/काश, कोई मेरे नाम का भी प्रस्ताव रख देता राष्ट्रपति पद के लिए…

काश, कोई मेरे नाम का भी प्रस्ताव रख देता राष्ट्रपति पद के लिए…


जब सारा देश राष्ट्रपति चुनाव पर नज़र जमाए बैठा है और हर ‘ऐरा गैरा नत्थू खैरा’ रायसीना हिल्स पर बने शानदार बंगले पर आंखे गड़ाए है, तो मैंने सोचा कि मैं भी क्यों न ट्राई मार लूं..? मेरे राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार बनने के कई ‘पॉजिटिव पॉइंट्स’ हैं। उम्मीदवारी के लिए पर्चा भरने से पहले सोचा आपलोगों की भी राय ले लूं।

मैं एक ‘ईमानदार’ कहलाने वाला पत्रकार हूं। कुछ मित्र प्यार से ये भी कह देते हैं कि मैं कुछ कमा नहीं पाया तो ईमानदार बन गया, लेकिन मैं जानता हूं कि जैसे ही मौका मिलेगा, मैं सबको बता दूंगा कि मैं भी कितना ‘होशियार’ हूं। खैर, बात अपनी उम्मीदवारी की कर रहा था।

पहले बात कर लूं मेरी आवश्यकताओं की। एक तो वेबसाइट के धंधे में कोई रेग्युलर इनकम है नहीं। किसी महीने ज्यादा कमाई हो गई तो कभी कम पर भी गुजारा करना पड़ता है। राष्ट्रपति बन जाने पर कम से कम पांच साल तो सारे सरकारी खर्चों के साथ-साथ मोटी तनख्वाह मिलेगी ही।

दूसरे, मकान मालिक का सालाना कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने को है और आप तो जानते ही हैं कि दिल्ली-एनसीआर में पत्रकारों को कौन मकान देता है। सुना है राष्ट्रपति भवन में तीन सौ कमरे हैं। मैं अभी से वादा करता हूं कि अगर उस भवन में पांच साल कब्जा जमाने को मिल गया तो अपनी जरूरत के लिए दो-तीन कमरे रख कर बाकी अपने पत्रकार बंधुओं के लिए निःशुल्क रहने के लिए खुलवा दूंगा।

तीसरी और अहम जरूरत गाड़ी की है। मेरी 94 मॉडल मारुति, जिसे मैंने सेकेंड हैंड खरीदा था, अब काफी मेंटेनेंस मांगती है। कभी टायर, तो कभी कार्बुरेटर… कम-से-कम राष्ट्रपति बन जाने के बाद पांच साल शानदार लिमोजिन में तो घूम सकूंगा। यकीन मानें दोस्तों, मुझे गाड़ी रुआब झाड़ने के लिए नहीं, दिल्ली और आस-पास में जरूरत के लिए, अपने लेखों के बकाया भुगतान वसूलने हेतु आने-जाने की
खातिर चाहिए। फ्लीट की बाकी गाड़ियों का मेरे साथ राष्ट्रपति भवन में रह रहे या दूसरे पत्रकार बंधुओं के द्वारा इस्तेमाल होने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं रहेगी।

अब एक नज़र मेरे निर्विवाद (ममोता दीदी और परनॉब दा के शब्दों में ‘नॉन कंट्रोभरसियल’) और बेदाग  चरित्र पर… पहला तो मैं कभी किसी सरकारी पद पर नहीं रहा, इसलिए किसी भी फंड के मिसयूज़ का आरोप नहीं लग सका। हालांकि मेरे कई मित्रों पर प्रोडक्शन मनी के आवंटन से लेकर स्ट्रिंगर्स की नियुक्तियों और पेमेंट के दौरान हुए 25-50 हज़ार के ‘महा-घोटालों’ का आरोप लग चुका है और इसके
कारण उनकी नौकरी भी जा चुकी है, लेकिन मैं आमतौर पर बेदाग ही रहा।

दूसरे, मैं कभी विदेश यात्रा पर करोड़ तो क्या लाख भी खर्च नहीं कर पाया। अव्वल तो मैं ज्यादा विदेश यात्रा पर गया ही नहीं, और अगर नेपाल, भूटान टाइप फॉरेन टूअर पर जाने का मौका भी मिला तो जेब में ज्यादा पैसे नहीं रहे। अगर मैं राष्ट्रपति बना तो फॉरेन टूर पर कभी अकेले नहीं जाउंगा। प्रेसीडेंट के लिए जो विशेष हवाई जहाज है उसमें अपने सभी पत्रकार मित्रों और उनके परिवार वालों को लादनेके
बाद ही उसकी उड़ान संभव हो पाएगी।

अगर मेरे स्वभाव की बात की जाए तो वो भारत के राष्ट्रपति पद की गरिमा के सर्वथा उपयुक्त बैठती है। घर में ‘क्या खरीदा जाए, क्या नहीं’ से लेकर पर्दों के रंग और कपड़े तक मेरी बीवी तय करती है। मैं ज्यादा कुछ बोलने (या करने) में भरोसा नहीं करता। मैं अपने पर्सनल लाइफ में हमेशा ‘डि-जुरे’ मुखिया ही बनता रहा हूं, ‘डि-फैक्टो’ कोई और ही रहता है। मैं घर में भी रबर स्टैंप की तरह ही काम करता हूं।

प्रोफेशनल लाइफ में मेरा नेचर बताने के लिए मैं ऑफिस के एक वाकये का जिक्र करना चाहूंगा। जब मैं एक टीवी चैनल में प्रोड्यूसर था तो एक बड़े आउटडोर शूट का इंचार्ज बनाया गया। डायरेक्टर-प्रोग्रामिंग के एक चमचे प्रोडक्शन असिस्टेंट ने शूटिंग के खर्चे का हिसाब रखा और जब बिल बनाया तो वह डेढ़ लाख का आ गया। मुझे भी मालूम था कि प्रोडक्शन का खर्च बमुश्किल तीस-चालीस हज़ार ही आया था।आज से दस-बारह साल पहले डेढ़ लाख की क्या औकात थी यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है, लेकिन बावजूद इसके मैंने आंख बंद कर उसके बिल पर साइन कर दिया। यह अलग बात रही कि बिल पास होने के बाद मुझे तीन हज़ार का एक लिफ़ाफा बिना मांगे मिल गया।

मेरे पत्रकार मित्रों, आशा है आप सब मेरी उम्मीदवारी से पूरी तरह इत्तेफाक़ रखते होंगे। अगर कोई मित्र मेरा सहयोग करना चाहे तो बस इतना भर कर दे कि जब भी उसकी किसी भी छोटी-मोटी पार्टी के नेता से बात हो तो मेरे नाम का प्रस्ताव रख दे। आज की खिचड़ी व्यवस्था में बड़ी पार्टी से ज्यादा ‘छुटभैयों’ का ही बोलबाला है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.