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साइक्लोन ममता ने दिल्ली का तापमान बढ़ाया! पिक्‍चर अभी बाकी है!!

By   /  June 14, 2012  /  2 Comments

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एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

कोलकाता में यह खबर पहले से थी कि मनमोहन को राष्ट्रपति बनाकर सोनिया गांधी प्रणव मुखर्जी को तदर्थ प्रधानमंत्री बनाकर राहुल गांधी का रास्ता साफ करना चाहती हैं, इसे महज अटकलबाजी मानकर खारिज कर दिया गया था। पर आज दिल्ली में क्षत्रपों की सबसे तगड़ी जोड़ी मुलायम ममता ने मनमोहन का नाम राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित करके न सिर्फ राजधानी का तापमान बढ़ा दिया, बल्कि मनमोहनी तुरूप की इस चाल से बाजार के होश भी फाख्ता कर दिये। अब चाहे जो हो, बाजार के प्रत्याशी बतौर प्रणव के राष्ट्रपति बनने की संभावना लगभग खत्म है बशर्ते कि वामपंथियों को पटाकर मुलायम ममता को हाशिये पर डालने की जोखिम उठाये सोनिया गांधी।लेकिन राजनीतिक खेल अभी खत्म नहीं हुआ है क्योंकि अंतिम फैसला सोनिया गाधी को ही करना है।ऐसा नहीं हो सकता कि ममता और मुलायम के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी उन्हें न हो। कोलकाता में अगर पहले से मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाने की अटकलें जोर पर थीं और कोलकाता की नेता ने ही औपचारिक तौर पर यह प्रस्ताव कर दिया तो इसे महज संयोग नहीं माना जा सकता। फिर अर्थ व्यवस्था की बदहाली के बहाने बाजार के नुमांदों से बी प्रणव दादा अलग बात कर रहे हैं। आहलूवालिया और पित्रोदा क्या कर रहे हैं, इसकी बल्कि मीडिया की खबर नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि असल में यह खेल ममता मुलायम जोड़ी का कम, ममता, आहलूवालिया और पित्रोदा तिकड़ी का ज्यादा है!

जाहिर है कि यूपीए सरकार राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर गंभीर संकट से घिर गई है। कल तक नए राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम पर सहमति के आसार बन रहे थे, लेकिन आज सोनिया के बुलावे पर दिल्ली आई तृणमुल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सारा खेल बिगाड़ दिया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पसंद प्रणब मुखर्जी का नाम खारिज करते हुए अपनी ओर से एपीजे अब्दुल कलाम, मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के नाम पेश कर दिए। ममता के इस खेल में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। जाहिर है कांग्रेस का राष्ट्रपति पद का अंकगणित बुरी तरह गड़बड़ा गया, उसपर सोनिया गांधी को भी ममता के इस खेल से अपमान का घूंट पीना पड़ा है।

ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने भले ही मनमोहन सिंह, एपीजे अब्‍दुल कलाम और सोमनाथ चटर्जी का नाम राष्‍ट्रपति पद के लिए प्रस्‍तावित कर बड़ा ट्रेलर दिखा दिया हो, लेकिन पिक्‍चर अभी बाकी है। अंतिम फैसला लेंगी पर्दे के पीछे बैठीं सोनिया गांधी और वो इनमें से किसी को भी राष्‍ट्रपति नहीं बनाना चाहेंगी। उनकी पहली पसंद प्रणब मुखर्जी ही हैं। ऐसा इसलिए क्‍योंकि प्रणब के राष्‍ट्रपति बनने से राहुल गांधी का रास्‍ता साफ हो सकता है। वो रास्‍ता जो पीएम की कुर्सी तक जाता है। कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी यह अच्‍छी तरह जानती हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए की वापसी बहुत मुश्किल है। दूसरी ओर टीम अन्‍ना, भाजपा समेत तमाम समाजसेवी व नेता मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री करार देते आ रहे हैं। ऐसे में 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस को अपना पीएम कैंडिडेट घोषित करना होगा।यूपीए में प्रणब मुखर्जी पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार हैं और सोनिया गांधी हमेशा चाहेंगी कि राहुल गांधी पीएम की कुर्सी पर बैठें। यही कारण है कि सोनिया गांधी प्रणब दा को राष्‍ट्रपति बनाना चाहती हैं, ताकि राहुल का रास्‍ता क्लियर हो जाये।

