/आखिर किस ओर जा रही है कांग्रेस…?

आखिर किस ओर जा रही है कांग्रेस…?

 

एमजे अकबर वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं। वर्तमान में वे इंडिया टुडे नामक पत्रिका के संपादक हैं।

-एमजे अकबर

कांग्रेस ने दो साल में कुछ ऐसा किया कि भाजपा पुनर्जीवित हो गई और 2004 तथा 2009 में कांग्रेस को सत्ता दिलाने में मददगार सहयोगी या तो खत्म हो गए या अलग-थलग पड़ गए। यूपीए 1 को थामे रखने वाले मुख्य स्तंभ डीएमके और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी थे, जिन्होंने गठबंधन में करीब 60 सीटों का योगदान दिया था। दोनों बिखर चुके हैं।

कांग्रेस तर्क दे सकती है और देती है कि डीएमके और आरजेडी, दोनों अपने लालच व राजनीतिक पापों का फल भुगत रहे हैं। लेकिन ऐसे तर्क सिर्फ ऊपरी ही होते हैं। उनके इस लालच ने कांग्रेस पार्टी को उनका समर्थन लेने से तब नहीं रोका, जब उसे लोकसभा में बहुमत की दरकार हुई। दोनों गठबंधन सहयोगी इस्तेमाल किए गए और जब हालात बदले, तो मझधार में छोड़ दिए गए।

कांग्रेस नेता, जिनमें अत्यंत ऊंचाई के लोग भी शामिल हैं, अच्छी तरह जानते थे कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा स्पेक्ट्रम आवंटन के वक्त क्या कर रहे थे। सिर्फ एक ही तथ्य पर गौर कर लें कि राजा ने उन्हें सूचित किया था, अखबारों ने पूरे विस्तार से इसे अपने मुखपृष्ठों पर छापा है। यहां तक कि वे तो 10 जनवरी 2008 को लैटर्स ऑफ इंटेंट जारी होने के बाद भी हस्तक्षेप कर सकते थे।

राजा के इरादे तो मामूली हस्तक्षेप से ही तोड़े जा सकते थे। अपने पद को कायम रखने की राजा की तीव्र उत्कंठा (जैसा कि राडिया टेपों में विस्तार से है), नवीनतम तकनीक के प्रति किसी प्यार के कारण नहीं, बल्कि ऐसी मुर्गी को लेकर थी, जो सोने के अंडे दे रही थी। डीएमके नेता जोर देकर कहते हैं कि स्पेक्ट्रम से जुड़ा निर्णय कांग्रेस से सलाह-मशविरा कर लिया गया था और उनके पास इसे साबित करने के लिए दस्तावेज भी हैं।

लालू यादव अलग-थलग किए गए, क्योंकि कांग्रेस ने सोचा कि बिहार में जिन जातिगत समीकरणों पर उनका कब्जा है, वह उसे छीन सकती है। यह एक गलत गणना थी, लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। असल राजनीति के उपासक कांग्रेस की तारीफ करते हैं, क्योंकि वह राजनीति में ज्यादा संवेदनाएं बर्बाद नहीं करती।

2004 की गर्मियों और 2009 में तस्वीरें खिंचाने के लिए कतारों में खड़े यूपीए गठबंधन सहयोगियों के हंसते-मुस्कराते चेहरों पर निगाह डालिए- चाहे वाम हों, समाजवादी मध्यमार्गी या क्षेत्रीय पार्टियां। और देखिए कि उनमें से कितने अब भी मुस्करा रहे हैं। मुलायम सिंह यादव छला हुआ महसूस करते हैं, क्योंकि वे एक बार नहीं बार-बार छले गए। मायावती उबल रही हैं और अपने गुस्से को छुपाती भी नहीं हैं। शरद पवार दलदल में फंसे हैं, उससे बाहर नहीं आना चाहते और खुद को धीमे, लेकिन निष्ठुर गर्त में गिरने से बचा पाने में सक्षम नहीं हैं। लेफ्ट अर्थहीन हो चुके हैं, हालांकि इस बदलाव के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराना पूरी तरह सही नहीं होगा।

