/क्या सरकारी विज्ञापनों के मोह मे अंधे हो चुके हैं बिहार के अखबार…?

क्या सरकारी विज्ञापनों के मोह मे अंधे हो चुके हैं बिहार के अखबार…?

घायल व्यक्ति के शरीर पर कूदता पुलिसवाला

दिल दहला देने वाली ये तस्वीर बेशक किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर जगह पाने के काबिल हो सकती है, लेकिन बिहार के तमाम हिंदी अखबारों में इसे अंदर के पन्नों में भी जगह नहीं मिली। 3जून को बिहार के फोरबिसगंज में हुई पुलिस फायरिंग के दौरान पुलिस की ज्यादती की ये तस्वीरें साफ बयां कर रही हैं की सुरक्षाबल के जवान लोगों के साथ कितनी दरिंदगी से पेश आए, लेकिन स्थानीय मीडिया, खासकर हिंदी अखबारों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी।

हैरानी की बात तो यह है कि इस हृदय विदारक दृष्य को अपने कैमरे मे कैद करने वाले प्रेस फोटॉग्राफर ने इसे सभी अखबारों और टीवी चैनलों को वितरित कर दिया था, लेकिन किसी भी अखबार के संपादक को यह तस्वीर छपने लायक नहीं लगी। साफ है बिहार के अखबाकों के संपादक अपने प्रमुख विज्ञापनदाता बिहार सरकार को नाराज़ करने से डर रहे थे।

अररिया के फोरबिसगंज में हुए इस गोली-कांड में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोगों पर पुलिस का कहर टूटा था। इस हादसे के बाद बनी एक समीति के मुताबिक 3 जून को  अररिया जिले में फोरबेसगंज ब्लॉक के रामपुर और भजनपुर गांवों के लोग एक कारखाने के निर्माण के लिए दो गांवों से जोड़ने वाली सड़क की नाकेबंदी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान पुलिस ने न केवल निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई बल्कि उन्हें उनके घरों तक पीछा करके मार डाला. पॉइंट ब्लैंक रेंज में जिन छह लोगों को गोली से मार डाला गया उनमें दो महिलाए और एक शिशु भी शामिल है।

मीडिया वाच नाम की एक संस्था ने अखबारों के इस रवैये के प्रति प्रेस काउंसिल के पास शिकायती पत्र भेजा है। इस पत्र में स्थनीय मीडिया की कड़ी निंदा की गई है और बताया गया है कि कैसे अखबारों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। मीडिया दरबार के पास उस पत्र की कॉपियां मौजूद है

प्रेस कांसिल के अध्यक्ष को लिखा गया शिकायती पत्र

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.