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लाश, मोमबत्ती और राजनीति: सिर्फ दाना संगमा को ही कानून से ऊपर क्यों मानते हैं मुख्यमंत्री?

By   /  May 3, 2012  /  3 Comments

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-शिवनाथ झा ||
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एक्ट 1956 की धारा 3 के तहत परीक्षार्थियों द्वारा परीक्षा कक्ष में मोबाईल फ़ोन या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाना “गैर-क़ानूनी” माना गया है और अगर परीक्षार्थी ऐसा करते हैं तो उनके विरुद्ध आवश्यक कारर्वाई करने का अधिकार सभी शैक्षणिक संस्थाओं को प्रदत है.

दाना सिल्वा एम. संगमा

मेघालय के मुख्य मंत्री श्री मुकुल संगमा की सम्बन्धी दाना सिल्वा एम. संगमा नियमतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एक्ट 1956 की धारा 3के ऊपर नहीं जा सकती और इसी नियम के तहत आती हैं, चाहे भले ही उन्होंने परीक्षा-कक्ष में इस अपराध में पकड़े जाने के बाद आत्महत्या ही क्यों ना कर ली हों!  देश के सभी छात्र-छात्राएं और जन-मानस उनकी इस नादानी पर क्षुब्ध है, सभी की सांत्वना इस घड़ी में उनके परिवार-जनों के साथ है.
लेकिन, दाना की मृत्यु के पश्च्यात जो “राजनीति” प्रारंभ हुई है वह सम्पूर्ण देश में शैक्षणिक वातावरण को, विशेषकर उत्तर-पूर्वी राज्यों से प्रवासित छात्र-छात्राओं के मन को विषाक्त करने का एक प्रयास है, जो गलत है. दोषी को सजा मिले, नियम भी यही कहता है. लेकिन दोषी कौन है या फिर किन हालातों के कारण दाना संगमा को यह्कदम उठाना पड़ा, अन्वेषणकर्ता तह तक पहुँचने के कगार पर आ गए हैं.
दाना संगमा अमिटी विश्वविद्यालय के मानेसर (हरयाणा) स्थित संस्थान में एम.बी.ए. (प्रथम वर्ष) की छात्रा थी और अपने सेकेण्ड सेमेस्टर की परीक्षा (मार्केटिंग एंड रिसर्च) देने गई थी. परीक्षा आवादी के दौरान परीक्षक ने उनके पास से मोबाइल फ़ोन बरामद किया. यह भी बताया जाता है कि वे एक घंटे की अवधि में एक प्रश्न का भी जबाब नहीं लिख पायीं जबकि वे एक बार परीक्षा कक्ष से बाहर भी गयी थी. वैसे, मुख्य मंत्री ने इस बात को भी कुबूल किया की परीक्षा प्रारंभ होने के आधे घंटे बाद दाना ने अपने परिजनों से बात की है, लेकिन नियमतः क्या यह सही है कि “परीक्षा के दौरान बाहर निकलकर अपने परिजनों से बात की जाए?”
मोबाइल फ़ोन मिलने के पश्चात परीक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका ले ली और उन्हें परीक्षा कक्ष से बाहर जाने को कहा और उसी दिन (24 अप्रैल) को दाना संगमा ने आत्म हत्या कर ली. दुर्भाग्य वश, पिछले दिनों मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया कि भारत के अन्य राज्यों में, विशेषकर दिल्ली स्थित शैक्षणिक संस्थाओं में पूर्वोत्तर राज्यों के छात्र-छात्राओं के साथ भेद-भाव होता है और दाना एस. संगमा द्वारा की गयी आत्म-हत्या एक जीता जागता उदहारण है.

