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प्रदीप शुक्ला ही क्यों, यूपी में और भी हैं दर्जनों मगरमच्छ… लेकिन पकड़ेगा कौन?

By   /  May 12, 2012  /  1 Comment

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-संजय शर्मा-

ये वो कार्रवाई थी जो एक साल पहले हो जानी चाहिए थी। यूपी के आईएएस अफसर प्रदीप शुक्ला को गुमान था कि उनके आधा दर्जन आईएएस रिश्तेदार, प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात उनके आईएएस संबंधी और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल की नातेदारी के चलते सीबीआई अफसर उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यह बात हकीकत भी लग रही थी क्योंकि तमाम लोगों की राष्ट्रीय स्वाथ्य मिशन में गिरफ्तारी के बावजूद एक साल से प्रदीप शुक्ला पर हाथ डालने की हिम्मत कोई नही जुटा पा रहा था। प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद कई बड़े लोगों के भी इस घोटाले में फंसने की उम्मीद बढ़ गयी है। यह बात दीगर है कि यूपी में प्रदीप शुक्ला की तरह अभी भी दर्जनों ऐसे आईएएस अफसर मौजूद हैं जिनकी भ्रष्टाचार की गाथायें सबको मालूम हैं मगर उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा।

दरअसल प्रदीप शुक्ला ने सारा ताना-बाना बहुत दिमाग से बुना था। सभी लोग जानते हैं कि प्रदीप शुक्ला अपने बैच के टॉपर हैं लिहाजा बुद्धि की उनके पास कोई कमी नहीं। मगर इस बुद्धि को कुबुद्धि में बदलने में प्रदीप शुक्ला ने कोई देरी नहीं लगाई। अपने हुनर के चलते वह पहले मुलायम दरबार के सबसे प्रमुख कारिंदे हुआ करते थे और बाद में मायावती के भी सबसे करीबी लोगों में उनका नाम शुमार किया जाने लगा।

पिछली सरकार में प्रदीप शुक्ला प्रमुख सचिव स्वास्थ्य थे। प्रदेश की स्वास्थ्य की सभी योजनाओं की जिम्मेदारी उनकी ही थी मगर इस जिम्मेदारी को सही ढंग से निभाने की जगह वह भ्रष्टाचार के खेल में शामिल हो गये। दरअसल माया सरकार में सब कुछ ‘मायामय’ हो गया था। चाहे अफसर हों या नेता सभी के सामने एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाये जा सकें। स्वास्थ्य विभाग पैसे की ऐसी ही मशीन बनकर रह गया था जहां पर पैसा और सिर्फ पैसा कमाना ही उद्देश्य बन गया था। इस पैसे से अफसरों और नेताओं के महल बन रहे थे। यह बात दीगर है कि यह महल गरीबों की लाश पर खड़े हो रहे थे।

इस खेल की पहली शुरुआत तब हुई जब स्वास्थ्य विभाग को दो हिस्सों में बांट दिया गया। परिवार कल्याण के नाम से बनाया गया महकमा दरअसल परिवार कल्याण न होकर सिर्फ अफसरों और नेताओं के कल्याण के काम आने लगा। इस योजना में धन केन्द्र सरकार से आता है और यह धन बेहद गरीब और जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दिया जाता है। इसी धन से अंधता निवारण कार्यक्रम और जननी सुरक्षा योजना जैसे कार्यक्रम चलते हैं। इसी योजना से गांवों में गरीब, बेसहारा लोगों के इलाज के लिए दवाई से लेकर चश्मे तक बांटे जाते हैं और गर्भवती महिलाओं को उनके इलाज के लिए पैसा दिया जाता है, साथ ही इलाज के लिए आपरेशन थियेटर और चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण भी खरीदे जाते हैं।

मगर प्रदीप शुक्ला और बाबूसिंह कुशवाहा की जोड़ी ने भ्रष्टाचार की नई-नई गाथाएं लिख दीं। फर्जी कंपनियों को हजारो करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान कर दिये गये और यह पैसा अफसरों और नेताओं ने आपस में बांट लिया। इसी बंदरबांट में जिस सीएमओ ने इसका विरोध करना चाहा उसकी हत्या कर दी गयी। यह भ्रष्टाचार कभी नहीं खुलता अगर डाक्टरों की इस तरह हत्या नहीं होती। यह मामला तूल तब पकड़ा जब लखनऊ के दो सीएमओ की हत्या में आरोपी बनाये गये डिप्टी सीएम सचान की जेल में हत्या कर दी गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने सीबीआई के जांच के आदेश कर दिये।

