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आत्म-हत्या, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था: किसको सुनाएँ हाले दिल Suicide: Part-4

By   /  May 9, 2012  /  5 Comments

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आज भी खाकी वर्दी, काला कोट और कचहरी की दीवारों को देखते ही लोगों की सांसें फूलने लगती हैं, रक्त-चाप बढ़ जाता है, पैंसठ सालों में भी लोगों का विश्वास क्यों नहीं जीत पाई ये संस्थाएं?

भारत के गाँवों में एक कहावत बहुत ही प्रसिद्द है और शहरी बाबू भी इस कहावत को जरुर मानेंगे, चाहे अंतर्मन से ही सही: बुजुर्ग कहते हैं: “सोया हुआ आदमी जग सकता है, संस्थान को जगा सकता है, हिला सकता है, उसमें जान भी फूंक सकता है; लेकिन जगा हुआ आदमी कैसे जागेगा, वह तो जागना ही नहीं चाहता, और अगर जागता भी है तो ‘किसी के इशारे पर’. क्योंकिं देश स्वतंत्र हों गया है और वे सभी इस बात को अपने जेहन में बसा लिए है की “सैयां भेल कोतवाल अब डर काहे का !”

कारण: इन सभी संस्थाओं में कार्य करने वाले लोगों का अस्तित्व “इन सैंयाँ” के कारण भी है, चाहे वो लोक सभा में बैठते हों, या विधान सभा में या पुलिस मुख्यालयों में बैठते हों या इन संस्थाओं को चलाने वाले कार्पोरेट जगत के महानुभाव हों. यही सत्य है.

हम अपने बारे में पहले सोचते हैं. समाज और राष्ट्र के बारे में बाद में. हम यह जान-बूझ कर भूल जाते हैं या भूलने की कोशिश करते है की समाज और राष्ट्र की भलाई के पश्चायत भारत का एक-एक नागरिक उसका हिस्सेदार होगा और हम भी उसी आवाम का एक हिस्सा हैं. इसे हम अपनी “जिम्मेदारी” भी कह सकते हैं. समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी “प्रतिवद्धता” भी कह सकते हैं. लेकिन कितने लोग हैं ऐसे ? सरकार या कानून से हरेक समस्याओं का समाधान नहीं हों सकता है. जो कानूनन गलत है, वह एक व्यक्ति के नजर में पहले गलत है. हम सभी समाज के एक ऐसे अलिखित सामाजिक कानून से बंधे हैं जिसके कारण ही हमारी सोच “जानवरों” से अलग है. लेकिन, क्या सच में हम ऐसे हैं? अगर ऐसे होते तो भारतीय अदालतों में 30 मिलियन से अधिक मुक़दमे, जिसमे आत्म-हत्या के भी मुक़दमे हैं, “बेजान” पड़े नहीं होते!

आप माने या नहीं, लेकिन यह सच है कि भारत का 123 करोड़ आवाम, चाहे वह जम्मू के वादियों में रहता हों, या कन्या-कुमारी के समुद्री इलाकों में, बिहार के भगवान महावीर के जन्मस्थान में रहता हों या भगवान शिव के त्रिशुल पर स्थित उत्तर प्रदेश के बनारस में, या फिर उत्तराखंड के देव-नगरी हरिद्वार में, आज भी खाकी वर्दी, कला कोट और कचहरी के सदियों से नहीं चढ़ने वाले बेरंग दीवारों को देखते ही उनकी सांसें वेवजह फूलने लगतीं हैं, रक्त चाप बढ़ जाता हैं. क्यों नहीं जीत पाए ये लोग और ये संस्थाएं भारतीयों का विस्वास? जबकि इन संस्थाओं को चलाने वाले भी तो भारतीय ही हैं?

यदि देखा जाये तो भारत में प्रशाशन और न्यायिक व्यवस्था स्वतंत्रता के पैंसठ साल बाद भी “अंग्रेजी हुकूमत वाली मानसिकता” से बाहर नहीं निकल पाई है चाहे वादी और प्रतिवादी के पक्ष और विपक्ष की बातों को कितना भी वैज्ञानिक तरीकों से कंप्यूटर-कृत कर क्यों ना प्रस्तुत किया जाय. आज भी भारत के लोग अपने ही देश के खाकी वर्दी धारी, जो भारतीय हैं, को देखकर चंद पल के लिए अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इन कपड़ों को पहनने वालों के द्वारा “निहत्थे भारतीयों” पर किये जाने वाले प्रहार को स्मरण करने लगते हैं. आज भारत का कोई भी व्यक्ति “निहत्था” नहीं हैं, कानून की मोटी-मोटी पुस्तकें हमारे पास भी है, हम भी उसका सहारा लेकर न्यायालयों में, पुलीस स्टेशनों में अपनी बात कह सकते हैं, लेकिन कह नहीं पाते. क्योकि देश स्वतंत्र होने के बाद भी लोगों की मानसिकता में वैसा स्वतंत्र विचार नहीं आ पाया जो स्वतंत्र भारत में इन संस्थानों में कार्य करने वाले लोगों से अपेक्षा थी. क्यों नहीं विस्वास होता है लोगों को पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर? यह एक बहुत बड़ा “बहस का विषय है”, लेकिन दुर्भाग्य यह है की पैसठ सालों में भी हम इस मसले को सुलझा नहीं पाए. भारतीय आवाम में “पुलिस और न्यायिक व्यवस्था” के प्रति विश्वास जगाने की बात तो दूर रही.

