/क्या स्टार ने विज्ञापन करार रिन्यू न होने पर छेड़ी निर्मल बाबा के खिलाफ़ मुहिम?

क्या स्टार ने विज्ञापन करार रिन्यू न होने पर छेड़ी निर्मल बाबा के खिलाफ़ मुहिम?

सौरभ नाम के एक पाठक ने मेल के जरिए दावा किया है कि स्टार न्यूज़ और निर्मल बाबा के संस्थान के बीच जो करार चल रहा था उसके टूट जाने पर ही चैनल ने बाबा का पोल-खोल अभियान शुरु किया है. करार  11 अप्रैल को रिन्यू करना था जो निर्मल बाबा ने नहीं किया. मेल के मुताबिक स्टार की मार्केटिंग टीम ने कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करने की काफी कोशिश की, लेकिन ऐसा कराने में सफल नहीं हुए.

दरअसल बाबा की मार्केटिंग टीम ने स्टार की टाइमिंग को लाखों रूपये मूल्य के लायक नहीं समझा क्योंकि स्टार न्यूज ने बाबा के लिए तड़के 5:40 का समय दिया था, वह भी भारी भरकम फीस पर. उधर बाबा के प्रबंधकों को लगा कि सुबह इतने सवेरे प्रवचन  देखने वाले कम लोग होते हैं. आखिरकार जब करार टूट गया तो थक-हार कर स्टार ने इसके खिलाफ बोलना अब शुरू किया है.

ख़ैर पूरा सच क्या है, यह तो राम ही जाने, लेकिन बात पूरी तरह गलत भी नहीं मालूम पड़ती. स्टार न्यूज़ की खबर में कुछ ऐसी बातें हैं जिससे शक और गहराता है. चैनल कल से लेकर आज सुबह तक निर्मल बाबा पर लगातार खबरें चला रहा था. खबर के दौरान यह भी कहा जाता है कि पिछले एक महीने से स्टार न्यूज़ पड़ताल कर रहा है. लेकिन इस एक महीने की पड़ताल में स्टार न्यूज़ ने ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जो कुछ अलग हो. स्टार न्यूज़ जो दिखा रहा है वो सब वेब मीडिया के जाबांज पहले ही प्रचारित – प्रसारित कर चुके हैं. स्टार न्यूज़ बाबा के खिलाफ खबरें दिखा रहा है, यह काबिलेतारीफ है, लेकिन एक महीने की जांच-पड़ताल वाली बात हजम नहीं हो रही. यदि वाकई में एक महीने स्टार न्यूज़ ने छान-बीन की है तो सवाल उठता है कि स्टार न्यूज़ के रिपोर्टर छान – बीन कर रहे थे या फिर झक मार रहे थे. यह काम तो वेब मीडिया ने एक हफ्ते में कर दिया और निर्मल बाबा के पूरे इतिहास – भूगोल को खंगाल डाला.

बात साफ है कि निर्मल बाबा के खिलाफ स्टोरी चलाना और विज्ञापन को बंद करना स्टार न्यूज़ की विवशता है, इसमें सरोकार वाली कोई बात है, इसपर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता. बिहार में एक कहावत है – ‘जात भी गंवाया और भात भी नहीं खाया’. स्टार न्यूज़ की स्थिति कुछ वैसी ही हो गयी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.