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कभी नाम था अब बदनामी है.. मीडिया ने तब भी सुर्खियों मे रखा और अब भी

By   /  May 11, 2012  /  2 Comments

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1981 में अखबारों और प्रतियोगी पत्रिकाओं के पहले पन्ने पर प्रदीप शुक्ला छाए थे। वजह थी भारतीय प्रशासनिक सेवा में टॉप करना। तब युवा उनके जैसा बनने के सपने देखते थे। अब ठीक 31 साल बाद एक बार फिर वही प्रदीप शुक्ला अखबारों और टीवी चैनलों में सुर्खियों में हैं, पर वजह ऐसी है कि शायद ही उन जैसा कोई बनना चाहता होगा। अपने स्वर्णित अतीत का ऐसा विद्रूप वर्तमान खुद शुक्ला ने भी नहीं सोचा होगा।

एनएचआरएम घोटाले में बतौर मुख्य आरोपी गिरफ्तारी होने के बाद फिलहाल वह सीबीआई की हिरासत में हैं। हरदोई के रहने वाले प्रदीप शुक्ला भौतिक विज्ञान में एमएससी हैं। प्रथम श्रेणी में फिजिक्स, सांख्यकी और गणित में बीएएसी करने वाले प्रदीप भौतिकी और गणित में हमेशा तेज रहे। गणित उनका प्रिय विषय रहा पर लेकिन सीबीआई से बचने की ‘गणित’ में वह फेल हो गए।

बतौर आईएएस टॉपर प्रदीप शुक्ला का नाम आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सम्मान केसाथ लिया जाता है। स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक हमेशा अव्वल रहने वाले प्रदीप शुक्ला के सहपाठी रहे प्रो. असीम मुखर्जी बीते दिनों को याद करके कहते हैं कि सेंट जोसफ में सीनियर कैम्ब्रिज परीक्षा में अव्वल रहे हैं। बारहवीं की परीक्षा भी उन्होंने जीआईसी से अव्वल रहते हुए पास की थी। बीएससी-एमएससी की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी करने वाले प्रदीप ने एमएससी भौतिकी से टॉप किया था।

अमरनाथ झा छात्रावास में रह चुके प्रदीप को 1981 में आईएएस में पहली रैंक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ही छात्र अनुज विश्नोई को दूसरी रैंक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ही कपिल देव त्रिपाठी को इसी वर्ष आईएएस में सफलता मिली थी। 1981 इलाहाबाद के प्रतियोगियों के लिए आज भी रोमांचित करता है।

प्रदीप शुक्ल के पिता डॉ. पीडी शुक्ल कमला नेहरू अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट थे। वह अस्पताल परिसर में ही रहते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के केपीयूसी छात्रावास के बगल में इनका पैतृक आवास है। यहां उनके भाई राजीव शुक्ल रहते हैं। साल भर पहले अपने पिता डॉ.पीडी शुक्ल के निधन पर प्रदीप अपनी आईएएस पत्नी आराधना शुक्ला के साथ आए थे। उनकी पत्नी आराधना मध्य प्रदेश केपूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण और विद्याचरण शुक्ल के परिवार से जुड़ी हैं। (अमर उजाला)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. top kiye bina bhi bhartachari bana ja sakta hai itni mehnat kaouin ki yar

  2. vikas choudhary says:

    कहना गलत नही होगा की आज देश की इतनी दुर्दशा है की आज भ्रष्टाचारी ही युवाओं के रोल मॉडल बन गए हैं !!!!!!

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