/क्या इसी ख़बर से बौखलाकर मुकेश भारतीय को जेल भेजा झारखंड सरकार ने?

क्या इसी ख़बर से बौखलाकर मुकेश भारतीय को जेल भेजा झारखंड सरकार ने?

-मुकेश भारतीय-

राजनामा.कॉम । झारखंड सरकार का सूचना एवं जन संपर्क विभाग सरकारी राशि के महालूट का सिर्फ अड़्डा बन कर रह गया है। इसी का नतीजा है कि यह विभाग सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत भी एक आम सूचना जन साधारण को उपलब्ध नहीं कराती। शायद इसलिये कि यहां कायदा-कानून नामक कोई नैतिकता बची ही नहीं है। सच पूछिये तो कॉरपोरेट मीडिया हाउस की दलाली और सत्तासीन सरकार की थूक चटई ने इस विभाग के प्रायः पदासीन कर्मचारियों-अधिकारियों को इतना संपुष्ट कर रखा है कि उन्हें किसी की परवाह ही नहीं है।

विगत दिनांकः 20 मार्च,2012 को राजनामा.कॉम के संचालक-संपादक के रुप में मैंने एक आवेदक बन कर सूचना एवं जन संपर्क विभाग, झारखंड सरकार से जन हित में निम्न सूचनायें मांगी थीः-

1). सूचना एवं जन संपर्क विभाग,झारखंड सरकार द्वारा लाभान्वित/ सूचीबद्ध समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज़ व अन्य चैनलों तथा वेबसाइटों के नाम-पता सहित सूची ; जिन्हें विभागीय विज्ञापन निर्गत किये जाते हैं।

2). पिछले दो वर्षों के दौरान किस समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज़ व अन्य चैनलों तथा वेबसाइटों आदि को कुल कितनी राशि के विज्ञापन निर्गत किये गये हैं।

3). किसी भी प्रचार माध्यम को विज्ञापन निर्गत किये जाने की सूचना एवं जन संपर्क विभाग, झारखंड सरकार द्वारा तय नियमावली की एक साधारण प्रति।

जब उपरोक्त तीन सूचनाओं की जानकारी सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत निर्धारित 30 दिनों के भीतर कोई जानकारी नहीं दी गई तो मैंने दिनांकः 28 अप्रैल,2012 को सूचना एवं जन संपर्क विभाग, झारखंड सरकार के प्रथम अपीलीय प्राधिकार सह अपर सचिव से इसकी लिखित शिकायत की और सूचनायें उपलब्ध कराने कराने का अनुरोध किया।

तब उन्होंने मेरे इस शिकायत आवेदन पर संबंधित कोई सूचना दिलवाये बगैर दिनांकः 5 मई, 2012 को …. “आवेदन के आलोक में अपील की सुनवाई की तिथि दिनांकः10 मई, 2012 को 11:30 बजे अपना पक्ष रखने हेतु उपस्थित होने” …. की विषय वस्तु से एक पत्र भेजा। जब मैं उक्त तिथि को निर्धारित समय पर पहुंचा तो प्रथम अपीलीय पदाधिकारी सह अपर सचिव ने कहा कि आपको (मुझे) पांच दिनों के भीतर सारी सूचनायें आपके आवासीय पते पर भेज दी जायेगी। लेकिन सूचना अधिकार का यह दुर्भाग्य ही है कि मुझे इस संबंध में अब तक किसी प्रकार की कोई भी सूचना अप्राप्त है। अब मैं इस मामले को सूचना आयोग, झारखंड सरकार के पास ले जा रहा हूं और देखता हूं कि वहां क्या अंजाम होता है।

बहरहाल, अब तक इस मामले का सबसे रोचक पहलू यह है कि (जो सूचना एवं जन संपर्क विभाग में मेरे सूचना की मांग की बाबत बनी फाइल में दर्ज है और एक कर्मचारी ने उसे एक नजर देखने को गोपनीय ढंग से उपलब्ध कराया है) सूचनाओं की मेरी मांग संबंधित फाइल को झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग में दर्जनों बार इस टेबल से उस टेबल तक रोचक मगर अकर्मण्य टिप्पणियों के साथ दौड़ाया तो गया है लेकिन,उसमें किसी ने कोई सूचना सबमिट नहीं किया है। इसमें छुपे असली राज़ क्या है, इसका खुलासा तो आगे समय आने पर ही संभव है। फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि यहां सबके नीयत में खोट है और कोई भी सूचना देने के मूड में ये लोग नहीं है।

(मुकेश भारतीय ने इस खबर को अपने पोर्टल राजनामा.कॉम पर पिछले महीने प्रकाशित किया था। इस ख़बर और मुकेश द्वारा मांगी गई सूचना के कारण झारखंड सरकार पर सूचना आयोग का भी दबाव बढ़ता जा रहा था। मीडिया दरबार ने मुकेश भा्रतीय की आवाज को बुलंद करने के लिए इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.