/इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा: “साले मद्रासी फिर जीत गए”

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा: “साले मद्रासी फिर जीत गए”

चेन्नई सुपरकिंग की कल की जीत जितनी रोमांचक रही उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण थी राजस्थान रॉयल्स पर फतह. चेन्नई टीम की इस जीत ने राजस्थान के इरादो पर तो पानी फेरा ही था, उसके कई फैन्स को भी निराश कर दिया. फेसबुक पर हो रही एक चर्चा के मुताबिक अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस ‘दुख’ को अलग ही अंदाज में बयां किया- चेन्नई की टीम को गरियाते हुए वो भी हिंदी में. अखबार की वेबसाइट पर लिखा है-“साले मद्रासी फिर जीत गए” (saale-madrasi-phir-jeet-gaye.)

आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि इंडियन एक्सप्रेस जैसा अंग्रेजी अखबार इतनी घटिया हिंदी भला क्यों लिखेगा? लेकिन यह उलटबांसी हुई है. इस अखबार की वेबसाइट पर चेन्नई सुपर किंग्स के हाथों राजस्थान रायल्स की हार की जो खबर अंग्रेजी में लगी है, उस खबर को ढोने वाला कंधा यानि यूआरएल यानि इंडियनएक्सप्रेस.कॉम के बाद जो कुछ कड़ियां आती हैं, उसमें अंग्रेजी में यही गाली लिखी है.

इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से यह सब जानबूझ कर किया गया है या किसी इंप्लाई ने बदमाशी की है, यह तो नहीं पता चला लेकिन फेसबुक पर इस मसले पर चर्चा शुरू हो गई है.

इस ब्लंडर की तरफ सबसे पहले ध्यान दिलाया द हिंदू अखबार के प्रिंसिपल न्यूज फोटोग्राफर अखिलेश कुमार ने. अखिलेश द्वारा ध्यान आकर्षित किए जाने के बाद बनारस के छात्र नेता रहे और वर्तमान में जनपक्षधर राजनीति के सक्रिय स्तंभ अफलातून देसाई ने इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणी लिखकर बाकी लोगों को इस बारे में बताया. अफलातून ने फेसबुक पर लिखा- ”इंडियन एक्सप्रेस में चेन्नै सुपर किंग्स के हाथों राजस्थान रॉयल्स की हार की खबर की URL पर गौर कीजिए! मारवाडी गोयन्का का मुख्यालय चेन्नै था। क्या,यह रामनाथ गोयन्का की परम्परा है? क्या उन्हें यह बेहूदा URL कबूल होता?” (साभारः Akhilesh Kumar) http://www.indianexpress.com/news/saale-madrasi-phir-jeet-gaye/947835/

देखें इंडियनएक्सप्रेस.कॉम वेबसाइट का स्क्रीन शॉट, जिसके यूआरएल में भद्दी गाली अब भी दर्ज है.

 

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.