसी मुस्लिम को राज्यसभा भेजने के लिये प्रदेश के मुस्लिम नेताओं को दबाब बनाने का इशारा करते हैं और जब दबाब बनता है तो पहला नाम इब्राहिम कुरैशी का और दूसरा नाम मुजीब कुरैशी का आता है जो मूलतः दिग्विजय सिंह समर्थक हैं। इब्राहिम कुरैशी को दिग्विजय सिंह ने अपने प्रथम मंत्रिमंडल में प्रायश्चित् स्वरूप 6 माह के लिये मंत्री बनाया था क्योंकि विधान सभा चुनाव-1998 में कांग्रेस किसी भी अल्पसंख्यक को चुनाव नहीं जिता सकी थी। इब्राहिम कुरैशी का नाम सामने आने पर इसे उनकी निष्ठा की उपलब्धि माना जाये या इसे दिग्विजय सिंह की असफलता के रूप लिया जाये जो गत् 18 वर्षों में अपना कोई और मुस्लिम समर्थक पैदा नहीं कर सके।

प्रदेश से मुस्लिम को राज्यसभा में भेजने की बात ने मुस्लिमों में कांग्रेस के प्रति पुनः आकषर्ण पैदा कर दिया मगर इसकी हवा, हाई कमान ने ब्राह्मण नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी को राज्यसभा टिकट देकर निकाल दी। प्रदेश के मुस्लिम नेता कांग्रेस के इस निर्णय पर भौचक्कें है, क्योंकि कांग्रेस राज्यसभा की एक सीट देकर प्रदेश के 15 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को मजबूत कर सकती थी। कांग्रेस ने भी भाजपा की तरह ही उत्तरप्रदेश की हार से कोई सबक नहीं लेते हुये दरबारियों की अनुशंसा पर सत्यव्रत चतुर्वेदी को राज्यसभा का टिकट तो दे दिया, मगर मुस्लिम मतदाताओं पर पड़ने वाले प्रभाव का कोई मूल्यांकन नहीं किया। मघ्यप्रदेश में राजनैतिक रूप से ब्राह्मण नेता के रूप में सुरेश पचौरी कांग्रेस के लिये ज्यादा मुफीद सिद्ध होते क्योंकि प्रदेशाध्यक्ष के रुप में कांग्रेस ने उनके नेतत्व में विधान सभा-लोक सभा चुनावों में बढ़त हासिल की थी।

राज्यसभा टिकट वितरण में भाजपा और कांग्रेस एक ही नाव पर सवार दिखती हैं क्योंकि भाजपा अपने हिन्दू वोट बैंक की भावनाओं को दर किनार करते हुये मुस्लिम प्रत्याशी चुनाती है। इसी प्रकार कांग्रेस बात तो करती रही मुस्लिम प्रत्याशी की मगर टिकट दिया एक हिन्दू को फलस्वरुप मुस्लिम कैडर नाराज हो गया। अब कांग्रेस अपनी गलती को सुधारने के लिये पार्टी में पद दे कर उन्हें खुश तो करना चाहती है मगर इस झुनझुने से मुस्लिम नेता कितने खुश होगें यह भविष्य में छुपा है। फिलहाल राज्यसभा टिकिट वितरण में समाजवादी पार्टी सबसे सफल लगती हैे क्योंकि उसने अपने समर्पित नेता विदिशा के चौधरी मुन्नवर सलीम को राज्यसभा का टिकिट दिया जिससे वह मध्यप्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं को समाजवादी पार्टी की ओर खींच सके। समाजवादी पार्टी ने वहीं दूसरी ओर उत्तरप्रदेश में कोई नया मुस्लिम नेता पैदा किये वगैर अपने मुस्लिम वोट बैंक को भी महत्व देने का संदेश दिया है।

करेन्सी-कनेक्टिविटी-कम्युनिटी में डूबे राज्यसभा चुनाव का यह दौर कब खत्म होगा कहना संभव नहीं है मगर यह जरूर है कि जनता की कसौटी पर यह सारे फार्मूले फेल हैं । अब जनता इस से ऊपर उठकर सिर्फ विकास और सुप्रशासन चाहती है यह हाल के चुनाव परिणामों से सामने आया है जिसे भाजपा और कांग्रेस दोनों ही नहीं पढ़ पा रही हैं।

बृजमोहन श्रीवास्तव
प्रदेशाध्यक्ष
म.प्र. नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Diplaw Kumar says:

    SARE PATI APNI EMAN KO RUPYO ME TOLTI HAI!
    ESKA MEN KARAN HUM PDE LIKHE BEKUF JANTA HAI KYOKI WO LOG BHI HMARE BICH K HAI|||||.

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