/‘‘आप तो खा-म-ख्वाह पीछे पड़ गए, ‘सिर्फ’ 70 लाख ही तो हर रोज़ कमाते हैं निर्मल बाबा”

‘‘आप तो खा-म-ख्वाह पीछे पड़ गए, ‘सिर्फ’ 70 लाख ही तो हर रोज़ कमाते हैं निर्मल बाबा”

निर्मल बाबा की एक दिन की कमाई कितनी है? कुछ लाख, करोड़, दो करोड़ या चार करोड़?

मीडिया दरबार ने ये बहस शुरु की तो तरह तरह के जवाब मिले। भक्तों ने कहा कि तालकटोरा इंडोर स्टेडियम की क्षमता ही साढ़े तीन हज़ार की ही है तो उस हिसाब से महज़ 70 लाख ही हुए। किसी ने कहा, लखनऊ में 22-23 हज़ार लोग आए थे, वहां तो साढ़े चार करोड़ के आस-पास कमाई हो गई होगी। किसी ने लिखा, पटना में बाबा को साढ़े तीन करोड़ की कमाई हुई थी। तो किसी ने कहा, आपने तो चार करोड़ बहुत कम रकम बताई है। इतनी रकम तो गुप-चुप तौर पर दसवंद में ही आ जाती होगी। कुछ भक्त हमें गालियों भरा मेल भेज रहे हैं तो कुछ अधर्म के खिलाफ़ इस जंग में हमारे साथ खड़े होने का भरोसा दिला रहे हैं।

बाबा जी की एक भक्त (या सलाहकार) ने तो फोन करके इस पेज को हटाने के लिए भी कहा, लेकिन जब हमने उनसे पूछा कि असल कमाई वे ही बता दें, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बाबा के वकील ने तो बाकायदा कानूनी नोटिस भेजा और हमारे उठाए मुद्दे को गलत, आधारहीन और उनके मुवक्किल का अपमान करने वाला बताया, लेकिन सच्चाई क्या है ये किसी ने नहीं बताया।

दरअसल तमाम टीवी चैनलों पर ‘थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा’ के नाम से बाबा का विज्ञापन दिन-रात प्रसारित हो रहा है। इस विज्ञापन में बाबा जी कहते हैं कि टीवी पर उन्हें देखने से भी किरपा आ जाती है। जैसे जैसे ये विज्ञापन लोकप्रिय हो रहा है वैसे-वैसे उनके समागम की लोकप्रियता भी बढ़ रही है. निर्मल बाबा के किसी भी समागम में शामिल होने के लिए भक्तों को 2000 रुपये की फीस चुकानी पड़ती है (दो साल से उपर के बच्चे का रजिस्ट्रेशन जरूरी है). फीस महीनों पहले जमा हो जाती है।

बुकिंग का तरीका निर्मल बाबा की वेबसाइट nirmalbaba.com पर लिखा है। साथ ही दर्ज़ है समागम की जगह और तारीख. इसी सूची के आगे लिखा रहता है ओपेन या क्लोज्ड और स्टेटस यानी बुकिंग चालू है या बंद हो चुकी है. आने वाले महीनों के सभी समागम कार्यक्रमों की एडवांस बुकिंग फिलहाल बंद दिखाई दे रही है. वेबसाइट के पहले ही पन्ने पर इसकी फीस और इसे जमा कराने का तरीका भी दर्ज है. फीस जमा कराने के लिए वेबसाइट पर निर्मल दरबार के दो एकाउंट नंबर भी दिए गए हैं. ये एकाउंट नंबर टीवी के थर्ड आई ऑफ निर्मल दरबार कार्यक्रम के दौरान भी प्रचारित किए जाते हैं.

निर्मल दरबार सिर्फ समागम से कमाई नहीं करता. दसवंद नाम से एक और जरिया है पैसे वसूलने का। बाबा का कहना है कि उनकी कृपा से किसी समस्या के समाधान हो जाने पर भक्त को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दसवंद के तौर पर देना होता है लेकिन इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता. अलबत्ता कई विज्ञापनों में निर्मल बाबा ये कहते हुए जरूर सुनाई पड़ते हैं कि अगर अपनी कमाई या लाभ का दसवां हिस्सा हर महीने पूर्णिमा से पहले नहीं जमा करवाओगे तो नुकसान होना भी शुरु हो जाता है। ग़ौरतलब है कि सिख धर्म में दसवंद गुरुद्वारों में जमा करने की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन वहां भक्तों को अपने
दान के खर्च पर नज़र रखने का भी अधिकार होता है।

पंजाब नैशनल बैंक इन बाबा जी का प्रिय बैंक है। इसका अकाउंट नंबर वेबसाइट पर और चैनलों पर भी प्रसारित होता है। इस अकाउंट में नगद, डिमांड ड्राफ्ट या फिर निर्मल दरबार के विशेष चालान से फीस जमा की जाती है। बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि देश भर की उनकी शाखाओं में बाबा जी दिन भर चर्चा का मुद्दा बने रहते हैं। बैंक की सभी शाखाएं इंटरनेट से जुड़ी हैं और वरिष्ठ अधिकारी इसका स्टेटस देख सकते हैं। हर रोज बाबा जी का लाखों-करोड़ों में बढ़ता बैलेंस पूरी शाखा में गॉसिप का केंद्र बना रहता है। खास बात ये है कि बाबा जी के अकाउंट से नियमित अंतराल पर ये पैसे ‘कहीं और’ ट्रांसफर भी होते रहते हैं।

आज ही झारखंड के एक प्रमुख अखबार ने बाबा जी के दो अकाउंटों का हवाला देते हुए राजफाश किया है कि उसमें कल यानि 12 अप्रैल 2012 को सोलह करोड़ रुपए जमा हुए थे। ग़ौरतलर्ब है कि निर्मल दरबार अपने विज्ञापन में कम से कम तीन अकाउंटों का प्रचार करता है।  बाबाजी से उनकी कमाई और खर्चे को लेकर उनसे कई सवाल पूछे गए, लेकिन कभी कोई जवाब नहीं मिला। उन्हें मेल भेजने पर ऑटो रिप्लाई के जरिए उनका अकाउंट नंबर ही आ जाता है तथा फोन पर कोई जवाब भी नहीं मिलता।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.