/निर्मल बाबा ने High Court को गुमराह कर जीता था मुकद्दमा, मीडिया दरबार लड़ेगा कानूनी लड़ाई

निर्मल बाबा ने High Court को गुमराह कर जीता था मुकद्दमा, मीडिया दरबार लड़ेगा कानूनी लड़ाई

निर्मल बाबा ने हबपेजेस के खिलाफ़ जो कानूनी लड़ाई जीती है वो कानून विशेषज्ञों की नजर में न्यायालय को गुमराह करके लिया गया एक फैसला है। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें मैदान खाली था और तीर तो क्या पत्थर भी चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अमेरिकी वेबसाइट ने अपना कोई वकील मैदान में नहीं उतारा न ही वो सफाई देने आई। बाबा के वकीलों ने जो कुछ अदालत को बताया उसका प्रतिवाद करने वाला कोई था ही नहीं। दिलचस्प बात ये है कि हाईकोर्ट में दाखिल की गई रोक लगाने की अर्ज़ी में कई विरोधाभासी और भ्रामक तथ्य हैं जिनपर किसी विपक्षी के न होने से प्रकाश डालना संभव नहीं हो पाया।

कानून विशेषज्ञों की मानें तो बाबा के वकीलों ने ये धोखाधड़ी पहले पैराग्राफ से ही शुरु कर दी थी। इसमें कहा गया है कि उनके मुवक्किल निर्मलजीत सिंह  नरुला (मीडिया दरबार को भेजे गए नोटिस में यह नाम निर्मल सिंह नरुला है) उर्फ निर्मल बाबा के दावे के अनुसार वे एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु हैं और उनके समागम का प्रसारण 30 से भी अधिक चैनलों पर होता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये चैनल बाबा जी के प्रवचनों और समस्या निवारण व गुणगान सेशन का प्रसारण नहीं करते बल्कि उसे टेली-शॉपी की तरह विज्ञापन के तौर पर चलाते हैं।

ये कुछ वैसा ही है जैसे मोटापा कम करने वाली मशीन और दर्द कम करने वाले तेल का विज्ञापन। अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे विज्ञापनों में जहां घर बैठे मशीन, तेल या गहने आदि पाने के तरीके बताए जाते हैं, वहीं बाबा के ऐड में होम-डिलीवरी के तौर पर खुशियों और समृद्धि की गारंटी दी जाती है और समागम में आकर सारे दुखों से छुटकारा पाने का प्रलोभन। बाबा के ऐड में अकाउंट नंबर भी प्रसरित किए जाते हैं जिसमें समागम की फीस के अलावा साधारण चंदा और कमाई का दसवां हिस्सा भी जमा करने की अपील की जाती है।

मशहूर वकील अमित खेमका का मानना है कि विज्ञापन को प्रसारण बता कर अदालत को गुमराह करना एक अपराध है। बाबा के वकीलों ने अदालत को इसलिए आसानी से गुमराह कर लिया कि दूसरे पक्ष ने कोई सफाई पेश नहीं की और बाबा के वकीलों की चतुराई पर ध्यान नहीं दिलाया गया। हबपेजेस के मुकद्दमे में और भी कई भ्रामक बातें लिखी गई हैं। जैसे वशीकरण मंत्र के बारे में लिखना अपमानजनक है, बाबा की वेशभूषा के बारे में लिखना गलत है, उनपर निजी हमला है आदि।

मीडिया दरबार भी निर्मल बाबा के प्रवचनों और विज्ञापनों को न सिर्फ नैतिकता के विरूद्ध मानता है बल्कि उनमें लोगों को लगातार दी जा रही गुमराह करने वाली जानकारियों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। दिलचस्प बात यह है कि बिना किसी के  घर पहुंचे उसके अलमारी में रखी रकम देख लेने वाले बाबा जी उनके खिलाफ़ चल रहे थर्ड मीडिया के अभियान के बारे में कुछ नहीं जान पाए। हबपेजेस के खिलाफ बिना लड़े मुकद्दमा जीतने वाले  बाबा के वकीलों ने मीडिया दरबार को भी धमकाने की कोशिश की है, लेकिन हमने इसे चुनौती देने का फैसला किया है और डटे हुए हैं। मीडिया दरबार के वकील कुशेश्वर भगत का कहना है कि निर्मल बाबा के वकीलों का कानूनी नोटिस पूरी तरह आधरहीन है और उसका माकूल जवाब दे दिया गया है।

हबपेजेस के विरुद्ध मुकद्दमे में बाबा के वकील यह भी लिखा है कि हबपेजेस विज्ञापन के जरिए धन कमाने का साधन है। खेमका पूछते हैं कि अगर हबपेजेस के विज्ञापन धन कमाने के लिए है तो क्या बाबा अपने विज्ञापन में दिए खाता नंबरों के जरिए धन नहीं बटोर रहे हैं?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.