/खुद को जिन्दा साबित करने लिए लड़ना चाहता है राष्ट्रपति का चुनाव…

खुद को जिन्दा साबित करने लिए लड़ना चाहता है राष्ट्रपति का चुनाव…

नाना पाटेकर को अपनी पाक कला का मुरीद बना चुके और उनके बावर्ची रहे संतोष कुमार सिंह भी देश के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में शामिल हो गए हैं. 32 वर्षीय संतोष ने अपना नामांकन दाखिल

मैं जिन्दा हूँ: संतोष कुमार सिंह

कर दिया है और इस चुनाव में उतरने के पीछे उनका एकमात्र इरादा है खुद को जीवित साबित करना.

बचपन में अनाथ हो गए संतोष कुमार सिंह के अनुसार, चाचा तथा अन्य रिश्तेदारों ने उन्हें ‘मरा हुआ’ घोषित कर उनका डेथ सर्टिफिकेट जारी करवा दिया था. संतोष का दोष सिर्फ इतना है कि मुंबई में नाना पाटेकर के यहां नौकरी के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र की एक दलित लड़की से प्रेम विवाह करने की गुस्ताखी की थी.
जी हां, उत्तर प्रदेश के सरकारी दस्तावेज में संतोष कुमार सिंह को ‘मृत’ घोषित किया जा चुका है और कोई अधिकारी संतोष की इस बात पर भरोसा करने को तैयार नहीं कि वह मरे नहीं, बल्कि जिंदा हैं.
नाना पाटेकर से उनकी मुलाकात ‘आंच’ फिल्म के दौरान हुई थी, जिसकी सारी शूटिंग वाराणसी के निकट उनके गांव में हुई थी। तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाकर उन्होंने नाना का दिल जीत लिया था और उनके आग्रह पर नाना उन्हें अपना खानसामा बनाकर अपने साथ मुंबई ले आए थे.
बचपन में माता-पिता को खो चुके संतोष के अनुसार, चाचा तथा अन्य रिश्तेदारों ने उन्हें ‘मरा हुआ’ घोषित कर उनका डेथ सर्टिफिकेट जारी करवा दिया। संतोष का कसूर सिर्फ इतना है कि मुंबई में नाना पाटेकर के यहां नौकरी के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र की एक दलित लड़की से प्रेम विवाह करने की गुस्ताखी की थी.
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.