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सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने छुपाया सेक्‍स स्‍कैंडल में फंसे जनरल का सच?

By   /  May 15, 2012  /  No Comments

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क्या केंद्र सरकार ने भावी सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया था?

एक बड़े समाचार पत्र समूह को मिले दस्तावेजों से साफ पता चलता है कि सरकार ने न केवल सुप्रीम कोर्ट बल्कि सिंह की नियुक्ति को हरी झंडी देने वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति को भी गुमराह किया। मामला 2008 में कांगों में संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों के तहत गई भारतीय सैन्य टुकड़ी द्वारा यौन दुर्व्‍यवहार का है।

भावी सेना प्रमुख विक्रम सिंह

हाल में दायर एक जनहित याचिका में सिंह को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उनकी सेना प्रमुख की दावेदारी को चुनौती दी गई थी। इसके जवाब में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उक्त घटना के समय सिंह यूएन के पेरोल पर डिप्टी फोर्स कमांडर तथा इंटरनेशनल सिविल सर्वेंट थे, इसलिए उन्हें इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

दोहरी भूमिका में थे सिंह

लेकिन यूएन की इंटरनल ओवरसाइट सर्विस (ओआईओएस) की जांच रिपोर्ट कुछ और ही कहती है। ओआईओएस यूएन के बैनर तले होने वाली किसी भी चूक की जांच करने के लिए जिम्मेदार एजेंसी है। इसे कांगो में नार्थ किवू ब्रिगेड की सहायक भारतीय सैन्य टुकड़ी द्वारा कथित तौर पर किए गए यौन दुव्र्यवहार की शिकायतें मिली थीं। डीएनए/भास्कर को मिले दस्तावेजों के मुताबिक घटना के समय ले. जनरल सिंह दोहरी भूमिका में थे। यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट को नहीं बताया गया। सिंह उस वक्त न केवल डिप्टी फोर्स कमांडर थे, बल्कि ईस्टर्न डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) भी थे। नार्थ किवू ब्रिगेड इसी ईस्टर्न डिवीजन के तहत आती थी। इससे यह तथ्य उजागर होता है कि वह सैन्य टुकड़ी ले. जनरल सिंह के सीधे नियंत्रण में थी जिसपर यौन दुव्र्यवहार का आरोप लगा था।

16 के बजाय 39 जगह कर दी तैनाती

भारतीय सेना इस मामले में पहले ही 12 अधिकारियों और बटालियन के 39 जवानों की कोर्ट आफ इंक्वायरी के तहत जांच कर रही है। लेकिन ले. जनरल को इस जांच से बाहर रखा गया था। तत्कालीन उप सेना प्रमुख ले. जनरल मिलन नायडू के टूर नोट्स में भी बिक्रम सिंह और कांगों में उनकी अहम भूमिका का उल्लेख किया गया है। नायडू 25 मई से 29 मई 2008 तक कांगो में थे। उस वक्त नायडू ने कांगो में तीन भारतीय ठिकानों का दौरा किया था। ले. जनरल सिंह एमओएनयूसी (कांगो में विशेष मिशन) में थे। उस वक्त सिंह के मातहत 301 इन्फेंट्री ब्रिगेड के ब्रिगेडियर इंदरजीत नारायण थे। सरकार ने यौन दुव्र्यवहार तथा अनुशासनहीनता का ठीकरा ब्रिगेडियर नारायण के सिर पर फोड़ा था। वहीं नायडू के टूर नोट्स कुछ और ही कहानी बताते हैं। इस नोट में एक और अहम चूक का जिक्र है। इसके मुताबिक नार्थ किवू ब्रिगेड के तहत भारतीय टुकडिय़ों को 16 जगहों पर तैनात किया जाना था। लेकिन यूएन को बिना बताए ही भारतीय टुकडिय़ों की तैनाती 39 जगहों पर कर दी गई।

यह एक गंभीर चूक थी। क्योंकि यूएन विवादित क्षेत्रों में शांति स्थापना के लिए सैनिकों की नियुक्ति बेहद संवेदनशील तरीके से करता है। यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि उप सेना प्रमुख ने निर्देश दिए थे कि सैन्य टुकडिय़ों को तय मानकों के मुताबिक ही तैनात किया जाना चाहिए था। यह आदेश ले. जनरल सिंह, ब्रिगेडियर नारायण और आर्मी हेडक्वार्टर में एडीशनल डायरेक्टर जनरल को दिया गया था। वहीं सरकार सुप्रीम कोर्ट में केवल ब्रिगेडियर नारायण को ही सारे मामले के लिए जिम्मेदार ठहरा रही थी।

(सौजन्य भास्कर)

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  • Published: 8 years ago on May 15, 2012
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  • Last Modified: May 15, 2012 @ 10:04 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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