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मीडिया और सरकार के सरोकार में सामंजस्य नहीं बिठा पाई है कांग्रेस -एम जे अकबर

By   /  May 13, 2012  /  1 Comment

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कुछ अतिकथनी तो हमारा वंशानुगत लक्षण होती है, हमारे डी.एन.ए. का अभिन्न अंग होती है लेकिन कुछ ऐसी होती है जो किसी घटना को प्रत्यक्ष देखने पर सहसा ही हमारी आंखों में झलकने लगती है. ऐसी ही अतिकथनी की बदौलत मीडिया ऐसे आग उगलने वाले ड्रैगन की सूरत हासिल कर लेता है जो दंतकथाओं से सीधे छलांग लगाकर हमारे आधुनिक ड्राइंगरुमों में आ टपकता है, जहां इसका शिकार लाचारगी से कांप रहा होता है.

आह! लेकिन, मीडिया केवल किसी कोने में खड़ी बिल्ली के समान है. आत्ममुग्ध और पत्रकार लोग कलम के पालतू होते हैं. लेकिन इसका एक फायदा है. बिल्ली अपनी आंखे खोले रखती है और घर की निजी जिंदगी में होने वाले झगड़ों को भी रिकॉर्ड करती रहती है. इस बिल्ली की निगाह आप पर हमेशा बनी रहती है. हालांकि, इसे नैतिक नहीं कहा जा सकता, लेकिन तब यह सिर्फ एक मामूली बिल्ली ही है. यह न तो पर्शियन बिल्ली है, न ही गली में म्याऊं -म्याऊं करने वाली.

हालांकि, यह दोनों में बदल सकती है और यह इस पर निर्भर करता है कि वह किस अवतार को स्वीकार करती है. कभी-कभी यह संस्था की चोट या लालच में भ्रष्ट हो जाती है. दूसरे समय में यह आंख दिखाती है और अचानक गुर्राने और लड़ाई का रास्ता अख्तियार कर लेती है, खासकर तब जब उसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है.

प्रिंट में इसे सर्कुलेशन और टेलीविजन में टीआरपी के तौर पर जाना जाता है. कभी यह बिल्ली समाचार हुआ करती थी, जो बेडरूम में मध्यरात्रि को पहुंचने की आदी थी. अब इसने एंटीना का विकास कर लिया है. इसके पास अब ओबी वैन है. यह लंबे समय तक चौकस रहती है. खराब दिन में भी यह बिल्ली चूहे को पकड़ लेती है. इसके पास नौ जिंदगियां हैं. जो राजनेता इस बिल्ली को खत्म करने की कोशिश करते है, वे इस बात को भूल जाते हैं.

उत्तेजित व्यवहार के लिए कुछ तर्कसंगत जवाब जरूर होना चाहिए. राजनेताओं के बारे में कुछ तबकों के प्रतिकूल नजरिये के उलट कुछ मामलों में वे अच्छे होते हैं. फिर क्यों सत्ता पर काबिज राजनेता मीडिया को परेशान करने के प्रति आकर्षित हो जाते हैं, या वैसे मूर्खतापूर्ण तरीकों से सेंसरशिप की कोशिश करते हैं जो तत्काल लोगों को दिखने लगता है? संभवत: उनके फैसले का सीधा संबंध सत्ता से होता है.
अब लोकतंत्र में हर विजेता यह जानता है कि हार कुछ समय की बात है. लगातार जीतने का समय पिछली सदी में था. जब तक खराब वक्त की संभावना दूर दिखायी देती है, शक्तिशाली भले ही आत्मसंतुष्ट न रहें, शांत रहते हैं.

जब संभावना, संभाव्य में बदलने लगती है, अच्छे फैसले भी लुप्त होने शुरू हो जाते हैं. मिजाज नाजुक हो जाता है. सत्ता की चमक-दमक के बाहर की जिंदगी की संभावना मंत्रियों को उत्तेजित और मुख्यमंत्री को सनकी बना देती है. आंध्र प्रदेश में साक्षी मीडिया घराने के बैंक खाते फ्रीज करने के अपरिपक्व फैसले के पीछे क्या दूसरे तर्क दिए जा सकते हैं? क्या यह फैसला इस उम्मीद में लिया गया कि इससे साक्षी की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक संपत्ति धराशायी हो जायेगी? हैदराबाद की कांग्रेस सरकार गंभीर बीमारी से ग्रस्त है.

पार्टी तेलंगाना और जगनमोहन रेड्डी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बिखर रही है. कांग्रेस यह स्वीकारने में हिचक रही है कि दोनों समस्याएं उसकी ही देन हैं. तेलंगाना की मांग 60 के दशक से उठती-डूबती रही है. विडंबना है कि कांग्रेस ने ही इस भावनात्मक मुद्दे पर नियंत्रण पाया, जब उसे वाई एस राजशेखर रेड्डी जैसा मुख्यमंत्री मिला.

रेड्डी ने आर्थिक विकास को गांवों की तरफ मोड़ दिया और लोगों को यह संदेश दिया कि बेहतर भविष्य अब उनकी पहुंच से दूर नहीं है. विधानसभा और 2009 आम चुनावों के परिणाम इसके सबूत हैं. उनकी अचानक मौत से पार्टी सदमे में पहुंच गयी. स्थानीय और केंद्रीय नेतृत्व, दोनों ने माकूल स्थिति को हाथ से जाने दिया.

गृहमंत्री पी चिदंबरम के गैर जिम्मेदाराना बयान से मृतप्राय तेलंगाना आंदोलन भड़क उठा और आज ऐसा लगता है कि इसका समाधान सिर्फ अलग राज्य ही है. सबसे खराब रहा कांग्रेस का जगन को पार्टी से बाहर करना और रेड्डी के स्वामित्व वाली साक्षी पर राज्य की शक्ति का प्रयोग उसे परेशान करने के लिए करना.

इसका तत्काल कारण है- उपचुनाव, जो वहां सरकार बचाने के लिए बेहद जरूरी है. कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले लोगों ने सलाह दी कि सेंसरशिप दो कारणों से काम नहीं कर सकता. सरकार की सोच से अधिक मीडिया पलटवार करता है. यह खराब भी है, क्योंकि व्यापक धारणा बनाने के लिए वह खराब खबरों को ही प्रचारित करता है.

अगर आप कुछ छुपाना चाहते हैं तो यह सचमुच भयानक अवश्य होगा. महक, बदबू में बदल जाती है. मीडिया के लिए बेहतर नुस्खा है कि उसे अकेला छोड़ दें. कुछ राजनेता कभी-कभार इसे दाना-पानी देने का का लालच नहीं छोड़ पाते. यह खुराक अगर केवल सूचना है तो नुकसान नहीं बल्कि अच्छा है. सरकार का भविष्य मीडिया तय नहीं करता. सरकारें हत्या से नहीं, हमेशा आत्महत्या से समाप्त होती हैं.

(कभी कांग्रेस के लोकसभा सांसद रहे पत्रकार एम.जे.अकबर  इंडिया टुडे के  एडिटोरियल डायरेक्टर हैं और उनका ये आलेख कई समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ है।)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Pawan Arora says:

    kya baat hai janab lajawab sir ji……………

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