“अंग्रेजी हुकूमत वाली मानसिकता” या “क्लारिकल मानसिकता” से हमारा सीधा तात्पर्य भारतीय न्यायिक व्यवस्था में चाहे वह पश्चिम बंगाल के मिद्निपुर जिले में स्थित जिला न्यायालय हों, या उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद स्थित उच्च न्यायालय या फिर दिल्ली के तिलक मार्ग पर स्थित सर्वोच्च न्यायालय – पिछले वर्ष जून माह तक भारत के विभिन्न राज्यों में स्थित जिला न्यायालय से उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक, कुल 30 मिलियन से अधिक मुक़दमे लंबित हैं. किसी ज़माने में लाल कपड़ों में इन मुकदमों के कागजातों को लपेटा गया था, इस उम्मीद से की मजिस्ट्रेट साहेब और जज साहेब की निगाहें जल्द ही पड़ेगी इन दस्तावेजों पर, जल्द न्याय भी मिलेगा. लेकिन दिन बीते, सप्ताह बीते, माह बीते, वर्ष बीते और सदियाँ भी बीत गयी, कपड़ों का लाल रंग भी उनके किश्मत की तरह काले हों गए – लेकिन दस्तावेज नहीं खुले,

शासन, प्रशासन, सरकार और न्यायिक व्यवस्था के आरोप-प्रत्यारोप को पढ़ते, सुनते, देखते, न्याय की उम्मीदें अपने सीने में संजोये लाखों लोग, कचहरी का चक्कर लगाते-लगाते इश्वर के दरबार में अपनी हाजरी लगा दी, लेकिन शाशन और व्यवस्था आज भी बहुत गहरी नींद में सोयी है. कल उठेगी या नहीं, पता नहीं?

जहाँ तक पुलिस व्यवस्था का सवाल है, इस बात से स्वयं इस व्यवस्था से जुड़े लोग भी इस बात को झुठला नहीं सकते कि कैसी होती है उनकी “क्रिया-प्रणाली”?, कैसे चलते हैं उनके कार्य? कैसे होती हैं अपराधों का तहकीकात? कैसे लिखी जाती है प्रथम सूचना रिपोर्ट? कैसे बदला जाता है दस्तावेज? किस-किस के दवाव सहने पड़ते हैं नीचे के अधिकारियों को जिनके कलम की एक बूंद स्याही से लोगों का जीवन सुधरता भी है और समाप्त भी हो जाता है? ये बातें वे भी जानते हैं, भारतीय कानून व्यवस्था भी जानती है और जानते हैं इस समाज के तथा-कथित ठेकेदार और राजनेता. लेकिन इन तीनो जगहों पर एक आम नागरिक की पहुँच नहीं है, इसलिए वह पिसती आ रही है, और आगे भी पिसती रहेगी .

यह मैं ही नहीं, भारत भर के सभी उच्च न्यायालयों के कई न्यायाधीशों ने, यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों ने भी दुहराए हैं कि कानून की नजर में सभी नागरिक एक है, चाहे वह कोई हों, किसी पद पर आसीन हों? लेकिन क्या भारतीय कानून और पुलिस व्यवस्था ऐसी है? किसी भी मुक़दमे का स्वरुप, खोज-बिन किसी मंत्री या ऊँचे पद पर आसीन व्यक्ति या उनके करीबी जानकर के इशारे पर कैसे बदलते हैं, कानून और पुलिस के तेवर, यह सर्वविदित है. नहीं तो आज भारत के न्यायिक भवनों में 30 लाख से अधिक मुक़दमे लंबित नहीं होते, लोग तंग आकर आत्म-हत्याएं भी नहीं करते.