मुलायम-ममता जुगलबंदी ने आगामी राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस के सारे समीकरण गड़बड़ा दिये हैं।सोनिया की पसंद : प्रणब मुखर्जी या हामिद अंसारी। मुलायम और ममता की पसंद : अब्दुल कलाम, सोमनाथ चटर्जी या मनमोहन सिंह! कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में सुझाए गए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और हामिद अंसारी के नामों को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी और समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने खारिज कर दिया है! राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के संयोजक शरद यादव ने बुधवार को कहा कि कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी से उनके बेहतर संबध हैं लेकिन वह केंद्रीय वित्त मंत्री को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।गौरतलब है कि सोमनाथ चटर्जी सीपीएम के शीर्ष नेता रहे हैं। वे लोकसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वहीं सूत्रों का यह भी कहना है कि उपराष्ट्रपति पद के लिए सुभाषचंद्र बोस के परिवार की कृष्णा बोस का नाम भी चर्चा में है।

सबसे अहम सवाल यह है कि जो ममता विश्वपुत्र प्रणव को राष्ट्रपति बनाने को तैयार नहीं हैं, क्या वे उन्हें प्रधानमंत्री बनाने पर राजी हो जायंगी?फिर प्रधानमंत्री कौन होगा फिर सोनिया गांधी और मनमोहन इस प्रस्ताव पर क्यों राजी होंगे बशर्ते सोनिया मनमोहन को किनारे करने का मन न बना चुकी हों। फिर कलाम और सोमनाथ चटर्जी के नाम पर सहमति होने की गुंजाइश कम है। ममता मुलायम ने तो प्रणव और हमीद अंसारी को खारिज कर ही दिया है। संगमा के नाम पर सहमति के भी आसार नहीं है। तो क्या इन पांच नामों के अलावा कोई छठां व्यक्ति है,जिसके नाम पर सहमति की गुंजाइश हो और बाजार को भी ऐतराज न हो। इसीलिए परदे की आड़ में ममता के करीबी सैम पित्रोदा और  और मंटेक सिंह आहलूवालिया की भूमिका अहम हो जाती है। वैसे सोमनाथ भी कारपोरेट इंडिया और बाजार के प्रय उम्मीदवार है। उनको प्रत्याषी बनाये जाने पर बांग्ला राष्ट्रीयता को मलहम लगाने का काम पूरा हो जायेगा। फिर भारत अमेरिकी परमाणु संधि के पास कराने में बाहैसियत लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिससे अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था को न सिर्फ मंदी से उबारने में मदद मिली, बल्कि भारत को खुला बाजार बनाने का एजंडा भी पूरा हो गया। बाजार को उनके नाम पर खास आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वे हिंदू महासभा के दिग्गज नेता एन सी चटर्जी के सुपुत्र है, यह परिचयसंघ परिवार को पटाने में भी शायद सहायक हो। पर क्या सचमुच सत्तावर्ग सोमनाथ को राष्ट्पति बनाने को तैयार होगा या फिर खेल कुछ और है।ममता और मुलायम की ओर से पेश किए गए नाम तीनों नाम चौंकाने वाले हैं। एपीजे अब्दुल कलाम को एनडीए की पसंद माना जाता है जिन्हें ममता-मुलायम की जोड़ी ने पहले नंबर पर रखा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम दूसरे नंबर पर रखने का एक मतलब ये भी है कि दोनों को यूपीए की मौजूदा सरकार के रंग-ढंग पसंद नहीं आ रहे हैं। वे प्रधानमंत्री पद से मनमोहन सिंह की छुट्टी चाहते हैं। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी उनकी लिस्ट में तीसरे नंबर पर हैं। लेकिन मार्क्सवादी नेता को कांग्रेस का समर्थन मिलेगा, इसकी उम्मीद बेहद कम है।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सोनिया की पसंद को ममता ने किसी रणनीति के तहत सार्वजनिक किया? क्या सोनिया की पसंद को सार्वजनिक तौर पर खारिज करके उन्होंने यूपीए अध्यक्ष की किरकिरी नहीं की है?कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि उसका उम्मीदवार सर्वसम्मत हो। इसके लिए उपराष्ट्रपति पद विपक्ष को देने की जरूरत हुई तो उससे भी इन्कार नहीं होगा। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि अकाली दल के नेता इसके लिए उत्सुक हैं। लिहाजा राजग को मनाने में ज्यादा परेशानी नहीं होनी चाहिए। अब तक कांग्रेस ने अंसारी के नाम पर राकांपा और द्रमुक से बातचीत की है। द्रमुक मुखिया करुणानिधि ने चेन्नई में पत्रकारों से कहा, ‘हम अच्छे राष्ट्रपति की उम्मीद करते हैं। एंटनी ने कुछ नामों का प्रस्ताव दिया और मैंने भी ऐसा किया।’ करुणानिधि ने प्रणब के नाम पर सहमति के संकेत दिए हैं। द्रमुक मुखिया रविवार को ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी पार्टी कलाम का समर्थन नहीं करेगी।

