/फर्ज़ी गनर आदेश मामले में ललित भारद्वाज के खिलाफ़ जांच के आदेश गायब?

फर्ज़ी गनर आदेश मामले में ललित भारद्वाज के खिलाफ़ जांच के आदेश गायब?

  • क्या पत्रकारों को पकड़ाया था प्रशासन ने झुनझुना? 
  • साल भर बाद मीडिया दरबार में खुला राज़!

यह दास्तान है एक ऐसे पत्रकार की जो खुलेआम मचा रहा है अंधेरगर्दी और जेब मे रख कर घूम रहा है राजनीति, पुलिस और प्रशासन को। उसने मचाया उत्पात थाने में, अधिकारियों के दफ्तरों पर और खुलेआम धूल झोंका सूबे के पुलिस महकमे के मुखिया की आंखों में, लेकिन आज तक कोई भी न कर पाया उसका बाल भी बांका। उसकी पहुंच इतनी ऊंची है कि डीआईजी के आदेश और प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देश के बावज़ूद उसके खिलाफ कोई मामला तक नहीं दर्ज़ हो पाया। ये शख्स कोई और नहीं बल्कि खुद को पत्रकार और राजनेता बताने वाला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सबसे शातिर दिमाग जालसाज़ ललित भारद्वाज है।

वैसे तो इस शख्स पर पत्रकारिता से लेकर राजनीति तक को बदनाम करने के कई आरोप लग चुके हैं, लेकिन सबसे पहले चर्चा उस किस्से की जो अभी तक मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए पहेली बना हुआ है। पिछले साल मेरठ रेंज के डीआईजी अखिल कुमार को राज्य के उप सचिव मदन किशोर श्रीवास्तव का 20 अप्रैल को जारी एक आदेश मिला जिसमें शास्त्री नगर के ललित भारद्वाज को सुरक्षा गार्ड यानि गनर प्रदान करने की अनुशंसा की की गई थी। सारी कानूनी औपचारिकताओं के बाद ललित को 1 मई से एक सरकारी गनर दे दिया गया।
यहां तक तो सब कुछ ठीक रहा, लेकिन अखिल कुमार को इस आदेश पर कुछ शक़ हो गया। उन्होंने आदेश का पालन तो करवा दिया लेकिन एलआईयू से उसकी जांच भी करवा दी, क्योंकि नियमों के मुताबिक जिला स्तर से जांच और संस्तुति के बिना इस तरह के आदेश जारी नहीं किए जाते। पता चला कि उप सचिव का आदेश फर्ज़ी था। यह जानकारी आते ही हंगामा मच गया। पुलिस ने अपना गनर तो वापस ले लिया, लेकिन शायद दबाव वश ललित को गिरफ्तार नहीं किया गया। डीआई जी ने पूरे मामले की प्रशासन से सीबी यानि क्राइम ब्रांच की सीआईडी शाखा से जांच करवाने की सिफारिश भी कर दी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर छोटे अखबार में यह खबर हेडलाइन बन गई।
इस वारदात के करीब साल भर बाद जब पत्रकारों ने सीबी सीआईडी से जांच की तरक्की की जानकारी मांगी तो उन्हें बताया गया कि मेरठ में सीबी सीआईडी के उच्च अधिकारी का पद खाली पड़ा है इसलिए ललित की फाइल की जांच सीधे लखनऊ स्थित अतिरिक्त अधीक्षक के कार्यालय से हो रही है। लेकिन जब मीडिया दरबार ने मामले की पड़ताल की तो बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अरविंद सेन के मुताबिक सीबी सीआईडी कार्यालय में इस फर्ज़ीवाड़े की जांच की फाइल है ही नहीं।

पुलिस के इस जवाब से कई सवाल उठ खड़े होते हैं

  • पहला सवाल यह है कि क्या ललित भारद्वाज के खिलाफ सीबी सीआईडी की जांच का आदेश कभी जारी ही नहीं हुआ था..?
  • सवाल यह भी है कि अगर डीआईजी की संस्तुति को भी दरकिनार किया गया तो इसके पीछे क्या वजह रही होगी?
  • और अगर आदेश जारी नहीं हुआ तो इसकी घोषणा क्यों की गई? क्या उस वक्त प्रशासन ने किसी तरह अपना पल्ला छुड़ाया था?
  • क्या उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन पर ऐसा करने के लिए कोई दबाव था?
  • और अगर यह मान लिया जाए कि सारे अधिकारी दबाव मुक्त थे और उन्होंने इस जालसाज़ के खिलाफ़ जांच के आदेश दिए भी थे तो आज वह आदेश कहां गायब हो गया?

इन सवालों का जवाब ढूंढने से पहले आइए डालते हैं ललित भारद्वाज की ‘बहुमुखी’ शख्शियत पर एक नज़र। मेरठ विश्वविद्यालय के कर्मचारी के पुत्र ललित ने अपना करीयर एक नामी चैनल के रिपोर्टर के शोहदे के तौर पर शुरु किया था। बाद में इसने किसी तरह नलिनी सिंह के कार्यक्रम आंखों-देखी में एंट्री बना ली। उसने आंखों-देखी के नाम पर मेरठ में एक फर्ज़ी मीडिया इंस्टीट्यूट भी शुरु कर दिया जहां कुछ दिन तक बीस-बीस हजार रुपए लेकर रिपोर्टर बनाने का खेल भी चला, लेकिन जब दिल्ली खबर पहुंची तो इसे फौरन गुडबाय कह दिया गया।
कहते हैं ललित बड़े लोगों को ‘खुश’ करने और उसी दम पर डराने तथा अपना काम करवाने का माहिर है। आंखों-देखी के एक पत्रकार के मित्र टोटल टीवी के एक उच्च अधिकारी थे जो रंगीन तबीयत के थे। उस अधिकारी की इस कमजोरी को अपना हथियार बना कर उसने मेरठ की स्ट्रिंगरशिप हासिल कर ली और उन्हें ‘खुश’ करना शुरु कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख बन बैठा। (अभी भी वह खुद को कई जगह इसी हैसियत से पेश करता है)।

बाद में उसने दिल्ली के एक मुस्लिम कांग्रेसी नेता को भी ‘खुश’ कर जिला स्तर पर मीडिया प्रभारी का पद ले लिया। इसके बाद तो मानों वह छोटा-मोटा मंत्री बन गया। हूटर वाली गाड़ी, बॉडीगार्ड और उत्पाती स्वभाव.. इस पर लालकुर्ती थाने में हंगामा करने का मुकद्दमा तो दर्ज़ है ही, अभी हाल ही मे एक गुमनाम शख्स ने इसकी अवैध हूटर वाली गाड़ी की शिकायत मेरठपुलिस के फेसबुक पर कर दी.. इसके बाद से वह गाड़ी कहीं नजर नहीं आती.. शिकायत करने वालों का कहना है कि करीब आठ-दस वर्षों से पुलिस, प्रशासन और आम आदमी सबको परेशान कर रखा है। अगर इससे कोई खुश है तो वे हैं अपराधी, भू-माफ़िया और दलाल, क्योकि इन्हें इसका खुलेआम संरक्षण प्राप्त है।

और अब फाइल गायब करने के इस ताज़ा प्रकरण ने ललित भारद्वाज की पहुंच और उसके तिकड़म का लोहा पत्रकारों और नेताओं दोनों से मनवा लिया है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.