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मैं तो सारी दुनिया को उल्लू बना के लूटो सूं.. ‘कोई मेरो का कल्लेगो?”

By   /  April 17, 2012  /  12 Comments

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-जगमोहन फुटेला-

कवि ओमप्रकश आदित्य की एक कविता सुनी थी कोई पैंतीस साल हुए रुद्रपुर के एक कवि-सम्मलेन में. शीर्षक था, “कोई मेरो का कल्लेगो” (कोई मेरा क्या कर लेगा). अब वो कविता शब्दश: याद नहीं. लेकिन उस कविता का पात्र दुनिया भर की हरामज़दगी करने की बात कहता है. इस चुनौती के साथ कि खुद भ्रष्ट और कुछ करने को अनातुर व्यवस्था उसका कर क्या पाएगी. निर्मल बाबा वही हैं. व्यवस्था भी वैसी. सारे देश को बुद्धू बना रहा है वो सरेआम. मगर व्यवस्था है कि कुछ करने को आतुर नहीं है. आज वो इस स्थिति में है कि व्यवस्था को अपनी रखैल बना सके.

रुद्रपुर में ही मेरा एक दोस्त कहा करता था, दुनिया में मूर्ख बनने वालों की कमी नहीं है, बस बनाने वाला चाहिए (उसने तो मूर्ख की जगह कुछ और कहा था, लेकिन मैं शालीनता की खातिर उस से मिलते जुलते इस शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ). निर्मल बाबा ने वो कर के दिखा दिया है. उस की कलाकारी देखिए कि जिन चैनलों पे उस के खिलाफ(?) बोला जाता है उन्हीं पे उस की प्रशंसा के कार्यक्रम चलते हैं. भले ही विज्ञापन के रूप में. उसके चालू और चैनल के भड़भूजेपन का आलम ये है कि वो खुद अपने इश्तहारी कार्यक्रम में अपनी आलोचना कराता है और फिर उसी में अपना गुणगान. ऊपर कोने में चैनल का लोगो है ही. लगता है कि चैनल पे जो आलोचना हुई थी वो चैनल ने अपनी तरफ से तारीफ़ में बदल दी है. मज़े की बात ये है कि जब तारीफ़ वाला हिस्सा आता है तो ऊपर विज्ञापन भी लिखा नहीं होता. ‘विज्ञापन’ शब्द भी लगातार नहीं है. कभी आता है, कभी जाता है. चैनल चापलूस हो गया है. इतना दम है बाबा के पैसे में कि वो उसके आगे बोरी बिछा के लेटने को तैयार है. निर्मल बाबा का विरोध भी चैनल भड़वागिरी के तरीके से कर रहे हैं. सच तो ये है कि बाबा के खिलाफ(?) इस तरह के प्रचार से उसका प्रसार और ज्यादा हो रहा है. सुना है बाबा अपने भक्तों में वो सीडियां बंटवा रहा है. ये बता के देखो जिन चैनल वालों ने उसके खिलाफ दुष्प्रचार किया वो खुद अब उसकी तारीफ़ कर रहे हैं. लोग और ज्यादा बेवकूफ बन रहे हैं. भीड़ बढ़ रही है. आमदनी भी और इस उपकार के बदले में चैनलों को मिलने वाली विज्ञापन-राशि भी.

अब कोई चमत्कार ही हो जाए तो बात लगा है वरना आप नोट कर के रख लो. बाबा का कुछ नहीं बिगड़ने वाला. खासकर उसके खिलाफ हो दर्ज हो रही इस तरह की शिकायतों के बाद. अपन को तो ये शिकायतें भी फर्जी और अपने खिलाफ खुद दर्ज कराई लगती हैं. बेतुकी और बेसिरपैर की. मिसाल के तौर पर कि मैंने बाबा के कहने से खीर खाई. मुझे शुगर हो गई. अब इस एक शिकायत को ही सैम्पल केस मान लें. क्या सबूत है कि बाबा ने मीठी खीर खाने को कहा ही था? खीर क्या कोई ज़हर है? माना कि डायबिटीज़ हो तो नहीं खानी चाहिए. मगर क्या बाबा को बताया गया था कि भक्त मधुमेह का मरीज़ है? और अगर वो पहले से है तो उसने फिर भी क्यों खाई? खानी ही थी तो जिस डाक्टर का इलाज चल रहा था उस की राय के अनुसार क्यों नहीं खाई? और फिर ये क्या पता कि बाबा के यहाँ हो आने के बाद आपने मीठी खीर के अलावा और भी कोई बदपरहेज़ी की थी या नहीं? की या नहीं की, क्या आप लगातार अपने ब्लड शुगर की माप करते हो? करते हो तो तुरंत खीर खानी बंद कर दवा क्यों नहीं ली और नहीं करते हो तो क्या वो बाबा आ के करेगा? वकीलों दलीलों के द्वंद्व में भी जीतेगा बाबा ही. भक्त अगर भक्त है तो वैसे ही भाग जाएगा. और अगर सच में ही दुखी है तो नीचे निचली अदालत तक के वकील की फीस भी नहीं चुका पाएगा. बाबा उसको ले के जाएगा सुप्रीम कोर्ट तक.