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सुनकर आश्चर्य हुआ. सन 1974 से अब तक (1974 में मेघालय को असम से अलग किया गया था) यह पहली घटना है जब राज्य के मुख्य मंत्री ने दिल्ली में एक पत्रकार सम्मलेन कर ऐसी बात कही. पिछले 38 सालों में पूर्वोत्तर राज्यों से असंख्य छात्र-छात्राओं ने दिल्ली या अन्य राज्यों में आकर शिक्षा प्राप्त की हैं, अव्वल आये हैं. लेकिन किसी ने सरकार या अन्य निजी संस्थाओं द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं की तारीफ नहीं की. अकस्मात् क्या हुआ की मुकुल संगमा इतने तीखे तेवर में आ गए. क्या सिर्फ इसलिए कि दाना संगमा उनकी सम्बन्धी थी?

अन्वेषण कर्ता मूलरूप से तीन मुख्य परिस्थितियों पर जांच-पड़ताल कर रहे हैं:
एक – क्या दाना संगमा की शैक्षणिक क्षमता एम.बी.ए. के लायक थी या घर वालों के दवाब में इस विषय को चुना था?
दो – घटना के पूर्व सात दिनों में, विशेषकर अंतिम तीन दिनों में, अपने मोबाइल से किन-किन नंबरों पर बात की? जानकारी के अनुसार कुछ चार नंबर ऐसे हैं जिसपर 40 से अधिक घंटे लगातार बात-चीत की गयी हैं.
तीन – परीक्षा कक्ष में बैठकर भी दाना ने परीक्षा नियम को तोड़ते हुए फेसबुक पर 10:39 मिनट में क्या पोस्ट किया था. दाना का अकाउंट बंद कर दिया गया है.
बहरहाल, अन्वेषण से ज्ञात होता है कि दिवंगत दाना फेसबुक की सदस्या भी थी और परीक्षा प्रारंभ होने के 39 मिनट बाद, यानि 10:39 बजे, फेसबुक पर एक पोस्ट भी की हैं. फेसबुक से दाना का अकाउंट समाप्त कर दिया गया है जबकि अन्वेषणकर्ता दाना द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किये गए सभी पोस्टिंग का विवरण प्राप्त करने में लगे हैं.
दाना के कमरे से एक ऐसा पोस्टर (डोंट गिव-अप) पुलिस को मिला है जो दाना की मानसिक दशा की ओर अन्वेषण को प्रेरित किया है. अन्वेषण कर्ता का मानना है कि 24 अप्रैल से पूर्व लगातार तीन रातों तक दाना ने लगातार अपने मोबाइल फ़ोन से कुछ  नंबरों पर बात की है जो दिल्ली के अतिरिक्त मेघालय और नागालैंड के भी हैं. जाँचकर्ताओं ने  मोबाइल ओपेरटर से भी विस्तृत बातों की जानकारी मांगी है.
मुकुल संगमा ने स्वयं कहा था कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में होने वाले सभी छात्र यूनियन के चुनाव में उत्तर-पूर्वी राज्यों के छात्र-छात्राओं को किसी एक पार्टी विशेष की ओर रुझान लाने के लिए कैम्पेन भी करते हैं. लेकिन संभवतः मेघालय ही नहीं, देश की शैक्षणिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन, जो छात्र-छात्राओं की मनोदशा के अनुकूल हों, के लिए कभी सरकारी स्तर पर कैम्पेन किये हों.

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अन्वेषण कर्ता ने यह भी जाँच की है कि दाना परीक्षा कक्ष में पर्यवेक्षक द्वारा प्रस्तुत उपस्थिति पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने में “तारीख” लिखने में दो बार गलती की है. जाँचकर्ता का कहना है की “संभवतः मानसिक रूप से परेशान होने के वजह से मृतक २४ अप्रील के वजाय दो बार अपनी हस्ताक्षर के बाद २३ अप्रील लिखा है.”

