/व्हाइट ही नहीं, ब्लैक मनी भी कमाते हैं निर्मल बाबा: STING OPERATION का VIDEO देखें

व्हाइट ही नहीं, ब्लैक मनी भी कमाते हैं निर्मल बाबा: STING OPERATION का VIDEO देखें

पहले से ही किरपा बेचने के आरोपों से घिरे निर्मल बाबा पर अब एक और नया आरोप लगा है। यह आरोप है समागम में जाने के लिए टिकटों को ब्लैक में बेचने का। आरोप लगाया है इंडिया टीवी ने और आधार है स्टिंग ऑपरेशन। अपने रिपोर्टर के स्टिंग ऑपरेशन में चैनल ने दिखाया है कि दिल्ली में हाल ही में हुए निर्मल बाबा के समागम के लिए टिकटों की कालाबाजारी हुई है जो बाबा के संस्थान के लोगों ने ही किया है। स्टिंग में बाबा के दरबार में चढ़ रहे कैश की भी तस्वीर दिखाई गई है।

चैनल के अनुसार भक्तों से ब्लैक मे बेचा जाने वाला ये टिकट वही है जो दो हजार रुपये देकर रजिस्‍ट्रेशन कराने पर मिलता है। ग़ौरतलब है कि निर्मल बाबा बार-बार कह चुके हैं कि इसके अलावा समागम के नाम पर कोई पैसा नहीं लिया जाता है, लेकिन चैनल ने उनके इस दावे को झुठला दिया है। ‘इंडिया टीवी’ ने स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया है कि निर्मल दरबार के लिए टिकट पांच हजार रुपये में बिका। खास बात यह है कि निर्मल बाबा के वेबसाइट पर समागम के लिए अगले 6 महीने तक की बुकिंग क्लोज्ड बताई जाती है। निर्मल बाबा के आधिकारिक वेबसाइट पर यह सूचना दी जाती है कि समागम के लिए रजिस्‍ट्रेशन बंद हो गया है। इसके बावजूद रिपोर्टर आसानी से ब्‍लैक में टिकट लेकर बाबा के दरबार में दाखिल हो गया।

इंडिया टीवी ने यह भी राजफाश किया है कि समागम के दौरान भारी तादाद में भक्त निर्मल बाबा को चढ़ावा चढ़ाते हैं। जबकि बाबा कहते रहे हैं कि दरबार सिर्फ बैंक के जरिए ही भक्तों से पैसा लेता है और एक-एक रुपए पर टैक्स चुकाया जाता है। इंडिया टीवी के स्टिंग ऑपरेशन में निर्मल बाबा के बॉडीगार्डों को नोटों से भरे बैग के साथ भी दिखाया गया। चैनल ने दिखाया है कि इस बैग में बाबा को समागम में मिले चढ़ावा का पैसा है।

अब तक मीडिया पर दिखते और उसके पत्रकारों से बचते रहे निर्मल बाबा के सामने कई ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जिनका जवाब देना शायद मुश्किल होगा। वैसे ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि इंडिया टीवी भी बाबा का विज्ञापन धड़ल्ले से चला रहा है और पिछले हफ्ते इस तमाशे से बढ़ी टीआरपी बटोरने में पिछड़ गया था।

यूट्यूब पर अपलोडेड ये वीडियो यहां भी देखा जा सकता है।

http://youtu.be/3DOk0Mrcobg

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.