/पी-7 ही नहीं, GNN भी है चोरबाज़ारी में शामिल, सवालों के घेरे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय…

पी-7 ही नहीं, GNN भी है चोरबाज़ारी में शामिल, सवालों के घेरे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय…

पी-7 चैनल को चलाने वाली कंपनी पर्ल्स ग्रुप के खिलाफ इकोनॉमिक टाइम्स और स्टार न्यूज़ ने जो मुहिम छेड़ी वह किस अंजाम तक पहुंचेगी यह तो वक्त तय करेगा, लेकिन इतना जरूर है कि इस प्रकरण से सूचना और प्रसारण मंत्रालय के लचर नियमों की पोल खुल गई है। सरकार ने जिस कंपनी को सेबी के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोपी माना हुआ है और जिसके खिलाफ कई अदालतों में आर्थिक अपराध के मामले चल रहे हों उसके पास न्यूज चैनल चलाने का लाइसेंस कैसे आ गया, यह सवाल खासा उलझाने वाला है।

GNN News चैनल का लोगो

खास बात यह है कि पर्ल्स ग्रुप इकलौता ऐसा ग्रुप नहीं है जो अपने फर्ज़ीवाड़े को फैलाने व कंपनी की स्कीमें प्रचारित करने के लिए न्यूज़ चैनल लेकर आया है। एक और कंपनी है जो पर्ल्स के ही नक्शे कदम पर चल रही है और बाजार से चेन प्रणाली के जरिए पैसा उगाह रही है। कंपनी है– जीएन ग्रुप। जीएन लैंड डेवलपर्स और जीएन फायनैंस जैसी आधा दर्ज़न कंपनियों को शामिल किए इस ग्रुप ने भी जीएनएन के नाम से एक समाचार चैनल का लाइसेंस हासिल कर लिया है और इसे शुरु भी कर दिया।

इस ग्रुप की दो प्रमुख वेबसाइटें हैं। www.gngroup.in  तथा www.gnnnews.tv । इन दोनों में इनके अलग-अलग व्यवसायों की जानकारी दी गई है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि किसी भी वेबसाइट में मालिकों या निदेशकों का कोई ब्यौरा नहीं है। सिर्फ डेयरी के बारे में लिखते वक्त एक बार एसएस रंधावा का जिक्र हुआ है तथा न्यूज की एक वेबसाइट में प्रोमो फिल्म में वे दर्शकों को प्रणाम करते नजर आते हैं, वह भी बिना किसी परिचय के।  इस ग्रुप की एक और कंपनी जीएन गोल्ड ( www.gngold.net )भी है, जिसके मालिक तो जीएन ग्रुप वाले ही हैं, लेकिन उसका जिक्र पता नहीं क्यों इसकी मुख्य वेबसाइट पर नहीं है। इतना ही नहीं, जीएन ग्रुप के जनकपुरी के कीर्ति शिखर स्थित कॉर्पोरेट ऑफिस में इतना तो बताया जाता है कि जीएन गोल्ड उन्हीं की इकाई है, जिसका ऑफिस उसी इमारत में उपर वाले तल पर है, लेकिन निदेशकों के बारे में पूछने पर सभी रहस्यमय ढंग से चुप्पी साध लेते हैं। सूत्रों का कहना है कि इन कंपनियों में बड़ा हिस्सा जीएन ग्रुप के अध्यक्ष सतनाम सिंह रंधावा और देवेश बजाज़ का है।

जीएन गोल्ड का लोगो

जीएन गोल्ड कंपनी वैसे तो सोने की खरीद बिक्री में शामिल होने का दावा करती है, लेकिन इसका भी धंधा वही है जो पर्ल्स ग्रुप का है। एजेंटों का दावा है कि कंपनी पांच हजार रुपए की रकम महज़ छह वर्षों में दोगुना कर देती है। हालांकि अभी हाल में हुए मीडिया के हमले के बाद कंपनी काफी सतर्क हो गई है और नेटवर्क मार्केटिंग का प्लान वेबसाइट पर से हटा लिया गया है। जीएन गोल्ड और इसकी गतिविधियों के बारे में कुछ महीनों पहले भी मीडिया में काफी कुछ छप चुका है और यही कारण है कि कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर सबसे आगे एक डिस्क्लैमर नोटिस लगा रखा है जिसमें अपने ग्राहकों से मीडिया में छपी रिपोर्टों पर ध्यान न देने को कहा गया है।

जीएन गोल्ड का डिस्क्लेमर

गौर करने वाली बात यह भी है कि पर्ल्स ग्रुप ने तो किसी तरह जुगाड़ बिठा कर दूसरे का लाइसेंस खरीद लिया (हालांकि यह खरीद फरोख्त भी सरकारी कानून का खुला मजाक है जो एक अलग ही बहस का मुद्दा है) लेकिन जीएन ग्रुप ने तो बाकायदा आवेदन कर लाइसेंस हासिल किया है। सवाल यह उठता है कि इतनी सतर्क सूचना और प्रसारण मंत्रालय किस तरह गच्चा खा गई जो उन्हें न्यूज़ चैनल का लाइसेंस ही नहीं देती जिनके लिए आईबी या गृह मंत्रालय की सहमति न हो? सवाल यह भी है कि क्या आईबी को जीएन ग्रुप के धनोपार्जन के जरिए का पता नहीं था? या फिर उन एजेंसियों को भी मैनेज़ कर लिया गया?

चाहे सहारा हो या पर्ल्स ग्रुप, सभी ने अपनी ब्रैंडिंग और विश्वसनीयता के लिए न्यूज़ चैनलों का जम कर इस्तेमाल किया है। सेबी या दूसरी सरकारी एजेंसियां बेशक इन कंपनियों को मनी लाउंडरिंग या चेन सिस्टम से पैसे जमा करने का दोषी माने, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इन्हें वह ताक़त दे दिया है जिसके जरिए वे अपने झूठ को सच तो साबित करें ही, जब चाहें तब सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दें। शायद यही वज़ह है कि जीएन ग्रुप के चैनलों के लांच की पार्टी में केंद्रीय मंत्री स्तर के दो दो सत्ताधारी नेता मौजूद थे। मीडिया की ताक़त का तो यह एक छोटा सा नमूना भर है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.