अगर सिर्फ पेट सिकोड़ लेने की कला के साथ बाबा रामदेव बरसों पुरानी योग की पद्धति के साथ सौ पचास रूपये की दवाइयां बेच सकते हैं तो निर्मल नरूला तो सिर्फ समोसे और उस से भी सस्ते मंदिर में स्नान भर की बातें कह रहे हैं. एक आदमी को बीडी पी लेने की नसीहत भी उन ने दी. और भैया हिंदुस्तान में जो बिना पैसे के इलाज करता हो उसको लोग पूजते और वो मरे तो उसकी समाधि या मज़ार तक बना लेने तक के आदी हैं. फिर भले ही वो किसी हाईवे के बीचोंबीच किसी जानलेवा मोड़ का कारण ही क्यों न हो!

दुर्भाग्य इस देश का ये है कि वो सरासर बेवकूफों सी बातें कर के बेवकूफ बनाता जा रहा है. समझ उसके खेल को हर कोई रहा है. मगर कर कोई कुछ नहीं पा रहा. इसकी वजह भी सिर्फ कुछ न करने की इच्छा ही नहीं है. वजह ये भी है कि संतों और भक्तों के इस पावन देश में अपनी पवित्रतम नदी में कुत्तों तक की सड़ी गली लाश बहाना भी पुण्य की परिभाषा में आता है और संतई की आड़ में छोटे छोटे बच्चों के साथ भी जो कुकर्म कर डाले लोग उसे बापू (xxराम) समझ कर पूजते रहते हैं. किसी भी सरकार या प्रशासन में संतई या सुधार की आड़ में देश को शोषित या भ्रमित करने वाले ऐसे किसी भी दुश्चरित्र के खिलाफ कुछ करने साहस नहीं रहा है जिस के पीछे भक्तों क्या, महज़ तमाशबीनों की भीड़ भी हो. और निर्मल बाबा के मामले में तो भारत की दंड विधान संहिता भी जैसे मौन है. कहाँ लिखा है कि खीर खाने को कहना या धारीदार लुंगी पहनने को कहना अपराध माना जाएगा? दो हज़ार रूपये समागम में आने की फीस बाबा पहले से बता के लेता है. दसवंध लेने भी बाबा या उसके बंदे किसी के घर जाते नहीं. राम रहीम की तरह सिर पे कलगी लगा के वो अपने आप को किसी गुरु का अवतार भी नहीं बता रहा कि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हों. क्या कह के पकड़ ले जायेगी पुलिस उसे? किस दफा में चालान पेश होगा? किस कुसूर की सजा मिलेगी उसे? लाख टके का सवाल ये है कि बाबाओं को भी ढोंगी मान सकने का प्रबंध और क़ानून की किताबों में वो अनुबंध ही कहाँ है जिस के न होने से निर्मल बाबा जैसे लोग लगातार जनता का शोषण और धनोपार्जन ही नहीं कर रहे. इस देश की सत्ता, व्यवस्था और आस्था का मज़ाक भी उड़ा रहे हैं. कोई मेरो का कल्लेगो की स्टाइल में!

ये व्यवस्था ऐसे ही चली तो वो दिन दूर नहीं जब किसी भी राम रहीम और रामदेव की तरह दुनिया अपने पीछे लगाए निर्मल बाबा भी आपको नेता अपने क़दमों में बिठाए मिलेंगे.

(जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपादक हैं।)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

12 Comments

  1. virendra says:

    जगमोहन फुटेला जी सिर्फ लिखने से कुछ होने वाला नहीं है अगर वाकई में देश के लिए कुछ करना चाहते हो तो बाबा रामदेव जी की tarah un विदेशी कंपनियो के समक्ष एक स्वदेशी उद्योग खड़ा करो जिससे देश के लाखो लोगो को विदेशी कंपनियो की लूट से निजात मिल सके कहना बहुत आसन है…..और हम जैसे लोग सिर्फ लिखकर या दूसरो की कमिया दुन्दते दुन्दते मर जाते है….इसलिए कुछ ऐसा करो जिससे गर्व से कह पाओ की हमने भी देश के लिए कुछ किया है जीवन सार्थक हो जायेगा

  2. Mohan Johari says:

    जगमोहन जी आपकी मुहीम वाकई तारीफ ए काबिल है!

  3. Atul Agarwal says:

    सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को.इस हमाम में सब नंगे हैं.इस बाबा तंत्र का मतलब अब हो गया है धर्म का व्यापारी.हिन्दू धर्म को खतरा किसी बाहरी ताक़त से नहीं इन तथाकथित बाबाओं से ही है जो धर्म के नाम पर सिर्फ पैसा कमाना ही अपना मकसद समझते हैं.ये कहना भी गलत है कि सभी बाबा एक जैसे हैं.देखते हैं हम हिन्दुओं की नींद कब खुलती है. मजे की बात "बाबा इनकम टैक्स भरता है ".अपने आप को बाबा कहते हो और कमाई के धंधे में लगे हो.अरे भाई ,क्यों बाबा शब्द की बेइज्जती करते हो.बाबा माया के पीछे क्यों भाग रहा है? अन्धविश्वास फैला रहा है पैसों के लिए.
    हिन्दू धर्म का इतिहास कितने ही मुनियों,ऋषियों,सन्यासियों और बाबाओं की कहनियों से भरा पड़ा है जिन्होंने बिना किसी माया की चाहत किये समाज को उठाने का काम किया.महर्षि व्यास ने वेदों की रचना बाज़ार में बेच कर धन कमाने के लिए नहीं की थी.आचार्य कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त को राजा बनाया लेकिन खुद शहर के बाहर एक कुटिया में ही रहते थे.ये तो कुछ उदहारण है.ऐसा है हमारा हिन्दू धर्म.लेकिन आज?कोई कृपा बेच रहा है कोई योग बेच रहा है ,कोई मानसिक शांति पाने का उपाय बेच रहा है, कोई राम कथा तो कोई गीता के श्लोक,कोई कुछ तो कोई और कुछ.वो भी मीडिया को पैसे दे कर प्रचार कर कर के.कितने गर्त में जा रहा है हमारा धर्म.जरा सोचिये.

    वैसे आज हमारे देवी देवताओं की कीमत भी तय कर दी गयी है.यदि मैं उज्जैन में रहता हूँ तो मेरे लिए महाकाल की कीमत ५० रुपये और माता वैष्णव देवी की कीमत ५०० रुपये उसी तरह यदि आप गौहाटी में रहते हैं तो माँ कामख्या देवी की कीमत ५० रुपये और गौहाटी से बाहर के लोगों के लिए ५०० रुपये.यदि मैं कलकत्ता में रहता हूँ तो खाटू में बैठे श्याम की कृपा के लिए मुझे ५०० रुपये चुकाने होंगे और घुसरी धाम में बैठे श्याम बाबा को ५० रुपये और इनकम टैक्स के रूप में आपकी कमाई का १० प्रतिशत भगवान के एजेंट के पास मासिक तौर पर जमा करवाने होंगे.कलयुग है तो भगवान का भी अपने भक्तों पर अब भरोसा नहीं है.अगर आपके पास पैसे नहीं है तो आपका किसी मंदिर में जान बेकार है क्योंकि हमारे देवी देवताओं ने अब अपनी कृपा की कीमत तय कर दी है और निर्मल सिंह नामक एक एजेंट नियुक्त कर दिया है और अपनी सारी कृपा उस एजेंट की मुट्ठी में बंद करवा दी है.पैसे चुकाओ तो मुट्ठी खुल जाएगी और आपको अपने भगवान की कृपा मिल जायेगी वरना तो मुट्ठी बंद.

    और हाँ उस एजेंट को तीसरी आँख की शक्ति भी प्रदान कर दी गयी है ताकि वो नज़र रख सके कि कोई भक्त मंदिरों में जा कर बेईमानी तो नहीं कर रहा है.

    धन्य हो प्रभु इतने कलयुगी मत बनो.अभी भी समाज में लोगों को बहुत तकलीफ और परेशानियाँ हैं बहुत से गरीब लोग हैं.प्रभु जरा सोचिये.

