/शलभमणि पर हमला क्यों? क्या पुलिसिया कार्रवाई की कोई और थी वज़ह?

शलभमणि पर हमला क्यों? क्या पुलिसिया कार्रवाई की कोई और थी वज़ह?

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक बड़ी खबर ये आई कि आईबीएन के ब्यूरो प्रमुख शलभमणि त्रिपाठी और उनके एक साथी के साथ पुलिस ने कार्रवाई के नाम पर बदतमीज़ी की। घटना की सूचना मिलते ही लखनऊ के सभी पत्रकार एक एक कर इकट्ठा होने लगे। सैकड़ों की संख्या में आक्रोशित पत्रकार हजरतगंज कोतवाली पहुंचे और वहां जम कर नारेबाजी की। पत्रकारों  ने फैसला लिया कि अपने बीच के पत्रकार साथी शलभ के साथ दुर्व्यवहार किए जाने का वह बदला इसी क्षण लेंगे. सभी शांतिपूर्ण तरीके से सीएम आवास के बाहर पहुंचे और धरने पर बैठ गए.

इसकी भनक बड़े अफसरों को लगते ही सबके हाथ पांव फूल गए। उन्होंने आनन-फानन में शलभ पर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को निलंबित कर उनके खिलाफ मुकद्दमा भी दर्ज़ करवा दिया।

उधर लखनऊ के एक पत्रकार ने मेल के जरिए बताया कि आईबीएन 7 के पत्रकार शलभ और मनोज राजन त्रिपाठी दोनों की पुलिस के कुछ आला अफसरों से कई वजहों से दुश्मनी थी। मेल के मुताबिक दोनो पत्रकारों ने हाल के वर्षों में पत्रकारिता की आड़ में सरकारी मशीनरी के साथ मिलकर करोड़ों अरबो के वारे न्यारे किये है।

बताया जाता है कि अभी हाल ही में शलभ और मनोज ने मिलकर 90 लाख और 60 लाख के मकान ख़रीदे हैं। इतना ही नही इन दोनों की अकूत सम्पति का राज शलभ के ड्राईवर को भी लग गया जिस कारण ही मिश्रा नाम का यह ड्राईवर मौका पाते ही शलभ के घर से 47 लाख नगद और करीब दो करोड़ रुपए की सोने की ईट लेकर भाग गया था। बाद में शलभ ने सरकारी मशीनरी की मदद से ड्राईवर को माल समेत गिरफ्तार करा दिया था .. लेकिन ताज्जुब की बात इसमें ये रही कि जिस गाजीपुर थाने से उसकी गिरफ़्तारी दिखाई गई थी वहां उसके पास माल की बरामदगी सिर्फ सत्रह हज़ार रुपए ही दिखाई गई.. गौर करने की बात तो यह है कि लखनऊ में तीन साल की पत्रकारिता में कोई क्या इतनी अकूत संपत्ति का मालिक भी हो सकता है?
मीडिया दरबार को प्राप्त मेल के मुताबिक जिस खबर को लेकर पत्रकार लामबंद हुए थे और अखबारों ने जिस तरह से बढ़ा चढ़ा कर लिखा उसने एक बात साफ कर दी है की पत्रकारिता जैसी चीज तो लखनऊ में रही नही..  दर असल हुआ ये था कि शलभ और उनके निजी कैमेरामैन गुरुभक्त हजरतगंज पुरानी कोतवाली के सामने से आईबीएन के तेजकुमार प्लाज़ा स्थित दफ्तर जा रहे थे, रस्ते में किसी कारण भीड़ जमा थी, जिसके चलते रास्ता जाम हो गया था। जाम में फंसने के कारण इन दोनों पत्रकारों को भी रुकना पड़ा, लेकिन रास्ता न मिलने पर दोनों का पारा चढ़ गया.. शलभ कुछ बोलते उससे पहले ही गुरुभक्त  ने जोर-शोर से गाली गलौज करना शुरू कर दिया.. इतना ही नहीं गुरुभक्त ने भीड़ लगाने के लिए एक महिला को  जिम्मेदार मानते हुए उसे भी  खूब बेइज्जत किया। बताया जाता है कि महिला के फ़ोन पर जब पुलिस अफसर मौके पर पहुचे तो महिला की आपबीती सुनकर गुरुभक्त को कोतवाली ले जाने लगी बस इसी बात से नाराज़ शलभ त्रिपाठी ने पुलिस अफसरों से भी मारपीट शुरू कर दी।  इससे बौखला कर ही पुलिसवालों ने शलभ से मार-पीट की…

बहरहाल, इस सब के बावजूद पुलिसिया कार्रवाई ने मीडिया जगत को भड़काने का ही काम किया जिस कारण ही दर्ज़नो पत्रकारों ने मुख्यमंत्री आवास पर ज़ोरदार प्रदर्शन किया..  देर रात हुए प्रदर्शन में पत्रकारों की एकजुटता देखकर ही प्रशासन में बैठे हुक्मरानों ने ‘दोषी’ पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई का फरमान सुना दिया.. ‘लोकतंत्र’ पर हुए इस ‘हमले’ के बाद लखनऊ के पत्रकारों ने ऐसी एकजुटता की मिसाल पेश की जो हमेशा यादगार रहेगी..  उस रात पत्रकारों द्वारा एकजुटता दिखा कर यह सन्देश भी देने की कोशिश की गई है कि निजी जीवन में भले ही पत्रकार एक दूसरे से कितना भी खुन्नस क्यों न रखते हों,  जब बात ‘पत्रकारिता’ की होती है तो सब हमेशा एक जुट ही दिखेंगे..

(यह रिपोर्ट कई सूत्रों पर आधारित है तथा इसमें कई बातें ऐसी भी हैं जो कई पत्रकारों को कड़वी लग सकती हैं। इस रिपोर्ट के खिलाफ कई ऐसी तल्ख टिप्पणियां आई हैं जिन्हें सुधारने के बावजूद प्रकाशित नहीं किया जा सकता। हम हर तरह की टिप्पणियों का स्वागत करते हैं और हर किसी को अपनी बात रखने का अवसर भी देना चाहते हैं, लेकिन टिप्पणी करने वालों से अनुरोध है कि वे अपनी भाषा संयमित रखें तभी हम उन्हें प्रकाशित कर पाएंगे। – मॉडरेटर)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.