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चुनौतियों से टकराती ये महिला सरपंच

By   /  June 10, 2012  /  2 Comments

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-लखन सालवी

महिला जनप्रतिनिधि ईमानदारी, पारदर्शिता और निडरता से राजनीति में भागीदारी निभा रही है। मुख्यतः गांव की राजनीति के बिगड़े स्वरूप को पुनः सुधार रही है। राजसमन्द जिले की कई ग्राम पंचायतों की महिला पंच सरपंच पंचायत का बेहतर संचालन कर रही है। अब इनके कार्यों को देखने से के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे है और इनके कार्यों से प्रेरणा लेकर जा रहे है। एक गीत की लाइनें है . . .

तोड़-तोड़ के बंधनों को देखो बहनें आती है,
ओ देखो लोगों देखो बहनें आती है,
आयेंगी, जुल्म मिटायेंगी, वो तो नया ज़माना लायेंगी  . . .

वाकई में बहनें आगे आई है, वो जुल्म मिटा रही है और ज़माने को बदल रही है। वर्धनी पुरोहित, राखी पालीवाल, मांगी देवी जटिया, चुन्नी बाई, रूकमणी सालवी एवं गीता रेगर जैसी अनेक महिलाएं उदाहरण है। ये सभी सरपंच है और ग्राम पंचायतों का प्रतिनिधित्व कर रही है और गांवों की राजनीति में सक्रिय भागीदारी निभा रही है। इन्होंने उपरोक्त गीत के भावों को सार्थक कर दिखाया है।

जो ना कर सका कोई वो कर दिखाया वर्धनी पुरोहित ने
राजसमन्द जिले की ओड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच वर्धनी पुरोहित ने हाल ही अवैध रेत के दोहन को रोकने की कार्यवाही की है। यूं तो बजरी का अवैध दोहन कई बरसों से चल रहा है। जब वर्धनी पुरोहित को पता चला कि अवैध बजरी दोहन को रूकवाना उसके अधिकार क्षेत्र में है तो उसने भारी विरोध और दबाव के बावूजद उसने अवैध दोहन रूकवा दिया और टोल वसूली शुरू करवा दी है। इससे ग्राम पंचायत की आय भी बढ़ी है। हाल ही उसने अवैध दोहन कर बजरी ले जा रहे ट्रेक्टर मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करवाई है। उसकी शिकायत पर 17 ट्रेक्टर जब्त हुए है।

