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अब देखिए बिड़ला टीवी, अंबानी टीवी, टाटा स्काई पर… खबरों से क्या वास्ता?

By   /  May 19, 2012  /  4 Comments

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लिविंग मीडिया में बिड़ला ग्रुप की भागीदारी की खबर है। बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी एक खबर के मुताबिक आजतक, इंडिया टुडे और कुछ अन्य मीडिया वेंचरों में बादशाहत रखने वाले लिविंग मीडिया को 27.5 फीसदी हिस्से के बदले साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए मिलेंगे। इसके साथ ही मीडिया जगत में अब यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि जब बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने चैनलों और अखबारों को अपने चंगुल में लेते जा रहे हैं तो आम आदमी की खबरें कहां छपेंगी? जाहिर सी बात है कि कॉरपोरेट घरानों के आ जाने से खबरों पर भी उनका नियंत्रण हो जाएगा और सरोकारों पर भी।

अभी कुछ ही दिन बीते थे, जब नेटवर्क-18 में अंबानी ने भारी निवेश किया था। वैसे भी नेटवर्क-18 के दो कारोबारी चैनल और उनकी रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का सीधा वास्ता कॉरपोरेट घरानों से ही रहा है। सरकार की नीतियों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर जनता को लूटने और करोड़ों-अरबों का मुनाफ़ा कमाने के लिए बदनाम इन कॉरपोरेट घरानों को पहले इकलौता डर रहता था मीडिया का, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस चौथे स्तंभ पर भी चांदी का मुलम्मा चढ़ाने का काम जारी है। हर बड़ा घराना एक बड़े मीडिया हाउस में निवेश करने में जुटा है।

किसी से छिपा नहीं है कि भ्रामक विज्ञापनों के जरिए उत्पाद बेचकर जनता की जेबें ढीली करने का काम यही लोग करते हैं. नेताओं और नौकरशाहों के साथ सांठगांठ करके औने पौने दामों में जमीनों, कंपनियों व संपत्तियों को हथियाने का काम यही लोग करते हैं. कहने का मतलब यह कि अंबानी, बिड़ला जैसों ने अगर मीडिया में कब्जा जमाना शुरू कर दिया है तो फिर तय है कि मीडिया में असली कही जाने वाली पत्रकारिता बचेगी ही नहीं।

झोला छाप पत्रकारिता की तो विदाई कभी की हो चुकी थी। अब जो लोग शाहरुख खान, विजय माल्या, मल्लिका शेहरावत और नाग-नागिन के बीच इक्का-दुक्का सरोकारी खबरों को देक लेते थे उनकी भी छुट्टी तय है। पी साईंनाथ, उमा सुधीर, रवीश कुमार जैसे पत्रकारों (अगर इन्होंने अपना चोला न बदला तो) की रिपोर्टें अब पत्रकारिता के सरकारी कॉलेजों में ही पढ़ाई के कोर्स में आउटडेटेड सिलेबस की तरह रखी दिखेंगी। खुशबू और फलक की कहानियां तभी असाइन की जाएंगी जब वे मैक्स, फोर्टिस या अपोलो अस्पताल के पीआरओ के रेफरेंस से आएं।

किसानों की जमीनें मायावती के चहेते बिल्डर हड़पें या अखिलेश के, किसी को कोई वास्ता नहीं रह जाएगा। बताया जा रहा है कि अरुण पुरी को इस ताज़ा सौदे में अपने मीडिया हाउस के एक चौथाई हिस्से के बदले साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए बिड़ला घराने की तरफ से मिल जाएंगे। माना जा रहा है कि ये छोटी सी रकम तो बिड़ला साहब एक ही ऐसी डील में वसूल कर लेंगे जिसकी खबर न आए। उधर बदले में शायद लिविंग मीडिया के खुद को पत्रकार मानने वाले मीडियाकर्मियों को कुछ ज्यादा सहूलियतें मिल जाएं। है ना विन-विन डील..?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Kammod Pushpendra Singh says:

    badalte dor me media ko yeh sab jarori hai.
    isse media karmieon ki maali haalat me kuchh to sudhaar aayega hi.

  2. मीडिया भी अब कॉरपोरेट वाले ही चलाएंगे इसमें कोई शक नहीं कुरता -पजामा और चप्पल पहन कर पत्रकारिता करने वाले पत्रकार अब नहीं रहे अब हाई टेक पत्रकारों का ज़माना आ गया है.

  3. Ambani T.V. reliance ki hi badayee dikhayegee aur emply ka shoshan karegee…

  4. Shivnath Jha says:

    मर्सडीज, बी.ऍम.डब्लू में घुमने वाला और फार्म हाउस में रहने वाला कभी पत्रकार नहीं हों सकता. वह पत्रकार को नौकर के रूप में रखता है

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