/क्यों न देश के प्रमुख राजनैतिक और संवैधानिक पद जनता के मतदान से भरे जाएँ..

क्यों न देश के प्रमुख राजनैतिक और संवैधानिक पद जनता के मतदान से भरे जाएँ..

-अर्धनारीश्वर

भारत के राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी का नाम तो तय कर दिया है मगर इसी के साथ इस चुनाव की उम्मीदवारी के लिए चली गयी चालों ने देश के सामने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं.
राजनेताओं से लेकर मीडिया तक ने सिर्फ यही आंकलन किया कि किस-किस राजनैतिक पार्टी के पास कितने वोट हैं लेकिन किसी माई के लाल ने कभी ये नहीं कहा या सुझाया कि भारत का राष्ट्रपति कैसा हो. सबसे शर्मनाक तथ्य है कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के लिए घटिया तरीके से जोड़ तोड़ का सहारा लिया गया नाकि योग्यता का कोई मापदंड देखा गया. प्रणब मुखर्जी का नाम तय होने बाद भी उन्हें कांग्रेस के संकटमोचक के तौर पर पेश किया जाता रहा. सच तो यह है कि प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के संकट मोचक होंगे, देश के नहीं. उनके वित्तमंत्री पद पर रहते भारतीय अर्थव्यवस्था का बंटाधार ही हुआ है.

राष्ट्रपति का चुनाव सर्वसम्मति से किए जाने की परंपरा ही एक आदर्श स्थिति है, जिसे हर हाल में कायम किया जाना चाहिए. ऐसा न होने का ही खामियाजा है कि आज छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल राष्ट्रपति जैसे पद के लिए अपनी मागें मनवाते नजर आते दिखे और सरकार मुश्किल में फंसती दिखी. यदि काग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार सबसे बड़े विपक्षी दल और गठबंधन राजग के साथ मिल-बैठकर इस मुद्दे पर मशविरा करती और एक आम सहमति वाले उम्मीदवार की घोषणा करती तो वर्तमान संघर्ष की स्थिति पैदा ही नहीं होती. आखिर ऐसा क्यों है कि हमारी लोकतात्रिक परंपरा में विपक्ष की भूमिका और उसके महत्व को इन्कार किया जा रहा है? क्या यह देश के हित में है? इस संदर्भ में एक और जिस बात पर विचार करना आवश्यक है वह है राष्ट्रपति के उम्मीदवार को तय करने का अधिकार. आखिर राष्ट्रपति का उम्मीदवार किसे तय करना चाहिए, देश की आम जनता अथवा राजनीतिक दलों के प्रमुखों को. याद रहे कि काग्रेस कार्यकारिणी ने यह अधिकार सोनिया गाधी को सौंपा, पर क्या यह ठीक था और क्या इसे स्वीकार किया जाना चाहिए? वास्तव में यह एक तरह की तानाशाही की स्थिति है कि देश के शीर्ष पद पर बैठने वाले उम्मीदवार का निर्धारण कोई पार्टी प्रमुख करे और इसमें आम जनता सिर्फ दर्शक की भूमिका में हो. कहने को कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल करता है, जिसे जनता का समर्थन हासिल होता है पर यह व्याख्या ठीक नहीं.

राष्ट्रपति का उम्मीदवार यदि सभी पार्टियों की सहमति का नहीं है तो पद पर बैठने के बाद वह पूरी क्षमता से देश की सेवा और संविधान की रक्षा करने की शपथ पूरी कैसे करेगा? पूर्व के राष्ट्रपतियों के उदाहरण हमारे सामने हैं कि उन्होंने किस तरह से देश और संविधान की बजाय पार्टी विशेष के हितों का विशेष ख्याल रखा. दरअसल, आज यह मान लिया गया है और प्रचारित किया जा रहा है कि राष्ट्रपति एक रबर स्टैंप से ज्यादा कुछ नहीं है जिस कारण उसकी अहमियत बहुत सीमित हो जाती है, पर यह एक गलत धारणा है. राष्ट्रपति को संविधान के तहत जो शक्तिया दी गई हैं वे काफी अहम हैं, जिस कारण इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति का चुनाव भी काफी सोच-समझकर किया जाना चाहिए. इन शक्तियों में सबसे महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री की नियुक्ति. आम चुनाव के बाद जब किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो राष्ट्रपति को अधिकार होता है कि वह किसे आमंत्रित करे-सबसे बड़े दल को अथवा सबसे बड़े गठबंधन को? गठबंधनों में भी चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के गठबंधन महत्वपूर्ण होते हैं और कोई स्पष्ट परिपाटी और संवैधानिक प्रावधान न होने के कारण राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। इसके अलावा जब कोई सरकार सदन में अपना विश्वास खो देती है तो राष्ट्रपति के पास ही यह अधिकार होता है कि वह किसे आमंत्रित करे. सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमांडर होने के साथ ही सभी कार्यकारी शक्तिया राष्ट्रपति में निहित होती हैं और उसके नाम पर ही सारे काम होते हैं. इन सबके अतिरिक्त एक और प्रमुख शक्ति किसी विधेयक पर स्वीकृति देने अथवा न देने की भी है. राष्ट्रपति किसी भी विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेज सकता है. कह सकते हैं कि संविधान ने वास्तविक शक्ति राष्ट्रपति में आरोपित कर रखी है, बावजूद इसके यदि राष्ट्रपति को रबर स्टैम्प बना दिया गया है तो इसीलिए क्योंकि उसके चुनाव के लिए आम जनता से राय-मशविरा नहीं किया जाता.
अब समय आ गया है कि हमें देश के प्रमुख पदों जैसे राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति  और प्रधानमंत्री के लिए  सीधे जनता द्वारा चुने जाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए नाकि लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा सदस्यों द्वारा. अधिकांश जनप्रतिनिधि अपने राजनैतिक आकाओं के हितसाधन के लिए काम करते हैं जबकि इन्हें देशहित में काम करना चाहिए.

राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति  और प्रधानमंत्री जैसे पदों के लिए सीधे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होने से, इनकी जिम्मेवारी और बाध्यता सीधे जनता से होगी. जिसके चलते इनकी तमाम राजनैतिक गठजोड़ कि मजबूरियां समाप्त हो सकेगीं.  जिससे न केवल निष्पक्ष निर्णय संभव होंगे वरन कठोर निर्णय भी आसानी से लिए जा सकेंगे.

इसके लिए सर्वसम्मति से संविधान संशोधन करना पड़ेगा और ऐसा ये राजनेता कभी करेंगे इसकी उम्मीद नहीं..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.