/राष्ट्रपति चुनाव: एनडीए में मतभेद, वाम मोर्चा भी एकमत नहीं…

राष्ट्रपति चुनाव: एनडीए में मतभेद, वाम मोर्चा भी एकमत नहीं…

राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए के बाद एनडीए और लेफ्ट में भी फूट पड़ गई है। जहां शिवसेना और जेडीयू के विरोध के बाद भी बीजेपी ने संगमा को समर्थन दिया है। वहीं सीपीएम और फॉरवर्ड ब्लॉक तो प्रणब का समर्थन करेगा लेकिन सीपीआई, आरएसपी चुनाव में हिस्सा ही नहीं लेंगे। मालूम हो कि यूपीए के दूसरे बड़े घटक तृणमूल कांग्रेस  ने पहले ही विद्रोह कर दिया है।

इस चुनाव के लिए बीजेपी अपने दो अहम सहयोगियों को मना नहीं पाई. बीजेपी ने पी ए संगमा को राष्ट्रपति के तौर पर अपना समर्थन देने का एलान कर दिया है।लेकिन संगमा को उम्मीदवार बनाने के पीछे जेडीयू और शिवसेना की असहमति के जोखिम के बावजूद अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल को राजग में खींचकर २०१४ के लिए गठबंधन का दायरा बढ़ाने का मकसद कहीं ज्यादा है, प्रणव मुखर्जी को रोकने की ऱणनीति तो नजर ही नहीं आयी।लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संगमा को समर्थन का एलान किया। स्वराज ने कहा कि वो प्रणब मुखर्जी का समर्थन नहीं कर सकते क्योंकि देश के बुरे हालात के लिए वो ही जिम्मेदार हैं। दूसरी ओर यूपीए की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना करने के बावजूद प्रणव को माकपा का समर्थन वामपंथ के लिए खोयी हुई जमीन, खासकर बंगाल के सियासी गणित साधने की कवायद ज्यादा है। न वामपंथ को और न राजग की सर्वोच्च वरीयता देश की अर्थव्यवस्था है। विडंबना है कि राजनीतिक समीकरण बनाये रखने के लिए तीनों प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों ने अर्थ व्यवस्था की बदहाली को सिरे से नजरअंदाज कर दिया।

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एनडीए के दो अहम सहयोगी बीजेपी और जेडीयू अपनी-अपनी राह चल पड़े हैं। बीजेपी ने पीए संगमा का साथ देने का एलान किया, तो जेडीयू यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के साथ खड़ी है।जेडीयू नेता शरद यादव ने कहा कि पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे।राष्ट्रपति चुनाव को लेकर यूपीए के बाद एनडीए और लेफ्ट में भी फूट पड़ गई है। सीपीएम और फॉरवर्ड ब्लॉक तो यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करेंगे, लेकिन सीपीआई, आरएसपी चुनाव में हिस्सा ही नहीं लेंगे।

राष्ट्रपति की रेस में वोटों का गणित प्रणब मुखर्जी के पक्ष में ही दिख रहा है। अभी संगमा के पास बीजेपी के सवा दो लाख वोट, बीजेडी के 30 हजार, एआईएडीएमके के 37 हजार, टीडीपी के 20 हजार अकाली दल के 12 हजार वोटों को जोड़ दें तो आंकड़ा होता है तीन लाख चौबीस हजार का, लेकिन जीत के लिए चाहिए साढ़े पांच लाख वोट।

वहीं प्रणब की जीत पक्की मानी जा रही है। उनके पास यूपीए के 4 लाख वोट हैं इसके अलावा बीएसपी के 45 हजार वोट, आरजेडी के 10 हजार, समाजवादी पार्टी के 67 हजार वोट हैं।

एनडीए के घटक दलों जेडीयू के 41 हजार और शिवसेना के 18 हजार वोट को जोड़ने पर प्रणब को मिलते दिख रहे हैं करीब 5 लाख 81 हजार वोट। यानी प्रणब मुखर्जी की जीत पक्की है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.