/तो दिल्ली पुलिस के हैड कांस्टेबल की बीवी से बदतमीजी की थी शलभमणि ने?

तो दिल्ली पुलिस के हैड कांस्टेबल की बीवी से बदतमीजी की थी शलभमणि ने?

आईबीएन-7 के बहुचर्चित लखनऊ ब्यूरो प्रमुख शलभमणि त्रिपाठी ने अपने फेसबुक पर लिखा है… ” मुखालिफत से मेरी शख्सियत संवरती हैमैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूं……. ”  जो साथ हैं उनको नमनजो खिलाफ है उनको बार बार नमन...

लेकिन उनके समर्थकों (चमचों) की भाषा ऐसी नहीं है। तकरीबन सभी चमचे उनके विरोधियों को धमकाने और हड़काने की शैली में ब्लॉग और कमेंट लिख रहे हैं। एक ने लिखा है ‘जो खिलाफ हैं उनका दमन…’  इतना ही नहीं, कुछ चमचों ने तो उन महोदय को उत्तर प्रदेश का सबसे होनहार पत्रकार तक घोषित कर डाला।

ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोशिएसन (बीईए) की जांच से पहले ही ब्लॉगरों और इंटरनेट के खिलाड़ियों ने अपना फैसला सुना दिया है। मीडिया दरबार की भी कड़े शब्दों मे निंदा की गई है और इसे गैर जिम्मेदार कहा गया है। खुद को पत्रकार कहने वाले कुछ ब्लॉगरों ने तो शलभमणि के बचाव मे अपने आप को उससे ज्यादा भ्रष्ट और घटिया करार दे डाला। इतना ही नहीं, उसके खिलाफ़ लिखने वालों की बखिया उधेड़ डालने की धमकी भी दी गई है।

लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मीडिया दरबार के प्रयास के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं। ब्लैकमेलरों और दलालों की इस भीड़ से पत्रकारिता को बाहर निकालने के मक़सद से चलाई गई इस मुहिम में मीडिया दरबार को जोरदार समर्थन मिल रहा है। न सिर्फ वेबसाइट पर बल्कि फेसबुक और दूसरे प्लेटफॉर्मों पर भी समर्थक बड़ी संख्या में अपने रुख का इजहार कर रहे हैं। मीडिया दरबार भी प्रतिज्ञा करता है कि वह हर उस शख्स को बेनक़ाब करेगा जो उन पत्रकारिता के दुश्मनों का साथ देगा

नूरा कुश्ती मे शलभमणि के ‘समर्थक’ चाहै जितनी हांक ले, हकीक़त ये है कि उनके पास इस मामले के तथ्यों की जानकारी ही नहीं हैं (या फिर मानना नहीं चाहते) । इससे पहले की रिपोर्ट: शलभमणि पर हला क्यो.. बेशक एक विश्वसनीय पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित थी, लेकिन अब जब मीडिया दरबार की टीम ने मामले की तहकीकात की तो न सिर्फ बीच की गायब कड़ियां मिल गईं, बल्कि सबूत भी मिल गए।

मीडिया दरबार को मिली जानकारी के मुताबिक जिस बाजार में यह कथित पत्रकार उत्पीड़न की घटना हुई है वहां दरअसल दिल्ली पुलिस के एक हैड कांस्टेबल महोदय अपनी पत्नी के साथ वहां से गुजरते वक्त खरीददारी करने को रुके थे। शायद पुलिसिया रुआब का असर रहा होगा कि उन साहब ने अपनी गाड़ी गलत ढंग से लगा दी। लेकिन उनकी यह गलती इतना बड़ा तूफान खड़ा कर देगी  इसका शायद उन्हें भी अंदाज़ा न था।

स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि शलभमणि और उनके साथी मनोज राजन इस गलत ढंग से खड़ी गाड़ी में बैठी महिला से अभद्रता से पेश आने लगे। यूपी पुलिस के वहां तैनात पदाधिकारी और जवान कुछ देर तो तमाशा देखते रहे, लेकिन जब महिला ने उनसे मदद मांगी तो वे बीच-बचाव करने पहुंचे। एक पुलिस अधिकारी बी पी अशोक ने जब लगातार गाली-गलौज कर रहे और हाथापाई पर उतारू मनोज राजन का हाथ पकड़ लिया तो शलभमणि को गुस्सा आ गया और उन्होंने पुलिस अधिकारी  पर ही हाथ छोड़ दिया और उसे पीटने लगे।

अपने अधिकारी को पिटता देख दूसरे पुलिस वाले भी सकते में आ गए और बीच-बचाव करने कूद पड़े। इसी झगडे मे शलभमणि को चोटें भी आई जिन्हें हर टीवी चैनल पर इस तरह दिखाया गया मानों पुलिस ने उन्हें कितनी बुरी तरह पीटा हो। इस पर वहां मौजूद दूसरे अधिकारियों ने किसी तरह बात संभाली और दोनों मीडियाकर्मियों को थाने तक ले गए। हालाँकि पुलिस वाले इस बात पर चुप्पी साधे हैं कि शलभमणि और राजन की थाने में पिटाई हुई या नहीं, लेकिन इस बात पर सभी एकमत दिखे कि पत्रकारों को बिना कोई मामला दर्ज़ किए उन्हें जाने दिया गया। बाद में क्या हुआ यह किसी से छुपा नहीं है।

अब ऐसे में ड्यूटी पर मौज़ूद पुलिस वालों का निलंबन या फिर मायावती सरकार की बर्खास्तगी की मांग कितना सही है इसका अंदाज़ा सहज़ ही लगाया जा सकता है। सवाल ये भी उठता है कि क्या किसी के पत्रकार होने भर से उसे किसी स्त्री से अभद्रता से पेश होने का लाइसेंस मिल जाता है?

शलभमणि और उनके साथियों के उद्दंड स्वभाव की चर्चा लखनऊ के मीडीया जगत और सत्ता के गलियारों में भी है। बताया जाता है कि पिछले साल फरवरी में उन्होंने प्रदेश सरकार के एक कैबिनेट मंत्री से ही मारपीट कर ली थी। उस वक्त भी कुछ तथाकथित पत्रकारों ने अपनी ‘एकता’ प्रदर्शित कर मामले को रफ़ा-दफ़ा किया था। अब देखना यह है कि क्या बीईए के जांचकर्ता ‘अपनी ही कम्युनिटी’ के ऐसे बिगड़ैलों के खिलाफ कोई कठोर रिपोर्ट पेश कर पाएंगे?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.