आज दाना संगमा की मृत्यु हुई तो सरकार हरकत में आ गयी लेकिन इनकी आत्महत्या से नौ दिन पहले बंगलोर स्थिर आचार्य यन.आर.वी स्कूल ऑफ़ अर्चितेक्चार में रिचर्ड लोइतम की मृत्यु एक “विवादस्पद स्थिति” में पिछले १५ अप्रील को हुई, किसी ने पूछा तक नहीं. एक ओर जहाँ पुलिस मानती है कि रिचर्ड की मृत्यु गहरी चोट के कारण हुई, जबकि संस्थान के अधिकारीयों का कहना है की उसकी मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में गहरी चोट के कारण हुई. जबकि, पोस्ट मार्टम रिपोर्ट मानता है की उसे मार-मार कर मार दिया गया.
दाना संगमा की मृत्यु के चार दिन बाद उत्तर-पूर्वी राज्य के ही एक दूसरे छात्र समितन सेठिया ने अपने को गले में फांसी लगाकर पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली. यहाँ भी पुलिस मानती है कि उसने परीक्षा के दवाव के कारण आत्म हत्या कर ली. सेठिया दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात हिन्दू कोलेज का छात्र था. यहाँ भी पुलिस मानती है की उसने परीक्षा के दवाव के कारण आत्म हत्या कर ली. दुर्भाग्य यह है कि आज तक मेघालय के मुख्यमंत्री इस के आत्म हत्या पर एक शब्द भी नहीं बोले. क्या इसलिए कि वह मुख्यमंत्री का सम्बन्धी नहीं था
एमिटी के अधिकारियोंका कहना है, “चूँकि विषय जांच के अधीन है इसलिए अभी इस पर कोई टीका-टिपण्णी नहीं की जा सकती  है. इस विषयमे हमें अब तक जो कहना था वह हमने  बता  दिया है. आगे जांचकर्मियों  की जो भी पूछ -ताछ  होगी  हम  सभी उपलब्ध कराएँगे .”
बहरहाल, दाना सिल्वा ऍम. संगमा नहीं रहीं. रिचर्ड लोइतम भी नहीं रहे. समितान सेठिया  भी नहीं रहे. इन छात्र-छात्राओं ने ख़ुदकुशी की. इनकी मृत्यु पर लोगों को, यहाँ तक कि मेघालय के मुख्य मंत्री श्री मुकुल संगमा को भी पश्चाताप नहीं  है, परन्तु इं
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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Vijay says:

    Hindi speaking student’s arrogance has crossed all limits. Even teachers thinks themselves at par wd prime minister. Anybody wd a real or campus or facebook support of 20 people has the instinct of becoming a rogue. Their adamance, arrogance, idiosyncracies are ‘new virtue n empowerment’ ratified by IDEOLOGY. Even soft spoken unaffiliated people from their own state are despised, ridiculed and booed away. They don’t spare weak people,soft target n girls from Der area even. To be a unettiquetted ruffian in Hindi belt is great. Big universities have contributed a lot in making them so…. These instances will be repeated more in coming time. U can’t stop that…. OMG …

  2. Sushila Puri says:

    ''बहरहाल, दाना सिल्वा ऍम. संगमा नहीं रहीं. रिचर्ड लोइतम भी नहीं रहे. समितान सेठिया भी नहीं रहे. इन छात्र-छात्राओं ने ख़ुदकुशी की. इनकी मृत्यु पर लोगों को, यहाँ तक कि मेघालय के मुख्य मंत्री श्री मुकुल संगमा को भी पश्चाताप नहीं है '' …..( मुझे तो 'सापाम ' याद आ रहा है ! )

  3. Uday Prakash says:

    I request you to not to defend those who could be 'accused' for 'abatement to 'suicide' under section 309 IPC. Secondly, this is true that students coming from North Eastern states are facing with discriminatory treatments by the administrators in any University found in Delhi, the capital city. Thirdly, kindly see the 'rape records and data' in the capital, related to NE girls. It's more than perturbing and horrifying. Fourthly, it's advisable to any journalist to get the 'people's version' or civil version than exlcusively depending on what is being fed by the officials of the Govt. Hope, you take my dissent in fair manner.

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