/कोई भी एक-दूसरे के सवालों का जवाब नहीं दे पाया, न आजतक और न निर्मल बाबा

कोई भी एक-दूसरे के सवालों का जवाब नहीं दे पाया, न आजतक और न निर्मल बाबा

निर्मल बाबा के विज्ञापन की टीआरपी से नंबर वन बने न्यूज़ चैनल आजतक ने निर्मल बाबा पर लग रहे आरोपों का जवाब उनसे ही मांगा. अभिसार शर्मा ने निर्मल बाबा से खूब करारे सवाल किए और बाबा ने सबका जवाब देने की कोशिश की ‘किरपा’ के सहारे।

अभिसार ने बाबा से जब उनके पैसे का हिसाब मांगा तो उन्होंने साफ कहा कि वे कोई ट्रस्ट या एनजीओ बनाने के पक्ष में नहीं है। पैसा जनता ने दिया है, लेकिन वे टैक्स देते हैं। जब अभिसार ने प्रभात खबर में छपी खबर का हवाला देते हुए पूछा कि वे 109 करोड़ रुपए का क्या कर रहे हैं तो उन्होंने बड़े ही बोल्ड लहजे में कहा, ‘मैं आपके आंकड़ों को दुरुस्त कर दूं.. मेरा सालाना टर्नओवर 238 करोड़ के आसपास का है.. 109 करोड़ का नहीं..”

बाबा ने साफ किया कि वे पैसा इसलिए इकट्ठा कर रहे हैं कि इसी पैसे से सभी चैनल उनका प्रवचन दिखाते हैं, उनका पेड प्रोग्राम दिखाते हैं। अब बारी अभिसार के जवाब देने की थी, जब बाबा ने साफ शब्दों में पूछा कि क्या कोई चैनल उनका प्रवचन मुफ्त में प्रसारित करने को तैयार है? सवाल का उत्तर नहीं मिल पाया।

दरअसल बाबा अब खुल कर मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने अब तक विज्ञापन के दम पर सभी चैनलों का मुंह बंद रखा, लेकिन लगता है उनके मैनेजरों के बस में सभी चैनल नहीं रह पाए। फिर सबको साधने के झमेले से बेहतर उन्होंने समझा कि कम से कम उस चैनल पर तो बोला ही जाए जिसने अब तक हमला नहीं शुरु किया है।

बाबा ने अपने बयान से कम से कम एक बात तो साफ कर दिया। जिसने उन्हें पैदा किया वो कोई और नहीं इन्हीं चैनलों का लालच है जो अब उनके भाष्मासुर बन जाने पर अपना सर छुपाते भाग रहे हैं। कहना गलत न होगा कि पैसे के लालच में न्यूज चैनलों ने अपने नियम, सिद्धांत, कायदे और नैतिकता सबको बेच डाला है।

हालांकि अभिसार ने कई सवाल ऐसे ढंग से पूछे जिनसे लग रहा था कि वे वास्तव में बाबा को कठघरे में रखना चाहते हों, लेकिन जिसने भी इंटरव्यू देखा उसने यही कहा कि ये तो रजत शर्मा के आपकी अदालत से भी ज्यादा हो गया जहां न सिर्फ बाबा को बेदाग साबित कर दिया गया बल्कि उनका महिमामंडन भी हो गया। आसानी से समझा जा सकता है कि अब बाबा के प्रवचन का कॉन्ट्रैक्ट आजतक पर रिन्यू हो या नहीं, उनकी ‘किरपा’ तो बरस ही चुकी है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.