/गैर राजनीतिक पद के लिए हो रही है राजनीति

गैर राजनीतिक पद के लिए हो रही है राजनीति

-विनायक  शर्मा

राष्ट्रपति चुनावों के उम्मीदवार को लेकर जिस तरह की राजनैतिक चालें चली गयी और समाजवादी मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह ममता को पटखनी देते हुए सोनिया के चरणों में नमन किया.  उससे लगता है कि राजनीति का ये पुराना खिलाडी आने वाले लोकसभा चुनावों में कोई नया गुल खिलाएगा.

 

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पर एनडीए आज भी अपना रुख तय नहीं कर सकी. भाजपा के नेता अडवानी के घर आज हुई एनडीए की बैठक में अब यह तय हुआ कि एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से उनका विचार जानने के उपरांत ही यह तय हो पायेगा कि यूपीए के प्रस्तावित उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया जाये या अपना कोई उम्मीदवार खड़ा किया जाये. वैसे मतों के विभाजन को रोकने के लिए संगमा का भी समर्थन किया जा सकता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रपति पद के चुनाव के उम्मीदवार तय करने में जहाँ यूपीए में विश्वास की कमी देखी जा रही थी वहीँ एनडीए में भी कोई विशेष दिलचस्पी दिखाई नहीं दे रही थी. संख्या के खेल में यह दोनों ही गठबंधन 51 प्रतिशत आंकड़ों को बिना अन्य दलों के सहयोग के छू भी नहीं सकते हैं यह सभी जानते हैं. महंगाई और बिजली-पानी जैसी रोजमर्रा समस्याओं को झेलते जनसाधारण में क्रिकेट के स्कोर जानने जैसा कौतुहल तो दिखाई देता है परन्तु कोई विशेष आकर्षण नहीं है कि कौन बनेगा इस देश का अगला राष्ट्रपति. दो बार प्रधानमंत्री के पद की दौड़ में पिछड़ने के बाद अब राहुल गाँधी की ताजपोशी की ख़बरों के चलते प्रणव मुखर्जी ने यूपीए का उम्मीदवार बनना इसलिए स्वीकार किया होगा कि शेष जीवन आराम से गुजरेगा. जो भी हो इस गैर राजनीतिक और सवैधानिक पद के चुनाव के पीछे राजनीतिक दलों की भविष्य की रणनीति भी काम कर रही है जो अगले कुछ दिनों तक दिखाई भी देने लगेगी.

2014 में होनेवाले लोकसभा के आम चुनाव से पूर्व और नतीजों की घोषणाओं के पश्चात् यूपीए और एनडीए के गठबन्धनों में टूटन होगी जिसके चलते इन दोनों गठबन्धनों के कुछ पुराने सहयोगियों के जाने और नए बनने के साथ ही कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा गैर-एनडीए, गैर-यूपीए और गैर-वामदलीय गठबंधन बनाने का प्रयास होगा. इस नए बनने वाले गठबंधन में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की अहम् भूमिका रहनेवाली थी. परन्तु राष्ट्रपति के चुनाव में ममता बनर्जी के साथ मिलकर सोनिया गांधी द्वारा संभावित दो नामों को ख़ारिज करते हुए तीन नए नाम सुझाने के कुछ समय बाद ही ममता को अकेला छोड़ यूपीए के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन करना क्या दर्शाता है ? एनडीए, वामदल और अब यूपीए मुलायम सिंह की दबाव व भयदोहन की मंशा से की जाने वाली इन चालों को भली-भांति समझ चुके हैं. उत्तरप्रदेश विधानसभा के हाल के चुनावों में कांग्रेस और भाजपा की हवा में उड़ान, माया की नाकामयाबियों और मतों के बिखराव के चलते कोई अन्य विकल्प ना होने के कारण ही समाजवादी दल को बहुमत मिला था. इस बहुमत के कारण ही मुलायम सिंह की महत्वाकांक्षा येन-कैन-प्रकारेण देश के प्रधानमंत्री पद पर कब्ज़ा करने की लगती है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि अमर बेल की भांति बड़े राष्ट्रीय दलों को निगलने को तत्पर क्षेत्रीय दलों का कोई क्षत्रप निकट भविष्य में चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर या देवगौड़ा की भांति देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे दिखाई दे जाएँ.

संख्या और आंकड़ों के बल पर जोड़-तोड़ के इस खेल ने सर्वोच्च पदों के लिए अनिवार्य योग्यताओं और वरीयताओं की जिस प्रकार अनदेखी का प्रचलन बड़ रहा है इसे देश के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता. राष्ट्रपति जैसे देश के सर्वोच्च सवैंधानिक और गैर-राजनीतिक पद के लिए राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति के लिए चल रही खींचतान ने स्थिति को और हास्यापद बना दिया है. देश जानता है कि राजनैतिक दलों ने समय-समय पर किस प्रकार एक दूसरे के प्रति कटुता का परिचय दिया है और निरंतर चल भी रहा है. दूसरे दल के प्रस्ताव का विरोद्ध कर अपने प्रस्ताव के प्रति सर्वसहमति तलाशनेवाले न जाने किस हवा में विचरण कर रहे हैं. दुर्भाग्य तो इस देश के जनसाधारण का है कि वर्तमान व्यवस्था के चलते वह मूकदर्शक बनने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता. अभी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर ना तो जनता का सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है और ना ही देश की सेहत पर कोई अंतर पड़नेवाला है कि कौन बनेगा राष्ट्रपति. देश के राजनीतिक हलकों में चल रही इस तमाम खींचतान और उठापठक के पीछे राष्ट्रपति पद और उम्मीदवार की गरिमा न होकर दलों की वर्तमान और भविष्य की लाभ-हानि की राजनीति ही काम कर रही है. विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र भारत के सबसे बड़े सवैंधानिक पद के लिए हो रहे चुनाव में इस देश के जनसाधारण को प्रत्यक्ष रूप से न तो उम्मीदवारों को खड़ा करने और ना ही चुनने या विरोद्ध करने का ही कोई अधिकार है. देश के बदलते परिवेश में यह सब अधिकार देश की जनता के पास होने चाहिए कि वह किस सर्वश्रेष्ठ और सर्व्योग्य व्यक्ति को अपने देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर सुशोभित करना चाहती है. भविष्य में यदि ऐसा संभव हो सका तो इन दोनों पदों पर बैठने वाले व्यक्ति कम से कम देश की जनभावनाओं को समझते हुए जनाकांक्षाओं के प्रति वफादार तो होंगे.

(विनायक  शर्मा,  मण्डी-हिमाचल  से प्रकाशित साप्ताहिक  अमर ज्वाला के संपादक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.