बालिका शिक्षा और ग्राम सभा में महिलाओं की भागीदारी पर ध्यान दे रही है राखी
उम्र 24 साल, आंखों में तेज है और वो जुंजारू है। जब से समझदार हुई तब से एक सपना देखने लगी थी। सपना था गांव की राजनीति की बागडोर संभालने का, वह सरपंच बनाना चाहती थी। बताती है कि 1995 में उसके पिताजी सरपंच थे। सन् 2009 में खुद ने चुनाव लड़ने की सोची लेकिन पुरूष आरक्षित सीट होने के कारण सरपंच का चुनाव लड़ना सपना बन कर रह गया। लेकिन राजनीति में आने का मादा रखती थी सो उसने वार्ड पंच का चुनाव लड़ा और निर्विरोध उपसरपंच निर्वाचित हुई। चुनाव जीतते ही कोई दर्जन भर चुनौतीपूर्ण कार्यों को सूची थी उसके पास।
यहां बात हो रही है खमनोर पंचायत समिति की उपली ओडण ग्राम पंचायत की उपसरपंच राखी पालीवाल की। वो बताती है कि गांव में गंदी राजनीति थी, अमीरों को गरीबी का तमगा दे दिया गया था जबकि गरीब परिवार बीपीएल में जोड़े जाने का इंतजार कर रहे थे। राखी ने तय कर लिया कि फर्जी बीपीएल परिवारों को बीपीएल सूची में से हटवाना है और वास्तविक गरीब लोगों को बीपीएल में जुड़वाना है। उसने यह कार्य करके दिखाया। फर्जी नामों को सूची से हटवाने के लिए वह जिला कलक्टर से मिली। तो कलक्टर ने अपात्र बीपीएल परिवारों की सूची एवं पात्र परिवारों की सूची उपखंड अधिकारी को देने के लिए कहा। 10 ऐसे परिवारों के नाम बीपीएल सूची मंे शामिल थे जो कि अमीर थे। राखी ने उन सभी अमीर परिवार वालों के नाम बीपीएल सूची से हटवाए और उतने ही गरीब परिवारों के नाम बीपीएल सूची में जुड़वाए।
राखी पालीवाल ने बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। वो बाइक चलाती है, उसने गांव में घूमकर अपने स्तर पर अध्ययन किया तो पाया कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग की कई बालिकाएं शिक्षा से वंचित थी। तो उसने उन सभी बालिकाओं और उनके परिवार जनों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करने का प्रयास किया, रैली निकाली। लगभग 35 बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने में कामयाब रही। राखी ने पहले माहौल तैयार किया, बालिकाओं से बात की। शिक्षा के प्रति उनकी रूचि को जाना। हालांकि पहले तो बालिकाओं के परिजन उन्हें पढ़ाने के लिए तैयार नही हुए। बालिकाओं का भी मानना था कि उनकी लड़कियां बड़ी हो गई है अब पहली, दूसरी कक्षा में पढ़ने के लिए जाएगी तो शर्म आएगी। लेकिन जब राखी ने उन्हें समझाया कि अब सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि अशिक्षित रह गए बच्चें उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश पा सकते है। इस बात की जानकारी अशिक्षित बालिकाओं व उनके परिजनों को नहीं थी। राखी ने हर एक वार्ड में जाकर बालिकाओं से बात की उन्हें शिक्षा का अधिकार कानून की जानकारी दी। परिणाम स्वरूप सैकड़ों अशिक्षित बालक-बालिकाएं शिक्षा से जुड़े।
राखी बताती है कि उप सरपंच बनने के बाद ग्राम पंचायत में जाकर अपने कत्र्तव्यों को निभाने को भी बड़ी चुनौती के रूप में ले रही थी। क्योंकि न तो पंचायतीराज की जानकारी थी और ना ही किन्हीं विकास योजनाओं की। यहां तक कि उप सरपंच के अधिकारों की जानकारी भी नहीं थी। उसने बताया कि क्षेत्र में कार्य कर रहे गैर सामाजिक संगठन ‘‘आस्था’’ एवं ‘‘जतन’’ के द्वारा समय-समय पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर उसने पंचायतीराज को जाना एवं स्वयं के अधिकारों की जानकारी मिली। वो इन संस्थाओं को ही अपना गुरू मानती है।
वो बताती है कि उप सरपंच बनने के शुरूआती कुछ महिनों तक देखा कि ग्राम सभा में महिला वार्ड पंचों की व महिलाओं की उपस्थिति कम रहती थी। उसने ग्राम सभा में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में कार्य करना आरंभ किया। वह वार्डो में गई और महिलाओं तथा वार्ड पंचों को ग्राम सभा में भाग लेने को कहा। उन्हें उनके अधिकारों की जानकारी दी और कोरम में उनकी भागीदारी की महत्ता के बारे में बताया। इतना कुछ करने के बावजूद भी जब ग्राम सभाओं में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ी तो राखी ने सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के सहयोग से 14 फरवरी 2012 को एक ग्राम सभा का आयोजन करवाया। इस ग्राम सभा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए वो कार्यकर्ताओं के साथ घर-घर गई और पीले चावल देकर ग्राम सभा में आमंत्रित किया। राखी का यह प्रयास सफल रहा। इस मेहनत का परिणाम यह रहा कि सभी वार्ड पंच महिलाएं ग्राम पंचायत में आई और अपने वार्ड के मुद्दे रखे। गांव की महिलाओं भी बढ़ चढ़कर ग्राम सभा में भाग लिया।
अब राखी ने वार्ड पंच महिलाओं की टोली बना ली। वो उन्हें प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ले जाती है। वे वार्ड पंच महिलाएं भी चेत रही है। वो महिलाओं को संगठित कर रही है और उन्हें रोजगार दिलवाने एवं विकास योजनाओं के लाभ दिलवाने के सतत प्रयासरत है।
बचपन से राखी को एक बात चुभती थी, वो देखती थी महिलाएं खुले में शौच करती थी। उपसरपंच बनने बाद शौचालय बनवाने की मांग प्रमुखता से की। वो महिलाओं को भी खुले में शौच न करने के लिए कहती। उससे कुछ हद तक फर्क पड़ा। लेकिन वो महिलाएं कहां जाए जिनके घरों में शौचालय नहीं थे। उसने शौचालय निर्माण के लिए ग्राम सभा में प्रस्ताव लिखवाए है तथा आजकल शौचालय निर्माण करवाने की जुगत में लगी है।

