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चिंतामणि की चिंता और निर्मल बाबा की किरपा

By   /  April 24, 2012  /  1 Comment

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-भारत शर्मा-

यहां दो चरित्र हैं, पहला इस देश की हकीकत है, दूसरा सपने बेचने वाला सौदागर। चिंतामणि (परिवर्तित नाम) छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित आदिवासी इलाके बस्तर की रहने वाली एक नाबालिग युवती है, जिसे पहले विकास के नाम पर उसकी ही जमीन से बेदखल किया गया, फिर जिस्म की मंडी में बेच दिया गया। दूसरी तरफ निर्मल बाबा जैसे लोग हैं, जो चिंतामणि जैसी युवतियों को यह समझाने की कोशिश करते हैं, कि गुलाब का फूल सूंघने से किरपा आना शुरु हो जाएगी। चिंतामणि की चिंता किसी को नहीं है, नीति निर्धारकों को तो पहले से ही नहीं थी, मीडिया को भी नहीं है। संपादकों ने अपने हिसाब से कुछ शब्द गढ़ लिए हैं। अगर किसी रिक्शे वाले की मौत बस की चपेट में आने से हो जाए, तो उसके पीछे किसी भी दारुण कहानी क्यों ना हो? खबर डाउन मार्केट होती है, संपादकों की भाषा में उसे कोई देखना पसंद नहीं करता।

अगर बीएमडब्ल्यू वाला किसी रिक्शे को टक्कर मार दे, जिसमें किसी को खरोंच तक नहीं आई हो, तो यह अप मार्केट खबर है, इसे पूरी दुनिया देखना चाहती है। इसी लिए चिंतामणि डाउन मार्केट खबर है और बाबा अप मार्केट। हालांकि निर्मल बाबा चैनलों का समय खरीद कर बड़े आदमी बने हैं, वे उस वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जिसका इस्तेमाल पूंजीपति जनता को बेवकूफ बनाने के लिए करता है। धर्म हमेशा से लोगों को मानसिक गुलाम बनाए रखने का साधन था, जिसका प्रयोग ग्लोबलाईजेशन के बाद बाजार बड़ी शिद्दत से कर रहा है। चिंतामणि उन्हीं लोगों में से है, जिन्हें यह बताने की कोशिश की जाती है, कि उसकी बदहाली का कारण पूर्व जन्म के संस्कार हैं। अब जो कमा रहे हो, उसका भी दसवंद दे जाओ, तो किरपा आना शुरु हो जाएगी।

चिंतामणि का जीवन उन टाटा के विकास के सपने की भेंट चढ़ गया, जो इस देश के उन 8200 परिवारों में से एक हैं, जिनके पास देश की 70 फीसदी संपत्ति है, फिर भी इनके विस्तार की भूख खत्म नहीं हुई है। देश के तमाम कानून इनके सामने आकर बौने हो जाते हैं। बस्तर नक्सलियों का गढ़ माना जाता है, जो सशस्त्र क्रांति के बल पर साम्यवाद लाना चाहते हैं। चिंतामणि इन साम्यवादियों की भी पोल खोलती है, जो पुलिस में काम कर रहे आदिवासी जवानों की हत्या तो वर्ग के नाम पर करते हैं, पर जो आदिवासियों के असली शोषक हैं, उनसे चंदा वसूली करते हैं।

दरअसल निर्मल बाबा जनता को असली मुद्दों से दूर करने की कोशिश भर हैं। पूंजीवाद यह प्रयोग लगातार करता है। बाबाओं की कई प्रजातियां विकसित की गई हैं, जब पुराना प्रोडक्ट स्वयं पूजीपति बन जाता है, तो नया परोसा जाता है, नए रुप में। पहले कथा वाचक बाबा लोगों को भगवान की लीलाएं सुनाकर उनके दुख दूर करते थे, फिर रामदेव बाबा आए, जो योग कराने लगे। अब दही बड़ा खिला कर किरपा दिलाने वाले निर्मल बाबा आ गए। बात आसाराम बापू की करें या रामदेव की। सभी का टर्न ओवर करोड़ों का है, स्वयं निर्मल बाबा के अनुसार उनका टर्न ओवर की 268 करोड़ रुपए था। रामदेव बाबा तो बाकायदा रिटेल में भी अपनी किस्मत अजमा रहे हैं।

तो असल किरपा किस पर आ रही है, जनता पर या बाबाओं पर। चिंतामणि उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका उपयोग पहले उसे लूटने के लिए किया जाता है, फिर मनोरंजन के लिए। सरकार इस वर्ग की रोज चिंता करती है, पर करती कुछ नहीं। रोज नई योजनाएं बनाई जाती हैं, पर लागू नहीं की जाती। तमाम स्वयं सेवी कई प्रोजेक्ट इन लोगों के विकास के लिए चला रहे हैं। रोज दिल्ली में सेमीनार आयोजित किए जाते हैं। रोज नेता भाषण दे रहे हैं, संसद का सत्रों का बीहिष्कार किया जा रहा है। इस वर्ग की तकलीफ जानने के लिए रोज लाखों रुपए किराए में खर्च किए जा रहे हैं, पर किरपा है, कि आने का नाम ही नहीं ले रही। और जिस संघर्ष से किरपा आ सकती है, उसे निर्मल बाबा जैसे लोग रोके बैठे हैं।

अब जबकि पूंजीवाद का चेहरा पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो रहा है, केवल भारत जैसा ही देश हो सकता है, जहां के लोग 10 के नोटों की गड्डी तिजोरी में रखकर धन्ना सेठ बनने की सोच सकते हैं। पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी चल रही है। दुनिया भर के लोग आर्थिक नीतियों के खिलाफ लामबंद होकर पूंजीपतियों को दी जाने वाली छूट पर सरकारों से सवाल कर रहे हैं। ऐसे दौर में जबकि केन्द्र में बैठी मनमोहन सरकार अमरीका और वहां के पूंजीपतियों की आर्थिक बदहाली दूर करने की कसम खाकर बैठी है, हम भारतवासी चमत्कारों की उम्मीद में जिंदा हैं। चिंतामणि सवाल लिए खड़ी है, और निर्मल बाबा सपने लिए, तय हमें करना है, कि किधर जाना है।

(खरीखबर.कॉम)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Andh-viswas aur dharm me jo antar hota hai use nastik log nahi samajh sakte hai. Nirmal baba ek saksh ka naam hai har koi nirmal baba nahi hai, to e man-na hi padega ki unme kuchh to special hai jo dusro me nahi hai, kyoki itni bheed ikatthi karna har ek ke bas ki baat nahi. Bas jo special he wahi krapa hai jo sab me nahi hoti. Wo kisi ko bulate nahi hai log jate hai, to isme thagne ki baat kaha hai? Gayatri pariwar ka ek slogan hai- 'Hum sudhrege jag sudhrega'. Nirmal baba ko chhod apne aap ko dekho.

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