  4. Sunil Arora says:

    निर्मल बाबा तो बहाना है: पिछले लगभग पॉच छह वर्षों से पूरे भारत में अंधविश्वास फैला कर लोगों को लूट रहे निर्मल नरूला उर्फ निर्मल बाबा सरेआम अधिकॉश न्यूज चैनलों और अन्य मनोरंजक चैनलों पर रोज आकर अपनी ठगी का धंधा चला रहा था और उसके इस ठगी और लूट के धंधे में ये टीवी चैनल बाराबर के हिस्सेदार बने हुऐ थे तथा चुपचाप माल बटोर रहे थे लेकिन अचानक क्या हुआ कि ये सारे के सारे चैनल जो उसका नमक खा रहे थे अचानक नमक हरामी पर उतर आऐ है यह बड़ा रहस्य है?
    दरअसल यह सब अचानक नहीं हुआ है इसके पीछे बड़ा गहरा षड़यंत्र प्रतीत हो रहा है क्योंकि तीन जून से बाबा रामदेव का भारत स्वाभिमान के तहत कालेधन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर व्यवस्था परिवर्तन का महाऑदोलन प्रारंभ हो रहा है जिससे सरकार के हाथ पॉव अभी से फूल रहे है क्योंकि सरकार के पास उनकी मॉगों/मुद्दों का कोई भी काट नहीं है इसलिये सरकार न्यूज चैनलों के माध्यम से निर्मल बाबा को शिकार करने के बहाने बाबाओं के बदनाम कर तथा बाबा रामदेव पर निशाना लगाने का बहाना ढॅूढ रही है जिससे उनको और उनके व्यवस्था परिवर्तन की महाक्रॉति को बदनाम किया जा सके। आजकल सरकार के षड़यंत्र की प्रथम कड़ी में टीवी पर बहस में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवी (परजीवी) अपनी बहस में बाबा रामदेव का नाम भी इस निर्मल बाबा के साथ शामिल करने की कोशिश करते देखे जा रहे है तथा तीन जून से आते आते ये सरकार देश में ऐसा वातावरण तैयार करना चाहती है जिससे बाबा रामदेव को बदनाम कर उनके ऑदोलन को दबाया जा सके। इसीलिये भॉड न्यूज चैनल और बिकी हुई मीडिया अभी से इस कोशिश में लग गयी है। लेकिन देश की जनता जाग चुकी है तथा हमें इन षड़यंत्रों की तरफ सबका ध्यान खींचते हुऐ महाक्रॉति के पक्ष में वातावरण बनाना होगा।.

  5. Manu Singla says:

    Austin Noronha , KRIPA IS LIKE A COMMODITY AND HEAVY IN DEMAND AND BABA HAS STATRTED THE RIGHT PROFITABLE BUSINESS.

  6. koi thaaro bhi ka kallego.. 😛

  7. एक नए आतंकवाद का खतरा अब भारत की भूमि में मंडराने लगा है! "धार्मिक आतंकवाद " जिसमे की कई आध्यात्मिक आतंकवादी देश के लगभग हर हिस्से में "अंधविश्वास का बम " प्लांट कर चुके है और हमारी भोली भाली जनता के इनके धमाको की चपेट में आने की प्रबल सम्भावना है! देश के हर जागरूक नागरिक से अनुरोध है की अपने आस पास के लोगो को जागरूक करें और देश के अन्दर फैले इन् कसाबों से भारत को बचाए!
    ::::::::Lalett Bisht::::::::

  8. Austin Noronha says:

    May he dupe, loot and fleece more and more brainwashed deluding people.

  9. Austin Noronha says:

    My salute to Nirmal Baba for duping the deserving people.

  10. Manu Singla says:

    kripa lo kripa……rate sirf 2000 rs….. more profitable than selling cloths in jharkhand… nirmal baba has still enough stock of kripa to sell.

  11. Vipin Mehrotra says:

    Very shameful that these self assigned babas are indulging in loot of gullible poor people and Gov is not doing anything to control them.

  12. आपने सच्चाई का बखान किया है 1बाबाओं को भी ढोंगी मान सकने का प्रबंध और क़ानून की किताबों में वो अनुबंध ना होने के कारण ही निर्मल बाबा जैसे लोग लगातार जनता का शोषण और धनोपार्जन ही नहीं कर रहे. इस देश की सत्ता, व्यवस्था और आस्था का मज़ाक भी उड़ा रहे हैं1 इसे रोकने के लिए कानून का होना बहुत जरुरी है 1.

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