अभी भष्टाचार के विरोध में चल रहे देश-व्यापी आन्दोलन के एक मुख्य कार्य-कर्ता प्रशांत भूषण, जिनके पिता शांति भूषण, जो भुत-पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री के पद पर भी कार्य कर चुके हैं, का एक मायने में कहना बिलकुल सत्य है. उनके अनुसार, “भारत के आवाम की पहुँच भारतीय न्यायिक व्यवस्था तक नहीं है”. लेकिन, उनका यह भी कहना की “एक आम वादी, अधिवक्ता के खर्च को नहीं वहन कर सकता है” – उल्टी करने से कम नहीं है. क्यों महंगे हैं अधिवक्ता? तो क्या इसे यह माना जाये की “भारत में न्यायिक व्यवस्था सस्ते नहीं है. कौन सा मुकदमा कितना महंगा होगा, इसका निर्णय अधिवक्ता करते हैं ?”

एक पत्रकार के नाते मैं पंद्रह से अधिक वर्षों तक दिल्ली से प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र के लिए कचहरी का संवाददाता रहा और नब्बे के दशक के पूर्वार्ध से जितने भी घोटाले हुए, उन सभी घोटालों का रिपोर्टिंग की. अधिवक्ताओं को ऑटो से कचहरी भी आते देखा, मारुति से भी और पैदल भी. लेकिन समय के साथ साथ जैसे-जैसे घोटालों के मुक़दमे समय की गर्त में दबते गए, वैसे वैसे इन अधिवक्ताओं के जीवन का रहन-सहन, वेश-भूषा, चलने का अंदाज, गाड़ियों के बदलने की परंपरा और बदलते तेवरों को भी देखा. प्रशांत भूषण भी इन बातों से अलग नहीं हैं. क्यों ना बिना सरकारी सहयोग से आम-वादियों के लिए ये अधिवक्ता “सस्ते” होते हैं?

वरिष्ट अधिवक्ता और सर्वोच्च् न्यायालय बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव अशोक अरोरा कहते हैं सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था की तरह, भारतीय न्यायिक व्यवस्था भी भ्रष्टाचार से ग्रसित है. लेकिन, साथ ही, यह भी कहते हैं की न्यायिक व्यवस्था में कार्य करने वाले लोग भी तो समाज के लोग ही हैं. अगर एक अधिवक्ता का फ़ीस दस साल पहले यदि 1000 रूपए थी और आज दो लाख रुपये हो गयी है, तो कहीं ना कही तो व्यवस्था में कोई ना कोई कमजोरी है जो एक आम वादी और न्याय के बीच के फासले को बढाती जा रही है. न्यायिक व्यवस्था में कार्यरत व्यक्ति, चाहे जज हों, मजिस्ट्रेट हों या कोर्ट बाबू, उनकी तनख्वाह में उतनी बढ़ोत्तरी नहीं हुयी जो होनी चाहिए. आखिर उनके बच्चों को भी अपेक्षाएं हैं अपने माता-पिता से, क्या करेंगे ये लोग भी?

बहरहाल, मिट्टी की घरा कब तक पानी की काट को बचा पायेगी. प्रकृति का नियम है – पानी जब लोहे और स्टील से बने उपकरणों में जंग लगाकर, सड़ाकर उसके अस्तित्व को समाप्त कर देती है अपनी बहाव के लिए – तो मानव निर्मित इन समस्याओं का समाधान भी होगा ही, कोई काट होगा ही? भारत के लोगों का विस्वास के साथ “श्राप” और उनका “रुदन” का असर होगा तो जरुर – वह श्रापित वज्र गिड़ेगा तो जरुर, सिर्फ समय का खेल है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. AAP KA YE MEDIA DARBAAR KOI JAATIGAT YA KHULE SHABDON MEIN KAHEIN TO ST/SC KA PLATEFORM HAI KYA? PEHALI NAJAR MEIN TO YAHI DIKHTA HAI.

  2. Harish Arya says:

    nyayik sudhar sashakt rashtr ka adhaar.

  3. apne samaykal mein aapko ek bahut bada nirnay lena hoga , aapko jindagi aur adalat mein se kisi ek ko chun na padega, ya to jurm sahte sahte apnee zinadgi bita lijiye aur jurm sahne ke aadee ho jaaiye , ya phir adalat ke chakkar kaat te kaat te apnee umra bita lijiye aur poore jiwan bhar mein 1-2 case ka positive result dekh kar swargvasi ho jaaiye.

  4. galat aap bhee karte rahein, galat hum bhee karte rahen, jab tak aapki aur humari soch nahie badlegi , Anna Hazare kuchh nahie ukhar sakte hain, bhale hi meri bhasha galat lage, lekin doosron ke bharoshe prayas karne waalon ko yahee baatein samajh aatee hain.

  5. jha sahab, ant main ek hee baat samajh main aati hai – swayam niyantran. pelhe apne ko aage badhane kee hod, phir parivar ko aagee badhane kee hod. kuch naya kar naam kmane kaa chaska, bahoot sare sukho ko bhogne ka lalach, phir unko dusron se bacha ke rakhne ka swarth – aao sab shanti se jeene ke pryas ko aage badhyen.

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