सोनिया के बुलावे पर राजधानी आईं ममता ने कांग्रेस के पसंदीदा नामों के बारे में मीडिया के सामने खुलासा किया, जिसके बाद पिछले कुछ दिनों से चल रही अटकलों का दौर समाप्त हो गया। मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब ममता ने सोनिया से मुलाकात के तत्काल बाद सपा नेता मुलायम सिंह यादव के साथ अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के रूप में प्रधानमंत्री सिंह, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के नाम लिए। उन्होंने कहा कि इनमें से किसी के नाम पर भी आम सहमति होने पर उन्हें वह नाम मंजूर होगा।

राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने आज कहा कि तृणमूल और सपा द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए प्रधानमंत्री सिंह को अपनी पसंद बताए जाने के बाद इस पद के उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाने के लिए संप्रग के सभी दलों को बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि नए घटनाक्रम के मद्देनजर हमें तृणमूल कांग्रेस-सपा के फैसले के मद्देनजर सभी संबंधित दलों से बात करनी होगी और राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाने का प्रयास करना होगा।

उधर, राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव के नाम पर तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी का समर्थन नहीं मिलने पर पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस ने निराशा प्रकट की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने ममता और मुलायम द्वारा पूर्व राष्ट्रपति कलाम, प्रधानमंत्री सिंह तथा पूर्व लोकसभा अध्यक्ष चटर्जी का नाम उम्मीदवार के तौर पर लिए जाने के संबंध में कहा कि हम उनकी पसंद से सहमत नहीं हैं। हम राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव मुखर्जी के नाम को तरजीह देते हैं। एक और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तथा ममता बनर्जी सरकार में मंत्री मानस भुइंया ने कहा कि यह उनका (मुलायम तथा ममता का) फैसला है।

लगता है कि मुलायम ने एक बार 1999 वाला धोबीपाट दांव चलकर कांग्रेस को चित करने की कोशिश की है। 1998 में बनी एनडीए सरकार जब 13 महीने बाद गिरी तो 21 अप्रैल 1999 को सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति के.आर.नारायण से मुलाकात करके सरकार बनाने का औपचारिक दावा पेश किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें 271 सांसदों का समर्थन है और ये अभी और बढ़ेगा। उनकी गिनती में मुलायम की समाजवादी पार्टी भी शामिल थी। लेकिन ऐन मौके पर मुलायम सिंह यादव समर्थन देने से मुकर गए। तब से मुलायम और कांग्रेस के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. shame on indian politics and crept politicians.
    no I can say , congres parti is desh ko kya apni khud ki maa , beti ko bhi bech sakti hi , apni party ke liye…..

  2. shame on indian politics and crept politicians.
    no I can say , congres parti is desh ko kya apni khud ki maa , beti ko bhi bech sakti hi , apni party ke liye…..

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