मुझे बताओं कि किस-किस ने कितने-कितने दिन काम किया ?
गुंजोल ग्राम पंचायत की चुन्नी बाई ने राजीव गांधी सेवा केंद्र के निर्माण में ग्राम सचिव द्वारा की जा रही गड़बडि़यों को पकड़ लिया। केंद्र के निर्माण में प्रयुक्त हुए मस्टरोल में फर्जी हाजरियां भरी गई थी। जब सचिव मस्टरोल पर सरपंच के हस्ताक्षर करवाने आया तो सरपंच ने साफ कह दिया कि मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगी। पहले मुझे बताओं कि किस-किस ने कितने-कितने दिन काम किया। ऐसे लोगों की हाजरियंा भरी गई थी जो कभी काम पर आए है नहीं थे। फर्जी हाजरियों से लगभग 23000 रुपए का घोटाला ग्राम सेवक करता लेकिन ऐन वक्त पर चुन्नी बाई को जानकारी मिल जाने से उसने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। विकास अधिकारी ने भी चुन्नी बाई को हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया लेकिन वो टस की मस नहीं हुई और हस्ताक्षर नहीं किए। उसने 23000 रुपए घोटाल की भेंट चढ़ने से बचा लिए।
चुन्नी बाई कहती है कि सरपंच का चुनाव था, अनुसूचित जनजाति की महिला के लिए आरक्षित सीट थी। तब तक दबंगों का राज रहा था ग्राम पंचायत पर तो कोई भी अनुसूचित जाति की महिला सरपंच का चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थी। मैं तो चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकती थी। मुझे तो ग्राम पंचायत में क्या होता है इसकी जानकारी भी नहीं थी। चुनाव के ठीक 3 दिन पहले ही मुझे सरपंच बनाने की चर्चा चली। गांव के लोग हमारे घर आए और मुझे निर्विरोध सरपंच बनाने की बात कही। मैंने पहले तो मना कर दिया लेकिन ग्रामीणों एवं समुदाय के लोगों के आग्रह में मैं तैयार हो गई और निर्विरोध सरपंच चुनी गई।

बेबाकी से कर रही है गांव का विकास
राजसमन्द जिले की रेलमगरा पंचायत समिति की पछमता ग्राम पंचायत की सरपंच मांगी देवी ने कई दशकों से बिजली की बाट जोह रहे भील बस्ती व इंदिरा कॅालोनी के परिवारों को रोशन कर दिया है। वो बताती है कि गांव के सभी के घरों में बिजली थी लेकिन पास की भील बस्ती व इन्दिरा कॅालोनी में बसे परिवारों के घरों में अंधेरा था, वहां तक बिजली नहीं पहुंचाई गई थी। मैंने सरपंच बनते ही पहला काम उन बस्तियों में बिजली कनेक्शन करवाने का किया।
वो धमकियों के बावजूद दबंगों से कभी नहीं डरी। गांवों में दबंग लोग ग्राम पंचायत की भूमि पर अतिक्रमण कर लेते है। कई बार तो वो मुख्य मार्ग को भी अपने कब्जे में ले लेते है। मांगी बाई के गांव में भी ऐसा ही हुआ कुछ लोगों ने ग्राम पंचायत की भूमि पर अतिक्रमण करते हुए आम रास्ते को बाधित कर दिया लोगों को आने-जाने में परेशानी होने लगी। तब मांगी बाई ने प्रशासन की मदद लेकर अतिक्रमण को हटवाया। उसे काफी विरोध का भी सामना करना पड़ा।
दलितों के लिए बेबाकी से काम किया। हरिजन बस्ती के घरों से निकलने वाले गंदे पानी को दूर ले जाने के लिए नाली निर्माण करवाना था। जब नाली निर्माण का कार्य आरम्भ किया जो जाट समुदाय के लोगों ने विरोध कर दिया। दरअसल जाटों के मोहल्ले में पूर्व में नाली निर्माण हो चुका था। वो नहीं चाहते थे कि हरिजनों के घरों से निकला गंदा पानी उनके घरों के बाहर होकर निकले। तमाम विरोध के बावजूद मांगी बाई ने हरिजन बस्ती में नाली बनवाई। उसका कहना है कि ग्राम पंचायत द्वारा विकास कार्यों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता है। सभी को समान अधिकार प्राप्त है। अधिकारों की जानकारी कहां से मिली ? इस प्रश्न के जवाब में वो कहती है संस्थाओं द्वारा हमें प्रशिक्षण दिए गए। उन प्रशिक्षणों में ही मैंने अपने अधिकारों और ग्राम पंचायतों के बारे में जानकारी हासिल की है।