इस जांच के आदेश के बाद सभी को लग रहा था कि बाबू सिंह कुशवाहा, अंनत मिश्रा अंटू और प्रदीप शुक्ला का जेल जाना तय है। प्रदीप शुक्ला को शुरुआती दौर में कई बार पूछताछ के लिए बुलवाया भी गया। मगर इसके बाद प्रदीप शुक्ला ने अपने संबंधों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। सूत्रों का कहना है कि प्रदीप शुक्ला के एक संबंधी प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात हैं और वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। उन्होंने इस मामले को रफा दफा करवाने में खासी रुचि दिखाई। इसके अलावा प्रदीप शुक्ला के आधा दर्जन रिश्तेदार भी आईएएस हैं। उनकी पत्नी आराधना शुक्ला लखनऊ की जिलाधिकारी रह चुकी हैं और अखिलेश सरकार में पिछले एक महीने से उनके पैरोकार दिन रात एक कर रहे हैं कि उन्हें लखनऊ का मंडलायुक्त बना दिया जाय।

कांग्रेस के बड़े नेता विद्याचरण शुक्ला भी प्रदीप शुक्ला की रिश्तेदारी में आते है और उन्होंने भी प्रदीप शुक्ला को बचाने के लिए खासी पैरवी की ऐसा माना जाता है। यह प्रभाव सबके सामने देखने को भी आ गया। पिछले एक साल से सीबीआई प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी नहीं कर सकी जबकि तमाम छोटे अफसर और डाक्टर सीबीआई ने हिरासत में ले लिये। एक पीसीएस अफसर अभय बाजपेई की बेटी ने तो सार्वजनिक रूप से आरोप भी लगाया कि प्रदीप शुक्ला को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा रहा। अप्रत्याशित रूप से इलेक्ट्रानिक चैनलों ने भी पिछले कई महीनों से इस बात को नही उठाया कि प्रदीप शुक्ला गिरफ्तार क्यों नही किये जा रहे हैं।

मगर पिछले दिनों समाजसेवी नूतन ठाकुर और अधिवक्ता प्रिंस लेनिन ने हाईकोर्ट में सीबीआई के उपर आरोप लगाया कि वह प्रभावशाली लोगों को बचा रही है। नूतन ठाकुर ने तो प्रदीप शुक्ला के खिलाफ छपे कई विवरणों को भी उच्च न्यायालय के समक्ष रखा। सीबीआई को जब लगा कि उच्च न्यायालय अब खुद इस केस की मानीटरिंग शुरू करने वाला है तो उसके पास इस बात के अलावा कोई चारा नहीं बचा था कि वह प्रदीप शुक्ला को गिरफ्तार करे। अब सबका मानना है कि यह गिरफ्तारी भी औपचारिकता भरी होगी और प्रदीप शुक्ला के खिलाफ आरोप पत्र ऐसा तय किया जायेगा जिससे उनकी जमानत जल्दी हो सके और भविष्य में उन पर आरोपों का निर्धारण न हो सके।

यूपी सरकार भी इस बदनाम अफसर पर कम मेहरबान नही रही। पिछली सरकार ने आईएएस प्रोमिला शंकर को इसलिए निलंबित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने सरकार से बिना अनुमति लिये विदेश यात्रा की थी। जबकि प्रदीप शुक्ला ने बिना अनुमति लिये दर्जनों विदेश यात्रायें कर डाली। कई महीनों से इसकी जानकारी सरकार को है साथ ही प्रवर्तन निदेशालय को शक है कि प्रदीप शुक्ला ने विदेशों में भी बड़ा पैसा जमा किया है। उसकी जांच भी लंबित है मगर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद आज तक प्रदीप शुक्ला को निलंबित नही किया गया।

प्रदीप शुक्ला ही नहीं प्रदेश में दर्जनों आईएएस अफसर ऐसे हैं जिन पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले लंबित हैं मगर उनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई नही हो पायी। सीबीआई ने नेहरू युवा केन्द्र के जिला समन्यवयक डीके सिंह को गिरफ्तार किया था। डीके सिंह की संस्तुति पर सैकडों करोड़ के ठेके दिये गये थे। लखनऊ का बच्चा बच्चा जानता है कि डीके सिंह आईएएस अफसर नवनीत सहगल के सबसे करीबी थे। डीके सिंह ने पूछताछ में सीबीआई को नवनीत सहगल की जायदाद के विषय में बड़ी जानकारी दी थी मगर लगता है सीबीआई की लिस्ट से आईएएस अफसर दूर ही रहते हैं। इसके अलावा भी अगर सीबीआई उन पर कार्रवाई करने की अनुमति प्रदेश सरकार से मांगती है तो यह अनुमति नहीं दी जाती। मतलब साफ है कि आप हजारों करोड़ के घोटाले करो या इन घोटालों के कारण लोगों की हत्यायें हो जाएं। अगर आप आईएएस अफसर हैं तो सीबीआई आप पर हाथ डालने से पहले हजार बार सोचेगी।

(लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. ashok says:

    ऊपर से ही यह एक व्यवस्था निधारित है , इसमे न अटने वालो को नकार दिया जाता है, जाँच ऊपर से ही होनी चाहिये

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