कांग्रेस के भीतर प्रमुख स्तंभ वाई राजशेखर रेड्डी थे, जिन्होंने आंध्रप्रदेश को पार्टी के गढ़ में तब्दील कर दिया था। आंध्र के सांसदों ने लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल की रीढ़ बनाई थी। आंध्र कांग्रेस के पुनरुद्धार का आधार था। अगर चंद्रबाबू नायडू अपने प्रदेश पर पकड़ बनाए रहते, कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं होती। रेड्डी की अचानक मौत ने एक बहुत बड़ी खाली जगह पैदा की, जिस पर उनके पुत्र जगन ने अपनी विरासत होने का दावा किया।

श्रीमती सोनिया गांधी जगन की महत्वाकांक्षाओं को आसानी से समायोजित कर सकती थीं। उन्होंने नहीं किया। वे शायद ही यह तर्क दे सकती थीं कि वंशवाद दिल्ली के लिए अच्छा है, लेकिन हैदराबाद के लिए बुरा। एक दुर्घटनाजन्य मृत्यु के त्रासद और भावुक हालात में कांग्रेस ने ऐसे शख्स को बाहर कर दिया, जो पार्टी को बचा सकता था। इसके नतीजे रोजाना की सुर्खियों में नजर आते हैं। श्रीमती गांधी ने सोचा कि अभिनेता-नेता चिरंजीवी चुनावी क्षतिपूर्ति दिला देंगे और उन्हें कांग्रेस में शामिल कर लिया। उस दिन से चिरंजीवी का महत्व कतरा-कतरा घट रहा है। चिरंजीवी वह सबक सीख रहे हैं, जो हर कांग्रेसी दिल में जानता है: सिर्फ बहुत, बहुत मोटी चमड़ी ही चाकू की लगातार रगड़ में बच सकती है।

दूसरी तरफ, बीजेपी अगर पूरी तरह जगी हुई नहीं है, तो गतिशील तो प्रतीत होती है। कमल अभी पूरी तरह खिला नहीं है, लेकिन इसका मुरझाना रुक चुका है। चढ़ती कीमतों और लगातार उजागर होते भ्रष्टाचार ने मतदाता को सत्तारूढ़ गठबंधन से दूर कर दिया है। इसमें से कुछ बीजेपी की तरफ मुड़ चले हैं। कांग्रेस ने 2009 में मध्यप्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया था और अगर यह इस ट्रेंड को कायम रखती, तो प्रदेश में बीजेपी किनारे लग चुकी होती। लेकिन पिछले महीने कांग्रेस ने अपनी सबसे सुरक्षित सीटों में से एक खो दी, जो पूर्व नेता प्रतिपक्ष के पास थी।

राजस्थान में कांग्रेस ने 2009 में सूपड़ा साफ कर दिया था, लेकिन दो साल के भीतर ही यह लगता है कि क्या अगला सूपड़ा साफ बीजेपी के ब्रश से होने वाला है। न ही गुजरात में भाजपा की लंबी सत्ता के बावजूद कांग्रेस ने ज्यादा कुछ वापस पाया है। केवल पंजाब और उड़ीसा ही वे राज्य हैं, जहां कांग्रेस के पास उम्मीद के कारण हैं। यहां सत्तारूढ़ क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने की शुरुआत हो चुकी है। कांग्रेस के पास कर्नाटक में बड़ा मौका था, लेकिन वह इसका पूरा दोहन करने में नाकाम रही।

यूपीए 1 में लालू यादव और वाम अलग-अलग कारणों से कांग्रेस के साथ साझेदारी को नहीं बचा पाए। यूपीए 2 के दौरान पवार और डीएमके को प्यार की मुश्किल शर्तो के बारे में पता चला। कांग्रेस के उपग्रहों को दिल्ली के परिहासकों की ताजा सलाह साफ है: अगर आप बचे रहना चाहते हैं, तो विरोध करना सीखें। यही कारण है कि ममता बनर्जी दिल्ली से दूरी बनाए रखती हैं और बंगाल कांग्रेस के भी ज्यादा निकट नहीं जातीं।

 

(पोस्ट दैनिक भास्कर में छपे लेख पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.