पारदर्शिता की मिशाल बनी रूकमणी
पारदर्शिता के मामले में भी महिला जनप्रतिनिधि अव्वल है। राजसमन्द जिले के विजयपुरा की सरपंच रूकमणी देवी की बदौलत ग्राम पंचायत में पूर्णपारदर्शिता स्थापित हो चूकी है। वो अपने हर काम के खर्च को ग्राम पंचायत क्षेत्र में जहां भी खाली दिवार दिखती है वहां पीला रंग पुतवा कर मंडवा देती है। कार्य में खर्च हुए का ब्यौरा कोई भी वहां पर देख सकता है। रूकमणी से पूर्व उसके पति कालूराम सालवी यहां के सरपंच थे। उन्होंने पारदर्शी ग्राम पंचायत का सपना देखा था और कार्य शुरू किया था। कालूराम के काम को रूकमणी ने और आगे बढ़ाया है। आदर्श ग्राम पंचायत बन चुकी विजयपुरा ग्राम पंचायत से प्रेरणा लेने आजकल देशभर के विभिन्न क्षेत्रों के पंच-सरपंच आ रहे है।

आड़े हाथों लेती है चुनौतियों को
राजसमन्द जिले की जूणदा ग्राम पंचायत की सरपंच गीता देवी रेगर नित नई चुनौतियों का सामना कर राजनीति में अपने आप को स्थापित कर रही है। उसके गांव में सर्वण जाति के लोग अनुसूचित जाति के लोगों के दूल्हे को घोड़ी पर बैठकर बिन्दौली नहीं निकालने देते थे। चुनाव से पहले ही अपने देवर की बिन्दौली निकलवा दी। कुछ समय बाद सरपंच का चुनाव लड़ा, चुनाव में घोड़ी पर बिन्दौली निकलवाने का दुस्साहस तकलीफदायी था। वो चुनाव जीतने पर आडे़ आ रहा था। लेकिन राजनीति का पहले पड़ाव को संघर्ष एवं सूझबूझ से पार कर लिया और सरपंच बन गई। सरपंच बनते ही उनके सामने चुनौती थी पिछले 24 वर्ष से बंद पड़ी रोड लाईट को 26 जनवरी को चालू करवाना। जिसे उसने चालू करवा दिया। रोड़ लाइट का पुराना बिल बकाया था। ग्राम पंचायत की आमदनी बढ़ाकर उसने रोड़ लाइट का बिजली बिल जमार करवा दिया और अब गांव में उजाला हो चुका है। आजकल वो पेयजलापूर्ति को चुनौती के रूप देख रही है। उसका कहना है कि इस वर्ष में पेयजल मुहैया करवाने के लिए पाइप लाइन व पानी की टंकी बनवाने के लिए कार्य प्रमुखता से करना है।

इन महिला जन प्रतिनिधियों के हौसलों को देखकर ऐसा लगता है कि अब ये चेत (जागरूक हो) चुकी है और जमाने को बदलकर ही दम लेगी।

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  • Published: 6 years ago on June 10, 2012
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  • Last Modified: June 10, 2012 @ 5:38 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Pawel Parwez says:

    सलाम है इस महिला सरपंच कों.

  2. Aman Guru says:

    saflataa ki kahaniya likhte raho Lakhan Bhai

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